भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 851, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 851

८०० भावप्रकाशनिघण्टुः मोठ के संस्कृत नाम—मकुष्ठ, वनमुद्ग, मकुष्ठक और मुकुष्ठक ये सब हैं। मोठ—वातकारक, ग्राही, कफ तथा पित्त की नाशक, लघु, अग्नि को जीतने वाली, पाक में मधुर रसयुक्त, कृमिकारक तथा ज्वरनाशक होती है। [४८-४९] ८. मोठ हिं०—मोठ, मोट। बं०—वनमूग। म०—मटक्या, मठ। गु०—मठ। क०—मडकी। ते०—वनमुद्ग चेट्टु। ता०—तुलक्कप्यारै। फा०—माषहिन्दी, माशाहिन्दी। अं०—Aconite Leaved Kidney Bean (एकोनाईट लीव्ड कीडनी बीन्)। ले०—Phaseolus aconitefolius Jacq. (फेसीओलस एकोनाइटीफोलीयस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह भी अनेक प्रान्तों में होती है। इसका क्षुप—मुद्गपर्णी की तरह फैला हुआ तथा अल्प रोमश होता है। पत्ते— त्रिपत्रक होते हैं। पुष्प—छोटे होते हैं। फली—दृढ़ तथा बीज बड़े होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें प्रोटीन २३, कार्बोहाइड्रेट ५६, अत्यल्प तेल, रेशा ४ तथा राख ३ १/२ भाग रहती है। गुण और प्रयोग—आहार के रूप में दाल का उपयोग किया जाता है। इसको ज्वर में देते हैं। मूल मादक होता है। अथ मसूरः (मसूरी)। तस्य नामानि गुणांश्चाह मङ्गल्यको मसूरः स्यान्मङ्गल्या च मसूरिका। मसूरो मधुरः पाके संग्राही शीतलो लघुः ।। कफपित्तास्रजिद्रूक्षो वातलो ज्वरनाशनः ।।५०।। मसूरी के संस्कृत नाम—मङ्गल्यक, मसूर, मङ्गल्या तथा मसूरिका ये सब हैं। मसूरी—विपाक में मधुर रसयुक्त, ग्राही, शीतल, लघु, वातकारक, रूक्ष एवम्—कफ-पित्त-रक्तविकार तथा ज्वर को दूर करने वाली होती है। [५०] ९. मसूर हिं०—मसूर, मसूरक, मसूरी। बं०—मसुरी। म०—मसुर। गु०—मसूर। क०—चणगि। ता०—मिसुर। ते०— मसूर पप्पु। फा०—बुनो सुर्ख, नेव सुर्ख, विसुक, मरजूनक। अ०—अदस्। अं०—Lentil (लॅटिल)। ले०— Ervum lens Linn. (एवम् लेन्स); Lens culinaris Medic (लेन्स कलिनेरिस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह समस्त भारत में शीतऋतु में बोया जाता है। इसका क्षुप—१ से २ फीट ऊँचा, सीधा, झाड़ी दार एवं चने की तरह होता है पत्ते—संयुक्त, पक्षवत् एवं अग्र सूत्रसम होता है। पत्रक—४ से ६ जोड़े, अवृन्त, भालाकार एवं छोटे होते हैं। पुष्प—सफेद, बैंगनी या गुलाबी, विभिन्न प्रकार के भेदानुसार होते हैं। फली—छोटी, १/२ इञ्च लम्बी एवं दो बीज युक्त होती है। बीज—गोल, किंचित् चिपटे तथा भूरे रंग के होते हैं। दाल—लाल रंग की होती है। रासायनिक संगठन—दाल में प्रोटीन २५, कार्बोहाइड्रेट ६०, स्नेह १ तथा राख २ भाग रहती है। गुण और प्रयोग—दाल की तरह इसे खाते हैं। यह पौष्टिक किन्तु उष्ण मानी जाती है। विगंध में इसको देते हैं। पुराने व्रण में इसको पीसकर लगाते हैं।