भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९६ भावप्रकाशनिघण्टुः ३. गेहूँ हिं०-गेहूँ। बं०-गम। म०-गेहूँ गु०-धउ, घेऊँ। क०-गोधी। ते०-गोदुमेलु। फा०-गंदुम। ता०- गोदूमै। अ०-हिन्ता। अं०-Wheat (हीट)। ले०-Triticum, sativum Lam. (ट्राइटिकम् सटाइवम्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। अनेक प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। संसार भर में अन्न के लिये इसकी उपज की जाती है। यह मैसूर, मद्रास में कम होता है। उत्तर भारत में यह अधिक होता है। इसके पौधे जव के समान होते हैं। यद्यपि इसकी ३-४ जातियाँ होती हैं तथापि उपर्युक्त जाति ही अधिक बोई जाती है। इसके अनेक प्रकार होते हैं। इनमें भी शूक युक्त या विहीन भेद पाये जाते हैं। कड़ा, मुलायम तथा लाल एवं श्वेत आदि दाने के भेद होते हैं। खाने के लिये कड़े दाने वाला तथा स्टार्च के लिये मुलायम गेहूँ काम में लाया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन द्रव्य ८ से २४ भाग, कार्बोहाइड्रेट ६८-७०, स्नेह १-२ तथा राख १.५- २ भाग रहती है। मुलायम गेहूँ में प्रोटीन कम रहता है। इसमें लोह, ताम्र, यशद, मैगनीज एवं मैगनेशियम् खनिज होते हैं। गुण और प्रयोग-इसको अन्न के रूप में उपयोग में लाया जाता है। चोकरयुक्त आटे की रोटी विबंध में लाभदायक रहती है। अथ शिम्बीधान्यम्। तत्रादौ तस्य नामान्याह शमीजाः शिम्बिजाः शिम्बीभवाः सूप्याश्च वैदलाः ।।३६।। शिम्बीधान्य के संस्कृत नाम-यमीज, शिम्बिज, शिम्बीभव, सूप्य और वैदल ये सब हैं। [३६] अथ शिम्बीधान्यस्य गुणानाह वैदला मधुरा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः । वातलाः कफपित्तघ्ना बद्धमूत्रमला हिमाः ।। ऋते मुद्गमसूराभ्यामन्ये त्वाध्मानकारिणः ।।३७।। शिम्बीधान्य-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, विपाक में कटुरसयुक्त, वातजनक, कफ तथा पित्त-नाशक, मूत्र तथा मल को बाँधने वाले ओर शीतल होते हैं। और शिम्बीधान्यों में मूँग तथा मसूर को छोड़कर शेष सभी आध्मान (अफरा) करने वाले होते हैं ।३७।। मुद्गमसूरयोराध्मानकारित्वमन्यवैदलापेक्षया, न तु सर्वथा, एतयोरपि किञ्चिदाध्मान-कारित्वदर्शनात् ।।३७।। “अन्य शिम्बी धान्यों की अपेक्षा मूँग और मसूर आध्मान करने वाले नहीं होते न कि सर्वथा आध्मान करने वाले नहीं होते, क्योंकि ये दोनों भी किंचित् मात्र आध्मान करनेवाले होते हैं, ऐसा देखा गया है"। [३७] अथ मुद्गः (मूँग) सभेदस्य तस्य गुणानाह मुद्गो रूक्षो लघुर्गाही कफपित्तहरो हिमः । स्वादुरल्पानिलो नेत्र्यो ज्वरघ्नो वनजस्तथा ।।३८।। मुद्गो बहुविधः श्यामो हरितः पीतकस्तथा । श्वेतो रक्तश्च तेषान्तु पूर्वः पूर्वो लघुः स्मृतः ।।३९।। सुश्रुतेन पुनः प्रोक्तो हरितः प्रवरो गुणैः । चरकादिभिरप्युक्त एष एव गुणाधिकः ।।४०।। मूँग-स्वादिष्ट, रूक्ष, लघु, ग्राही, कफ तथा पित्तनाशक, शीतल, किंचित् वायुकारक, नेत्र के लिये हितकर तथा ज्वरनाशक है और जंगल में उत्पन्न होने वाली मूँग गुणों में मूँग के समान ही है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA