भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धान्यवर्गः ७९७ मूँग के भेद और उनके गुण—श्याम, हरी, पीली, सफेद तथा लाल इन भेदों से मूंग कई प्रकार की होती है। और इनमें एक दूसरी की अपेक्षा पूर्व-पूर्व लघु होती है। (अर्थात्—लाल की अपेक्षा सफेद, सफेद से पीली, पीली से हरी, हरी से श्याम, लघु होती है।) किन्तु सुश्रुत ने तो विशेषतः और मूँगों की अपेक्षा हरीमूँग को गुणों में श्रेष्ठ बतलाया है। और चरकादि महर्षियों ने भी इसी को (हरी मूँग को) अधिक गुणकारी बतलाया है। [३८-४०] ४. मूँग हिं०—मूँग, मूंग। बं०—मुग। म०—मूँग, हिरवे मूग। गु०—मग, कच्छी। ता०—पच्चैयमेरू। क०—हेसरु। ते०—पच्चापेसलु। फा०—वुनुमाष, बनोमाश, माष। अ०—मजमाश, माष मज। अं०—Green Gram (ग्रीन् ग्राम)। ले०—Phaseolus aureus Roxb. (फेसीओलस् ऑरियस्)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह इस देश के खेतों में बोई जाती है और पश्चिमोत्तर हिमालय के ६ हजार फीट ऊँची भूमि में भी जङ्गली उत्पन्न होती है। इसका क्षुप—१-२ फुट ऊँचा होता है। इसके पत्ते—उड़द के समान होते हैं। समस्त क्षुप पर रेशमवत् बारीक रोवें होते हैं। फूल—पीले आते हैं। फलियाँ—१॥-२ इञ्च लम्बी और कुछ टेढ़ी होती हैं। बीज—हरे रंग के होते हैं। अन्दर की दाल पीले रंग की होती है। रासायनिक संगठन—इसमें प्रोटीन २२ भाग, कार्बोहाइड्रेट ५४-५६, स्नेह १.३-२.७, रेशा ४.१-५ एवं राख ३.६-४.४ भाग रहती है। गुण और प्रयोग—यह अन्य दालों की अपेक्षा हल्की एवं सुपाच्य होती है। मुद्ग यूष का उपयोग पथ्य के रूप में करते हैं। अथ माषः (उरद) तस्य गुणानाह माषो गुरुः स्वादुपाकः स्निग्धो रुच्योऽनिलापहः। स्रंसनस्तर्पणो बल्यः शुक्लो बृंहण परः ।।४१।। भिन्नमूत्रमलः स्तन्यो मेदःपित्तकफप्रदः। गुदकीलादितश्वासपक्तिशूलानि नाशयेत् ।।४२।। कफपित्तकरा माषाः कफपित्तकरं दधि। कफपित्तकरा मत्स्या वृन्ताकं कफपित्तकृत् ।।४३।। उरद—गुरु, विपाक में मधुररसयुक्त, स्निग्ध, रुचिकारक, वातनाशक, स्रंसन, सन्तर्पण करने वाला, बलकारक, शुक्र-जनक, अत्यन्त बृंहण, (रस-रक्तादि वर्धक), मूत्र तथा मल का भेदन करने वाला, दुग्धवर्धक, मेद-पित्त-कफ को बढ़ाने वाला एवम्-गुदकील-अर्दितवात (मुँह का लकवा)-श्वास-पंक्तिशूल (अन्न के पचने पर शूल होना) इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है। कफ तथा पित्त कारक द्रव्य चतुष्टय-उरद, दही, मछली और बैंगन ये चारों द्रव्य कफ तथा पित्त को बढ़ाने वाले होते हैं। [४१-४३] ५. उड़द हिं०—उड़द, उड़िद, उरिद, उर्दी। बं०—माष कलाय। म०—उड़ीद। ता०—उलुंदु। गु०—अडद। क०—उड्डु। ते०—उद्दुल। फा०—माष। अ०—माषा। अं०—Black Gram (ब्लॅक् ग्राम्)। ले०—Phaseolus mungo Linn. (फेसीओलस् मुंगो)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। उड़द इस देश में बहुत प्रसिद्ध है। इसकी उपज हर प्रान्त में होती है। इससे दाल, बड़े इत्यादि बनते हैं। इसका क्षुप—झाड़ीदार फैला हुआ, एक फीट ऊँचा, अनेक शाखायुक्त एवं रोमावृत होता है। पुष्प—पीले होते हैं। फली—पतली, गोल, १ १/२-२ १/२ इञ्च लम्बी एवं बीजों के बीच-बीच में भीतर दबी हुई होती है। बीज-८ से