भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धान्यवर्गः ७९९ हलके नीले रंगों के भेद से २, ३ प्रकार के होते हैं जो मुरझाने के समय भीतर से पीले हो जाते हैं। फली-पतली, गोल एवं विभिन्न प्रकार के अनुसार भिन्न-भिन्न लम्बाई की होती है। लम्बी १८ इञ्च से २ फीट तक एवं छोटी ४ से ५ इञ्च तक हुआ करती है। बीज-फली के अनुसार छोटे तथा बड़े एवं रंग में प्रकार के अनुसार क्रीम जैसे, भूरे, फीके लाल, हलके बैंगनी या काले हुआ करते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में प्रोटीन २४.६, कार्बोहाइड्रेट ५५.७, स्नेह ०.७, रेशा ३.८, राख ३.२ एवं आर्द्रता १८ भाग रहती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज मूत्रल तथा आमाशय बलप्रद एवं कृमिनाशक हैं। यह अच्छा पोषक द्रव्य है। अथ निष्पावः । स तु राजशिम्बीबीजम् (भटवाँसु) इति लोके । तस्यनामानि गुणाँश्चाह निष्पावो राजशिम्बिः स्याद्वल्लकः श्वेतशिम्बिकः। निष्पावो मधुरो रूक्षो विपाकेऽम्लो गुरुः सरः ।।४६।। कषायः स्तन्यपित्तास्रमूत्रवातविबन्धकृत् । विदाह्युष्णो विषश्लेष्मशोथहृच्छुक्रनाशनः ।।४७।। निष्पाव यह लोक में राजशिम्बी का बीज अथवा भटवांसु इस नाम से प्रसिद्ध है। इसके संस्कृत नाम-निष्पाव, राजशिम्बि, वल्लक तथा श्वेतशिम्बिक ये सब हैं। निष्पाव-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में अम्लरसयुक्त, रूक्ष, गुरु, सारक, विदाही, उष्ण और दुग्ध-पित्त तथा रक्त को बढ़ाने वाला, मूत्र तथा वात का विबन्ध करने वाला एवम्- विष-कफ-शोथ तथा शुक्र का नाशक होता है। [४६-४७] ७. निष्पाव हिं०-निष्पाव, भटवासु, बल्लार, सेम । बं०-मखानसिम । म०-पावटे, वाल । गु०-ओलीया, ओलियवाल । क०-अवरे । ते०-अनुमुल । ता०-मोचै । अं०-Flat Bean (फ्लैट बीन) । ले०-Dolichos lablab Linn. (डीलिकोस् लबलब्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह जंगली तथा कृषित दोनों प्रकार का सभी स्थानों पर होता है। दक्षिण में विशेष रूप से मैसूर में यह अधिक होता है। इसकी लता होती है। पत्ते-त्रिपत्रक होते हैं। पुष्प-सीधे दण्ड पर विभिन्न रंगों के किन्तु विशेष रूप से गुलाबी और श्वेत रहते हैं। फली-आयताकार, ३ इञ्च लम्बी तथा ४ से ६ बीज युक्त होती है। हरी फलियों के ऊपर की तैल ग्रन्थियों से दुर्गन्धयुक्त तैल निकलता है। इसके अनेक प्रकार, बीजों के रंग, आकार आदि के अनुसार होते हैं। रासायनिक संगठन-अखंड बीज में जल १४.६, प्रोटीन १७.१, स्नेह २.२, कार्बोहाइड्रेट ५७.४, रेशा ५.० एवं राख ३.६ भाग रहती है। दाल में जल १२.१, प्रोटीन २४.४, स्नेह १.५, कार्बोहाइड्रेट ५७.८, रेशा १.२ एवं राख ३ भाग रहती है। गुण और प्रयोग-इसकी हरी फलियों का साग खाया जाता है। कफज विकारों में इसे देते हैं। मूल विषैले माने जाते हैं। अथ वनमुद्गः (मोठ) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह मकुष्ठो वनमुद्गः स्यान्मकुष्ठकमुकुष्ठकौ ।।४८।। मकुष्ठो वातलो ग्राही कफपित्तहरो लघुः । वह्निजिन्मधुरः पाके कृमिकृज्ज्वरनाशनः ।।४९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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