भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 853

८०२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ भर्जनादिभेदेन तस्य गुणभेदानाह स चाङ्गारेण सम्भृष्टस्तैलभृष्टश्च तद्गुणः । आर्द्रभृष्टो बलकरो रोचनश्च प्रकीर्तितः ॥५४॥ शुष्कभृष्टोऽतिरूक्षश्च वातकुष्ठप्रकोपणः । स्विन्नः पित्तकफं हन्यात् सूपः क्षोभकरो मतः ॥५५॥ आर्द्रोऽतिकोमलो रुच्यः पित्तशुक्रहरो हिमः । कषायो वातलो ग्राही कफपित्तहरो लघुः ॥५६॥ भुने हुए आदि भेदों से चने के गुणों के भेद—अङ्गारे (केवल अग्नि) से भुने हुये चने के गुण—यदि चना केवल अग्नि से भुना हुआ हो तो पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है। तेल में भुना हुआ चना भी पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है। गीला भुना हुआ चना—बलदायक तथा रुचिकारक होता है। सुखा भुना हुआ चना—अत्यन्त रूक्ष एवं वात तथा कुष्ठ को कुपित करने वाला होता है। उबाला हुआ चना—पित्त तथा कफ का नाशक होता है। चने की राँधी हुई दाल—क्षोभ उत्पन्न करने वाली होती है। भिगोया हुआ चना—कषाय रसयुक्त, अत्यन्त कोमल, रुचिकारक, शीतल, वातजनक, ग्राही, लघु एवम्—पित्त, शुक्र तथा कफ-पित्त को नष्ट करने वाला होता है। इसके पत्तों के गुण आगे शाक वर्ग में दिये हुवे हैं। [५४-५६] ११. चना हिं०—चने, छोला, रहिला, बूँट। म०—हरबरा, चणें। बं०—छोला। गु०—चण्या, चणा। क०—कडले। ता०—कडलै। ते०—सनगलु। फा०—नखूद। अ०—इमस। पं०—छोले। अं०—Gram (ग्राम); Bengal Gram (बंगाल ग्राम); Chick Pea (चिक् पी)। ले०—Cicer arietinum Linn. (सीसर् एरीएटीनम्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में प्रतिवर्ष इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप—सीधा या फैला हुआ, अनेक शाखायुक्त, १ से १ १/२ फीट ऊँचा एवं रोमश होता है। पत्ते—पक्षवत् होते हैं जिनके पत्रक दीर्घवृत्ताभ, ६ मि० मी० चौड़े, दन्तुर एवं ग्रन्थियुक्त रोमों से आवृत रहते हैं। पुष्प—छोटे, एकाकी तथा पत्रकोण में आते हैं जो विभिन्न प्रकारों में भिन्न-भिन्न रंग एवं नाप के होते हैं। फली—आयताकार, ३/४-१ इञ्च लम्बी तथा प्रायः दो बीजों से युक्त होती है। बीज—गोल, नोकदार, ०.२-०.४ इञ्च व्यास के, चिकने या सिकुड़नदार, भूरे, पीले या श्वेत रंग के होते हैं। पत्तों पर रहने वाले रोम ग्रन्थियों से एक प्रकार का अम्ल स्राव होता है जिसका पहले हरीतक्यादि वर्ग (पृ० १६२) में 'चणकाम्ल' के नाम से वर्णन किया जा चुका है। चने के रंग तथा नाप के अनुसार कई भेद किये गए हैं जिनमें मुख्य दो वर्ग हैं। प्रथम में सभी रंगों के चने आते हैं। दूसरे में काबुली आते हैं जो सफेद एवं बहुत बड़े होते हैं। कुछ विद्वानों ने काबुली के क्षुप को भिन्न जाति (Species) का माना है। रासायनिक संगठन—चने में प्रोटीन १७.१, स्नेह ५.३, खनिज २.७, रेशा ३.९, कार्बोहाइड्रेट ६१.२, खटिक, फास्फोरस, विटामिन 'ए' तथा बी १ एवं आर्द्रता ९.८ रहती है। छिलके निकाले भुने हुये चने में प्रोटीन २२.५, स्नेह ५.२, खनिज २.२, रेशा, कार्बोहाइड्रेट ५८.९, खटिक, फास्फोरस एवं आर्द्रता ११.२ रहती है। गुण और प्रयोग—चने का विभिन्न रूपों आहार द्रव्य के रूप में उपयोग किया जाता है। अथ कलायः (मटर) । तस्य नामगुणानाह कलायो वर्तुलः प्रोक्तः सतीनश्च हरेणुकः । कलायो मधुरः स्वादुः पाके रूक्षश्च शीतलः ।।५७।। मटर के संस्कृत नाम—कलाय, वर्तुल, सतीन तथा हरेणुक ये सब हैं। मटर—मधुर रसयुक्त, विपाक में भी मधुर, रूक्ष तथा शीतल होता है। इसके साग का वर्णन आगे शाकवर्ग में दिया हुआ है। [५७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA