भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९८ भावप्रकाशनिघण्टुः १५, काले या गहरे भूरे या कभी-कभी हरे होते हैं। ये हरे होते हुये भी मूँग की तरह अन्दर से पीले न होकर सफेद होते हैं। 'भावप्रकार इसके दो भेद माष एवं महामाष या राजमाष (श्वेत, रक्त, कृष्ण) लिखते हैं। उपर्युक्त उड़द के छोटे तथा बड़े भी भेद जाते हैं जिनमें बड़े में दाने कुछ काले तथा अच्छे होते हैं। ये दोनों भिन्न-भिन्न काल में बोये जाते हैं। संभव है भावप्रकाशोक्त महामाष बड़े काले रंग की उड़द का प्रकार हो या जिसका आगे लोबिया के नाम से वर्णन किया गया है वह हो। रासायनिक संगठन-इसमें फॉस्फोरिक अॅसिड की मात्रा अन्य दालों की अपेक्षा ५ से १० गुना अधिक रहती है। इसमें प्रोटीन २२, कार्बोहाइड्रेट ५५, तेल १ एवं राख ४ भाग रहती है। इसके प्रोटीन भी अन्य दालों की तरह न होकर कुछ मांस के समान होते हैं। गुण और प्रयोग-यह मधुर, बल्य, वृष्य, बृंहण, उष्ण, वातनाशक, कफपित्त वर्धक एवं स्तन्यजनन है। वातविकार एवं संधिरोग में इसका क्वाथ देते हैं। हड्डियों में पीड़ा होने से यदि निद्रानाश हो तो इसकी जड़ देते हैं। यह मादक होती है। वातविकारों में बाह्याभ्यन्तर उड़द का उपयोग किया जाता है। उड़द के लड्डू नाड़ी संस्थान के लिये बल्य हैं। अथ राजमाषः (बोड़ा) । यस्य च “वेरातरा-लोबिया” इत्यादयो भेदाः । तस्य नामानि तद्भेदगुणाँश्चाह राजमाषो महामाषश्चपलश्च बलः स्मृतः । राजमाषो गुरुः स्वादुस्तुवरस्तर्पणः सरः ।।४४।। रूक्षो वातकरो रुच्यः स्तन्यो भूरिबलप्रदः । श्वेतो रक्तस्तथा कृष्णस्त्रिविधः स प्रकीर्त्तितः ।। यो महांस्तेषु भवति स एवोक्तो गुणाधिकः ।।४५।। राजमाष के संस्कृत नाम-राजमाष, महामाष, चपल तथा बल ये सब हैं। इसी के “बेरातरा”, “लोबिया” इत्यादि लोक में भेद होते हैं। राजमाष-गुरु, स्वादिष्ट तथा कषाय रस युक्त, सन्तर्पण करने वाला, सारक, रूक्ष, वातकारक, रुचिकारक, दुग्धवर्धक तथा अत्यन्त बलकारक होता है। भेद-सफेद, लाल तथा काला इन भेदों से यह तीन प्रकार का होता है। गुण-इनमें जो बड़ा होता है वही सबसे अधिक गुणशाली समझा जाता है। [४४-४५] नोट-राजमाष से कुछ लोग लोबिया का ग्रहण करते हैं तथा कुछ पूर्वोक्त उड़द का काले रंग का बड़ा भेद लेते हैं। यहाँ लोबिया का वर्णन किया जा रहा है। ६. राजमाष (लोबिया) हिं०-राजमाष, बोड़ा, चौरा, लोबिया । बं०-बरबटी कलाय, बर्बटी। म०-ववलया, अलंसंदे । गु०-चोला । क०-अलसंदे । ते०-अलसन्दुलु । ता०-करामणि । फा०-लोवह, लोविया । अ०-फरिका, फ़िरीका । अं०- Chinese Beans (चाइनीज बीन); Cowpeas (काउपौज)। ले०-Vigna catiang Walp. (विग्ना कँटियङ्ग) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । इसकी अनेक स्थानों पर खेती की जाती है। यह वर्षायु, अनेक मांसल पतले काण्ड के द्वारा जमीन पर फैलने वाला क्षुप है। पत्ते-त्रिपत्रक एवं लंबेवृन्तवाले; पत्रक, बड़े, गहरे हरे एवं अंडाकार होते हैं। पुष्प-पर्व से ३-६ एक साथ, एक इञ्च व्यास के, श्वेत, हलके गुलाबी, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA