भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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धान्यवर्गः ८०१ अथाढकी (अरहर) । तस्य नामगुणानाह आढकी तुवरी चापि सा प्रोक्ता शणपुष्पिका ।। ५१ ।। आढकी तुवरा रूक्षा मधुरा शीतला लघुः । ग्राहिणी वातजननी वर्ण्या पित्तकफास्रजित् ।। ५२ ।। अरहर के संस्कृत नाम-आढकी, तुवरी और शणपुष्पिका ये सब हैं। अरहर-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, ग्राही, वातजनक, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाली एवम्-पित्त-कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली है। [५१-५२] १०. अरहर हिं०-अरहड़, अड़हर, रहर, रहरी, रहड़, तूर। बं०-आहरी, अडर। म०-तुरी, तूर। गु०-तुरदाल्य, तुवर। क०-तोगरि। ते०-कंदुलु। ता०-तोवरै। फा०-शाखल। अ०-शाखुल, शांज। अं०-Pigeon Pea (पीजन् पी); Red Gram (रेड ग्राम)। ले०-Cajanus indicus Spreng. (केजेनस् इण्डीकस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष-४-१० फी ऊँचा एवं झाड़दार होता है। पत्ते-त्रिपत्रक रहते हैं। पत्रक-१।।-२ इञ्च लम्बे एवं आयताकार भालाकार होते हैं। इनके अधःपृष्ठ पर सूक्ष्म ग्रन्थियाँ होती हैं। पुष्प-पीले एवं बैंगनी धारीयुक्त होते हैं। फलियाँ-२-४ इञ्च लम्बी होती हैं। प्रत्येक फली में ३ से ५ तक बीज रहते हैं। बीज को ही अरहर कहते हैं। यद्यपि इसके अनेकों भेदोपभेद होते हैं तथापि इनके दो प्रकार (Variety), अरहर एवं तूर (Var. bicolor; var. flavas) होते हैं। प्रथम का वर्णन ऊपर दिया हुआ है। द्वितीय में क्षुप छोटा, पुष्प पीत, फली छोटी एवं २ से ३ बीजयुक्त हुआ करती है। यह जल्दी परिपक्व होती है। बीजों से दाल बनाने की दो विधियां प्रचलित हैं। एक में आर्द्र करके बनाते हैं तथा दूसरे में वैसे ही दल कर बनाते हैं। दल कर बनाने में दाल अच्छी होती है तथा जल्दी पकती है किन्तु दलने में टूटने से महँगी पड़ती है। भिंगो कर बनाने में अधिक दाल निकलती है किन्तु यह देर में पकती है। अच्छी दाल मोटी, छोटी तथा गोल होती है तथा दूसरी चिपटी, बीच में छोटे गर्तदार, पतली तथा बड़ी होती है जो जल्दी नहीं पकती। रासायनिक संगठन-दाल में प्रोटीन २२.३, स्नेह १.७, खनिज ३.६, कार्बोहाइड्रेट ५७.२ भाग एवं खटिक, फास्फोटस, विटामिन 'ए' तथा 'बी' १ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसका भोजन में बहुत उपयोग किया जाता है। इसके पत्ते तथा दाल को पीसकर, गरम करके स्तन पर दूध बंद करने के लिये बाँधते हैं। दाल के लेप से शोथ कम होता है। कामला में पत्तों का रस जरासा सेंधव मिलाकर पिलाते हैं। अथ चणकः (चना) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह चणको हरिमन्थः स्यात्सकलप्रिय इत्यपि। चणकः शीतलो रूक्षः पित्तरक्तकफापहः । लघुः कषायो विष्टम्भी वातलो ज्वरनाशनः ।। ५३ ।। चना के संस्कृत नाम-चणक, हरिमन्थ और सकलप्रिय ये सब हैं। चना-कषायरसयुक्त, शीतल, रूक्ष, लघु, विष्टम्भक, वातकारक एवम्-पित्त-रक्तविकार-कफ तथा ज्वर का नाशक है। [५३] ५४ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA