भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
८०२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ भर्जनादिभेदेन तस्य गुणभेदानाह स चाङ्गारेण सम्भृष्टस्तैलभृष्टश्च तद्गुणः । आर्द्रभृष्टो बलकरो रोचनश्च प्रकीर्तितः ॥५४॥ शुष्कभृष्टोऽतिरूक्षश्च वातकुष्ठप्रकोपणः । स्विन्नः पित्तकफं हन्यात् सूपः क्षोभकरो मतः ॥५५॥ आर्द्रोऽतिकोमलो रुच्यः पित्तशुक्रहरो हिमः । कषायो वातलो ग्राही कफपित्तहरो लघुः ॥५६॥ भुने हुए आदि भेदों से चने के गुणों के भेद—अङ्गारे (केवल अग्नि) से भुने हुये चने के गुण—यदि चना केवल अग्नि से भुना हुआ हो तो पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है। तेल में भुना हुआ चना भी पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है। गीला भुना हुआ चना—बलदायक तथा रुचिकारक होता है। सुखा भुना हुआ चना—अत्यन्त रूक्ष एवं वात तथा कुष्ठ को कुपित करने वाला होता है। उबाला हुआ चना—पित्त तथा कफ का नाशक होता है। चने की राँधी हुई दाल—क्षोभ उत्पन्न करने वाली होती है। भिगोया हुआ चना—कषाय रसयुक्त, अत्यन्त कोमल, रुचिकारक, शीतल, वातजनक, ग्राही, लघु एवम्—पित्त, शुक्र तथा कफ-पित्त को नष्ट करने वाला होता है। इसके पत्तों के गुण आगे शाक वर्ग में दिये हुवे हैं। [५४-५६] ११. चना हिं०—चने, छोला, रहिला, बूँट। म०—हरबरा, चणें। बं०—छोला। गु०—चण्या, चणा। क०—कडले। ता०—कडलै। ते०—सनगलु। फा०—नखूद। अ०—इमस। पं०—छोले। अं०—Gram (ग्राम); Bengal Gram (बंगाल ग्राम); Chick Pea (चिक् पी)। ले०—Cicer arietinum Linn. (सीसर् एरीएटीनम्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में प्रतिवर्ष इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप—सीधा या फैला हुआ, अनेक शाखायुक्त, १ से १ १/२ फीट ऊँचा एवं रोमश होता है। पत्ते—पक्षवत् होते हैं जिनके पत्रक दीर्घवृत्ताभ, ६ मि० मी० चौड़े, दन्तुर एवं ग्रन्थियुक्त रोमों से आवृत रहते हैं। पुष्प—छोटे, एकाकी तथा पत्रकोण में आते हैं जो विभिन्न प्रकारों में भिन्न-भिन्न रंग एवं नाप के होते हैं। फली—आयताकार, ३/४-१ इञ्च लम्बी तथा प्रायः दो बीजों से युक्त होती है। बीज—गोल, नोकदार, ०.२-०.४ इञ्च व्यास के, चिकने या सिकुड़नदार, भूरे, पीले या श्वेत रंग के होते हैं। पत्तों पर रहने वाले रोम ग्रन्थियों से एक प्रकार का अम्ल स्राव होता है जिसका पहले हरीतक्यादि वर्ग (पृ० १६२) में 'चणकाम्ल' के नाम से वर्णन किया जा चुका है। चने के रंग तथा नाप के अनुसार कई भेद किये गए हैं जिनमें मुख्य दो वर्ग हैं। प्रथम में सभी रंगों के चने आते हैं। दूसरे में काबुली आते हैं जो सफेद एवं बहुत बड़े होते हैं। कुछ विद्वानों ने काबुली के क्षुप को भिन्न जाति (Species) का माना है। रासायनिक संगठन—चने में प्रोटीन १७.१, स्नेह ५.३, खनिज २.७, रेशा ३.९, कार्बोहाइड्रेट ६१.२, खटिक, फास्फोरस, विटामिन 'ए' तथा बी १ एवं आर्द्रता ९.८ रहती है। छिलके निकाले भुने हुये चने में प्रोटीन २२.५, स्नेह ५.२, खनिज २.२, रेशा, कार्बोहाइड्रेट ५८.९, खटिक, फास्फोरस एवं आर्द्रता ११.२ रहती है। गुण और प्रयोग—चने का विभिन्न रूपों आहार द्रव्य के रूप में उपयोग किया जाता है। अथ कलायः (मटर) । तस्य नामगुणानाह कलायो वर्तुलः प्रोक्तः सतीनश्च हरेणुकः । कलायो मधुरः स्वादुः पाके रूक्षश्च शीतलः ।।५७।। मटर के संस्कृत नाम—कलाय, वर्तुल, सतीन तथा हरेणुक ये सब हैं। मटर—मधुर रसयुक्त, विपाक में भी मधुर, रूक्ष तथा शीतल होता है। इसके साग का वर्णन आगे शाकवर्ग में दिया हुआ है। [५७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ८०३ १२. मटर हिं०-मटर, मट्टर । बं०-मटर । म०-वाटाणे । गु०-मटाणा, वटाणा । क०-वटाणि । ते०-गुंडुसानगलु । ता०-पटाणी । फा०-जलबान, कसंग । अ०-खलज, हुब्बुल बकर । अं०-Field Pea (फील्ड पी); Garden Pea (गार्डन् पी) । ले०-Pisum sativum Linn. (पाइसम् सॅटिवम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । मटर-एक प्रसिद्ध खाद्य अन्न प्रायः सब प्रान्तों में प्रतिवर्ष बोया जाता है । इसका क्षुप-वर्षायु तथा सूत्रों के द्वारा आरोहणशील होता है । पत्ते-पक्षवत्, पत्रक १ से ३ जोड़े, अंतिम सूत्रों में परिवर्तित तथा पत्राधार फूला हुआ होता है । पुष्प-अनियमितकार द्विलिंगी एवं अपने वर्गविशिष्ट स्वरूप का होता है । फली-अनेक बीजों से युक्त, चिपटी, लम्बी तथा अग्र पर कुछ टेढ़ी नोकदार होती है । इसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं । रासायनिक संगठन- इसमें प्रोटीन २३, कार्बोहाइड्रेट ५४, स्नेह १, रेशा ५ एवं राख २ भाग रहती है । इसमें ट्राइगोनेल्लीन (Trigonelline) नामक क्षाराभ पाया जाता है । परिपक्व बीजों के तेल में लैंगिक हारमोन विरोधी गुण रहता है । इससे पौरुष हारमोन निष्क्रिय होकर वन्ध्यत्व प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग-कच्चे मटर से दस्त होते हैं । आहार में इसको अन्न की तरह व्यवहार में लाते हैं । अथ त्रिपुटः (खेसारी) । तस्य नामगुणानाह त्रिपुटः खण्डिकोऽपि स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । त्रिपुटो मधुरस्तिक्तस्तुवरो रूक्षणो भृशम् ।।५८।। कफपित्तहरो रुच्यो ग्राहकः शीतलस्तथा । किन्तु खञ्जत्वपङ्गुत्वकारी वातातिकोपनः ।।५९।। खेसारी-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, अत्यन्त रूक्ष, रुचिकारक, ग्राही, शीतल एवम् कफ तथा पित्त को नष्ट करनेवाली होती है और सेवन करने से लँगड़ा तथा पंगुला बना देने वाली और वायु को अत्यन्त कुपित करनेवाली होती है । [५८-५९] १३. खेसारी हिं०-खेसारी, खिसारी, कसूर, मटरभेद । बं०-खेसारी । म०-लाग । गु०-लांग । फा०-मासंग । अ०- इवुल बकर, खलज । अं०-Chickling Vetch (चिलिंग वेच) । ले०-Lathyrus sativus Linn. (लेथीरस् सेटीवस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है और उत्तर भारत में अधिक उत्पन्न होती है । इसकी शाखायें पंखदार होती हैं । पत्ते-पक्षवत् तथा अग्र २ या ३ सूत्रों में विभाजित रहते हैं । पत्रक पतले, १-२ १/२ इञ्च लम्बे, रेखाकार- भालाकार, लम्बाग्र एवं संख्या में २-४ रहते हैं । फूल-नीलापन युक्त लाल या श्वेत होते हैं । फलियाँ-१-१॥ इञ्च लम्बी, एक किनारे पर पंखदार तथा ४ से ५ बीजों से युक्त होती हैं । अकाल के समय गरीब इसकी दाल खाते हैं । इसका चारे के रूप में उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन-बीजों में एक विषैला पदार्थ होता है । गुण और प्रयोग-बीजों का तेल तीव्र तथा हानिकारक विरेचक होता है । इसकी दाल खाने से लकवा जैसा लॉथिरिज्म (Lathyrism) नामक रोग होता है । यह रोग जानवरों को भी होता है । कुछ विद्वानों के मत से इसके साथ मिले अन्य द्रव्यों के कारण यह रोग होता है ।
८०४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कुलत्थः (कुलथी) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुलत्थिका कुलत्थश्च कत्थन्ते तद्गुणा अथ ।।६०।। कुलत्थः कटुकः पाके कषायः पित्तरक्तकृत् । लघुर्विदाही वीर्योष्णः श्वासकासकफानिलान् ।।६१।। हन्ति हिक्काऽश्मरीशुक्रदाहानाहान् सपीनसान् । स्वेदसंग्राहको मेदोज्वरकृमिहरः सरः ।।६२।। कुलथी के संस्कृत नाम—कुलत्थिका तथा कुलत्थ ये दो हैं । कुलथी—कषायरसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, पित्त तथा रुधिर विकार को करने वाली, लघु, विदाही, उष्णवीर्य, पसीने को रोकने वाली, सारक एवम्—श्वास, कास, कफ, वायु, हिचकी, पथरी, शुक्र, दाह, आनाह (अफरा), पीनस, मेद, ज्वर तथा क्रिमि को दूर करने वाली होती है । [६०-६२] १४. कुलथी हिं०—कुरथी, कुलथी । म०—कुलीथ । क०—हूरूली । ते०—उलवलु । गु०—कुलथी । ता०—कोललु । फा०— किल्लत, माशाहिन्दी, इब्बुलक्कल । अं०—Horse gram (हॉर्स ग्राम) । ले०—Dolichos biflorus Linn. (डोलिकॉस् बाईफ्लोरस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । कुलथी—इस देश में प्रायः सर्वत्र होती है। दक्षिण में जानवरों को खिलाने के लिये इसकी बहुत खेती की जाती है। इसका क्षुप—झाड़ीदार, आरोहणशील, पतला, धूसर, रोमश, १२ से १८ इञ्च ऊँचा एवं मूल से अनेक पतली शाखाओं से युक्त होता है । पत्ते—त्रिपत्रक एवं २ इञ्च लम्बे वृन्तयुक्त होते हैं । पत्रक—पीताभ हरे, १ ३/८ इञ्च लम्बे, तिर्यक् अंडाकार एवं अग्र तीक्ष्ण और रोमश होता है । पुष्प—छोटे पीताभ श्वेत रंग के आते हैं । फली—चिपटी, १ १/२-२ इञ्च लम्बी, १/४ इञ्च चौड़ी तथा कुछ टेढ़ी होती है । बीज—५-६ हलके लाल, काले चितकबरे, चिपटे, १/८-१/४ इञ्च बड़े एवं चमकीले होते हैं । इसको विशेष रूप से घोड़ों को खिलाते हैं । इसको बिना दाल बनाये ही उपयोग में लाते हैं । गरीब इसको खाते हैं । रासायनिक संगठन—बीजों में प्रोटीन २२, स्नेह, ०.५, खनिज ३.१, रेशा ५.३, कार्बोहाइड्रेट ५७.३, खटिक ०.२८, फास्फोरस ०.३९%, लोह ७.६ मि० ग्रा०, निकोटिनिक् ॲसिड १.५ मि० ग्रा० एवं विटामिन 'ए' ११९ एकक प्रति १०० ग्राम में पाया जाता है । इसमें यूरिएस् (Urease) काफी होता है । गुण और प्रयोग—यह उष्ण, मूत्रल, वात-कफनाशक, मेदहर एवं अश्मरीघ्न है । इसका क्वाथ अश्मरी, श्वास, कास एवं श्वेतप्रदर में दिया जाता है । मात्रा—३ से ६ माशा । अथ तिलः । तस्य तद्भेदानां च गुणानाह तिलः कृष्णः सितो रक्तः सवन्योऽल्पतिलः स्मृतः । तिलो रसे कटुस्तिक्तो मधुरस्तुवरो गुरुः ।।६३।। विपाके कटुकः स्वादुः स्निग्धोष्णः कफपित्तनुत् । बल्यः केश्यो हिमस्पर्शस्त्वच्यः स्तन्यो व्रणे हितः ।।६४।। दन्त्योऽल्पमूत्रकृद् ग्राही वातघ्नोऽग्निमतिप्रदः । कृष्णः श्रेष्ठतमस्तेषु शुक्रलो मध्यमः सितः ।। अन्ये हीनतरः प्रोक्तास्तज्ज्ञै रक्तादयस्तिलाः ।।६५।। तिल का संस्कृत नाम—तिल ही है । भेद—काले, सफेद तथा लाल रङ्गों के भेद से तिल तीन प्रकार के होते हैं । जो तिल जङ्गलों में होता है वह वन्यतिल और अल्पतिल नाम से प्रसिद्ध है ।
धान्यवर्गः ८०५ तिल-कटु, तिक्त, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में कटुरस युक्त, स्वादिष्ट, गुरु, स्निग्ध, उष्ण, कफ तथा पित्तनाशक, बलकारक, केशों के लिये हितकर, स्पर्श में शीतल, त्वचा के लिये हितकर, दुग्धवर्धक, व्रण में लाभ पहुँचाने वाला, दांतों के विकारों को दूर करनेवाला, थोड़ा मूत्रकारक, ग्राही, वातनाशक, जठराग्नि तथा बुद्धि को बढ़ाने वाला होता है । तिलों में काला तिल—वीर्यवर्धक तथा सर्वोत्तम होता है । सफेद तिल—गुणों में मध्यम होता है । इससे अन्य जो लाल वगैरह तिल हैं वे गुणों अत्यन्त हीन हैं ऐसा निघण्टु के विद्वानों का मत है । [६३-६५] १५. तिल हिं०-तिल, तील, तिली । बं.-तिलगाछ । म०-तील । गु०-तल । क०-बुल्लेल्लु । ते०-नुव्वुलु । ता०-एल्लु । फा०-कुंजद । अ०-सिमासिम, बजरुलखस खासुलवरी । अं०-Gingelli (जिंजेल्ली), Sesame (सीसेम) । ले०-Sesamum indicum Linn. (सिमेमम्, इंडिकम्) ; Fam. Pedaliaceae (पेडालिएसी) । इसकी प्रायः सभी प्रान्तों में खेती की जाती है । इसका क्षुप-३१/२-४१/२ फीट ऊँचा, काण्ड चौपहल एवं अनेक शाखायुक्त होता है । पत्ते-नीचे से ऊपर विभिन्न प्रकार के, दन्तुर या अखण्ड होते हैं । पुष्प-विभिन्न रंगों के, श्वेत से लेकर गहरे बैंगनी रंग के एवं नलिकाकार द्वयोष्ठ होते हैं । फली-११/२ से २ इञ्च लम्बी, करीब १/२-१ इञ्च गोलाई में एवं अनेक बीजों से युक्त होती है । बीज-विभिन्न प्रकार के अनुसार श्वेत, मन्दश्वेत, हलके भूरे, गहरे भूरे या काले रंग के हुआ करते हैं । ये चिपटे, अंडाकार तथा एक इञ्च की लम्बाई में ६ से ८ तथा चौड़ाई में १० से १२ आते हैं । विभिन्न ऋतुओं में बोने के अनुसार इनके भेद हुआ करते हैं । रासायनिक संगठन-इनमें प्रकार तथा स्थानभेद से तेल की मात्रा ३७-५७% एवं कार्बोहाइड्रेट १४ से २२% एवं प्रोटीन २१ से २६% पाया जाता है । काले तिल में प्रोटीन अधिक तथा कार्बोहाइड्रेट कम रहता है । भूरे की अपेक्षा श्वेत में प्रोटीन अधिक पाया जाता है । ताजे पत्तों में काफी लुआब रहता है । गुण और प्रयोग-तिल का तथा इसके तेल का उपयोग नित्य के व्यवहार में किया जाता है । यह स्नेहन, आनुलोमिक, मूत्रजनन, बाजीकर, आर्तवजनन, स्तन्यजनन, बल्य, व्रणशोधन रोपण तथा केशवर्धन है । (१) अर्श में इसको मक्खन के साथ खिलाते हैं तथा पीसकर गरमकर इससे सेंकते हैं । (२) मछली खाकर अजीर्ण हो तो इसके पंचांग का क्षार देते हैं । उदर शूल में तिल को सुगंधि पदार्थ के साथ पीसकर गोली बनाकर देते हैं । तिल से दाँत मजबूत रहते हैं । (३) खाँसी में तिल का क्वाथ, चीनी मिलाकर पिलाते हैं । सूखी खाँसी में ताजे पत्तों का हिम थोड़ा-थोड़ा पिलाते हैं । (४) मूत्राश्मरी में तिलक्षार दूध तथा शहद के साथ देते हैं । (५) इसका गर्भाशय पर संकोचक प्रभाव होने से अनार्तव इत्यादि में इसका उपयोग करते हैं । (६) इसका पुल्टिस व्रण पर बाँधते हैं । तेल का भी उपयोग व्रण पर लगाने के लिये करते हैं । मात्रा-बीज १ से २ तोला; पंचांगक्षार ५ से १२ रत्ती । अथातसी (तीसी) । तस्या नामगुणानाह अतसी नीलपुष्पी च पार्वती स्यादुमा क्षुमा ।।६६।। अतसी मधुरा तिक्ता स्निग्धा पाके कटुर्गुरुः । उष्णा दृक्छुकवातघ्नी कफपित्तविनाशिनी ।।६७।। तीसी के संस्कृत नाम-अतसी, नीलपुष्पी, पार्वती, उमा तथा क्षुमा ये सब हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८०६ भावप्रकाशनिघण्टुः तीसी-मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध, विपाक में कटुरसयुक्त, गुरु, उष्ण एवम् नेत्रों की शक्ति, शुक्र, वात, कफ तथा पित्त को दूर करनेवाली होती है ।।६६-६७।। १६. तीसी हिं०-तीसी, तिसी, अलसी, मसीना । बं०-तिसी, मसीना । म०-जवंस, अठशी । गु०-अलशी । क०- अगसि । ते०-अविसि । ता०-अलिविराई । फा०-तुख्मे कृतान, वजुरग, वजुर्ग । अ०-बजरूल कतान, बजरूल कनान, वजरुलकतां । अं०-Common Flax (कामन फ्लेक्स), Linseed (लिन्सीड) ले०-Linum usitatissimum Linn. (लीनम् यूसिटेटिसिमम्) Fam. Linaceae (लिनेसी) । तीसी-प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में बोई जाती है । इसका पौधा-१।।-२ फीट ऊँचा होता है । पत्ते-छोटे, रेखाकार या भालाकार एवं ३ शिराओं से युक्त होते हैं । फूल-नीले रंग के घंटाकार; फल-गोल घुंडी सा ऊपर को नोकीला एवं ५ कोषयुक्त होता है । बीज-प्रत्येक कोष में १० के करीब, चिपटे, चिकने, गहरे भूरे एवं चमकीले होते हैं । पीले एवं श्वेत रंग के बीजों के भेद मध्यभारत तथा राजपुताना में होते हैं । बड़े में अधिक मात्रा में तथा कुछ हलके रंग का निकलता है । भूरे में भी छोटे-बड़े भेद होते हैं । बड़े में तेल अधिक रहता है । इसके बीज एवं तेल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । तेल का वार्निश, पेण्ट आदि में उपयोग करते हैं । कांड से लिनेन (Linen) तन्तु बनाते हैं जिसके कपड़े बनाये जाते हैं । रासायनिक संगठन-तीसी में तेल ३८ से ४५% रहता है । घानी से निकालने में २५-३०% ही प्राप्त होता है । इसमें प्रोटीन २०-२५%, पिच्छिल द्रव्य ६%, मोम, राल, फास्फोट, शर्करा १८% एवं अल्प ग्लाइकोसाइड, लिनामेरिन (Linamarin) रहता है । इसके पुष्प एवं अपक्व बीजों में हाइड्रोसाइनिक् अम्ल ०.६९% तक एवं क्षाराभ लिपरीन (Liparine) रहता है । गुण और प्रयोग-इसके बीज, स्नेहन, मार्दवकर, बल्य, वेदनास्थापन, मूत्रजनन एवं वातहर हैं । तेल विरेचन एवं व्रणरोपण है । (१) इसके तेल को या बीजों को सौम्यविरेचक रूप में देते हैं । (२) बीजों को कूटकर, पानी मिलाकर, पकाकर, पुल्टिस के रूप में शोथ आदि पर बाँधने से नवीन शोथ दब जाता है या पककर जल्दी फूट जाता है । इसका तेल तथा चूने का पानी मिला जले पर लगाते हैं । (३) इसके बीजों का फाँट खाँसी में देते हैं । मात्रा-तेल २ से ४ ड्राम; बीज १ बड़ा चम्मच । अथ तुवरी ("तोरी, तोडिस" इति लोके) । तस्य गुणानाह तुवरी ग्राहिणी प्रोक्ता लघ्वी कफविषास्रजित् । तीक्ष्णोष्णा वह्निवा कण्डूकुष्ठकोष्ठक्रिमिप्रणुत् ।।६८।। तुवरी (जिसे लोक में तोरी या तोडिस कहते हैं) के गुण—तोरी-ग्राही, लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, जठराग्निवर्धक एवम्-कफ, विष, रक्तविकार, खुजली, कुष्ठ तथा कोष्ठस्थित क्रिमि को दूर करनेवाली होती है । [६८] १७. तोरी हिं०-तोरी, तीरा, लाही, तारा, मिरा, सेओहा, तिहरा । पं०-असू, तारा । बं०-सेतसरिश । अं०-Rocket Salad (राकेट सलाद) । ले०-Eruca sativa Mill. (एरुका सटाइवा) । Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी) ।
धान्यवर्गः ८०७ यह पश्चिम हिमालय में १० हजार फीट की ऊँचाई तक होती है। उत्तरभारत में इसकी खेती की जाती है। पंजाब एवं अल्पमात्रा में उत्तर प्रदेश तथा ग्वालियर में शीतकालीन फसलों के साथ इसको बोते हैं। इसका क्षुप-सरसों के जैसा होता है। यह २ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-३ से ७ इञ्च लम्बे, मांसल, दन्तुर, आधे से अधिक पक्षवत् खण्डित एवं खण्ड प्रायः रेखाकार-आयताकार होते हैं। पुष्प-बड़े, श्वेताभ या पीताभ एवं बैंगनी शिराओं से युक्त होते हैं। फली-एक इञ्च लम्बी, सीधी, ऊपर की ओर उठी हुई एवं काण्ड से लगी हुई होती है। बीज- अनेक, छोटे, हल्के रक्ताभ भूरे, अंडोकार, चिकने एवं प्रत्येक कोष्ठ में दो कतारों में रहते हैं। राई, सरसों में इसकी मिलावट की जाती है। इसके तेल को लोग जलाने, खाने एवं मालिश इत्यादि के काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में २०% हल्के पीले रंग का, कुछ कड़वा एवं तीक्ष्ण गंध का तेल प्राप्त होता है। उत्तर प्रदेश के बीजों का तेल पंजाब की अपेक्षा कम तीक्ष्ण होता है। यह तेल ५, ६ महीने रखने से उसकी तीक्ष्णता कम हो जाती है। इसमें एक तीक्ष्ण गंध का उड़नशील तेल भी होता है जिसे चर्म पर लगाने से दाह होता है। गुण और प्रयोग-इसके नये पत्ते दीपन एवं मूत्रल होते हैं। इसके बीज सरसों की तरह प्रतिक्षोभक होते हैं। चर्मरोगों में तेल का उपयोग किया जाता है। कोमल पौधों का साग बनाते हैं। अथ सर्षपो रक्तः-पीतश्च (लाल सरसों और पीली सरसों)। तयोर्नामगुणानाह सर्षपः कटुकः स्नेहस्तुन्तुभश्च कदम्बकः । गौरस्तु सर्षपः प्राज्ञैः सिद्धार्थ इति कथ्यते ॥६९॥ सर्षपस्तु रसे पाके कटुः स्निग्धः सतिक्तकः । तीक्ष्णोष्णः कफवातघ्नो रक्तपित्ताग्निवर्धनः ॥७०॥ रक्षोहरो जयेत्कण्डूं कुष्ठकोष्ठक्रिमिग्रहान् । यथा रक्तस्तथा गौरः किन्तु गौरो वरो मतः ॥७१॥ सरसों (लाल सरसों) के संस्कृत नाम-सर्षप, कटुक, स्नेह, तुन्तुभ और कदम्बक ये सब हैं। सफेद सरसो (पीली सरसों) का संस्कृत नाम-गौर सर्षप और सिद्धार्थ है। सरसों-विपाक में कटुरस युक्त, स्निग्ध, कटु तथा तिक्त रसयुक्त तीक्ष्ण, उष्ण, कफ और वात का नाशक, रक्तपित्त तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाला, रक्षों की बाधा को दूर करनेवाला एवम् खुजली, कुष्ठ, कोष्ठस्थित क्रिमि तथा ग्रहबाधा को नष्ट करनेवाला होता है। सफेद सरसों, गुणों में यद्यपि लाल सरसों के समान ही है तथापि अपेक्षाकृत सफेद ही उत्तम होता है। सरसों के शाक का वर्णन आगे शाकवर्ग में दिया हुआ है। [६९-७१] १८. सरसों हिं०-सरसों, सरिसों, ससों। बं०-सरीसा। म०-शिरशी। गु०-शरशव, सरशव। क०-सासवे। ते०- आबालु। ता०-कुडुगु। फा०-सर्षक, सरशफ, सिपन्दान। अ०-उर्फे अबीयद, खर्दले अबयज, हुर्फ। अं०- Yellow Sarson (यलो सरसों); Indian Colza (इण्डियन् कोलझा)। ले०-Brassica campestris var. sarson Prain (ब्रासिका केम्पेस्ट्रिस् वेराइटी सरसों)। Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं पंजाब में यह अधिक होती है। इसका क्षुप-३ से ५ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-काण्ड की जड़ से सटे हुए, लम्बे, गहरे कटे किनारे वाले और चिकने होते हैं। फूल-अत्यन्त सुहाबने पीले रंग के आते हैं। फलियाँ-२-३ इञ्च लम्बी और गोल होती हैं। इनमें से जो पीले रंग के बीज निकलते हैं उन्हीं को सरसों कहते हैं। इसके कई प्रकार पाये जाते हैं। रंग भेद से पीला तथा भूरा, फली में के कोष्ठ की संख्यानुसार (२, ३, ४), फली की काण्ड के साथ की स्थिति, लटकी हुई या सीधी खड़ी के अनुसार ये भेद होते हैं। इससे 'सरसों का तेल' निकालते हैं। सरसों के खाने के तेल में इसकी अन्य जातियों के बीजों का तेल भी मिला रहता है।
८०८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन- इसमें ३५ से ४८% स्थिर तैल, ०.२७% उड़नशील तैल एवं प्रोटीन २०% एवं एरुसिक् एसिड (Erucic acid) रहता है। गुण और प्रयोग- इसका तेल खाने एवं मालिश के काम आता है। आमवातादि में कपूर मिलाकर इससे मालिश की जाती है। गरम जल में इसको मिलाकर पुलटिस के रूप में इसका प्रयोग करते हैं। इसमें का उड़नशील तैल प्रतिक्षोभक होता है एवं इसको चर्म पर लगाने से फोड़े आ सकते हैं। अथ राजिका कृष्णराजिका च (राई, कृष्णराई)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह राजीतु राजिका तीक्ष्णगन्धा क्षुज्जनिकाऽऽसुरी। क्षवः क्षुताभिजनकः कृष्णीका कृष्णसर्षपः ।।७२।। राजिका कफपित्तघ्नी तीक्ष्णोष्णा रक्तपित्तकृत्। किञ्चित् रूक्षाऽग्निदा कण्डूकुष्ठकोष्ठक्रिमीन्हरेत् ।। अतितीक्ष्णा विशेषेण तद्वत्कृष्णाऽपि राजिका ।।७३।। राई के संस्कृत नाम- राजी, राजिका, तीक्ष्णगन्धा, क्षुज्जनिका तथा आसुरी ये सब हैं। काली राई के संस्कृत नाम- क्षव, क्षुताभिजनक, कृष्णिका तथा कृष्णसर्षप ये सब हैं। राई- कफ तथा पित्तनाशक, तीक्ष्ण, उष्ण, रक्तपित्तकारक, किञ्चित् रूक्ष, जठराग्निवर्धक एवम् खुजली, कुष्ठ तथा कोष्ठस्थित क्रिमि को दूर करनेवाली होती है। काली राई- यह वैसे तो गुणों में राई ही के समान होती है किन्तु उसकी अपेक्षा विशेषतः अत्यन्त तीक्ष्ण होती है। [७२-७३] १९. राई हिं०- राई, लाल राई, माकड़ा राई। बं०- राइ, सरिषा। म०- राई। गु०- राई। क०- सासि। ते०- आवाल्। ता०- कडुगु। अ०- खरदल, खर्दल। फा०- सर्शप। अं०- Indian Mustard (इंडियन मस्टर्ड)। ले०- Brassica juncea Linn. (ब्रासीका जून्सिआ)। Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। राई- सरसों के समान खेतों में बोई जाती है। क्षुप- सरसों के समान होता है। पत्ते- साधारण, एकान्तर, मूलीय एवं काण्डीय तथा गहरे कटे हुये होते हैं। पुष्प- चमकीले पीले होते हैं। फली- पतली एवं आधार से फट जाती है। बीज- रक्ताभ भूरे, सरसों से छोटे एवं सिकुड़नदार होते हैं। इनसे भी तेल निकाला जाता है। एक बनारसी राई और होती है जिसका ले० नाम Brassica nigra Linn. (ब्रासिका नाइग्रा) है। इसके बीजों पर सूक्ष्म जाली दिखलाई देती है। इनसे तेल नहीं निकालते किन्तु चटनी-अचार इत्यादि में इसे डालते हैं। रासायनिक संगठन- राई में तेल ३५.५, प्रोटीन २४.६, रेशा ८ एवं राख ५.३ भाग रहती है। इसका तेल अधिक स्वच्छ तथा सरसों के जैसी गंध इसमें नहीं होती। गुण और प्रयोग- कम मात्रा में यह दीपन, पाचन, उत्तेजक तथा स्वेदजनन है। अधिक मात्रा अधिक देर रखने से फोड़े भी हो जाते हैं। इसे एक घंटे से अधिक कदापि न रखे। प्रतिश्याय में इसका तेल नाक एवं पावों पर मलते हैं। अथ क्षुद्रधान्यम्। तस्य नामगुणानाह क्षुद्रधान्यं कुधान्यं च तृणधान्यमिति स्मृतम्। क्षुद्रधान्यमनुष्णं स्यात्कषायं लघु लेखनम् ।।७४।। मधुरं कटुकं पाके रूक्षं चक्लेदशोषकम्। वातकृद् बद्धविट्कं च पित्तरक्तकफापहम् ।।७५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ८०९ क्षुद्रधान्य के संस्कृत नाम-क्षुद्रधान्य, कुधान्य तथा तृणधान्य ये सब हैं। क्षुद्रधान्य-किञ्चित् उष्ण, कषाय तथा मधुर रस युक्त, लघु, लेखन, विपाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, क्लेद (आर्द्रता) को सुखाने वाला, वातकारक, मल को बाँधने वाला एवम्-पित्त, रक्तविकार तथा कफ का नाशक होता है। [७४-७५] अथ कङ्गुः (कङ्गुनी) तस्य नामभेदगुणानाह स्त्रियां कङ्गुप्रियङ्गू द्वे कृष्णारक्ता सिता तथा। पीता चतुर्विधा कङ्गुस्तासां पीता वरा स्मृता ।।७६।। कङ्गुस्तु भग्नसन्धानवातकृद् बृंहणी गुरुः । रूक्षा श्लेष्महराऽतीव वाजिनां गुणकृद् भृशम् ।।७७।। कङ्गुनी का संस्कृत नाम-कङ्गु तथा प्रियङ्गु (ये दोनों स्त्रीलिङ्गी हैं) हैं। भेद-काली, लाल, सफेद तथा पीली इन भेदों से कङ्गुनी ४ प्रकार की होती है। इनमें से पीली कंगुनी ही सर्वोत्तम होती है। कंगुनी-टूटी हुई अस्थियों को जोड़ने वाली, वातकारक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक), गुरु, रूक्ष, अत्यन्त कफनाशक और घोड़ों के लिये विशेष रूप से गुण करनेवाली होती है। [७६-७७] २०. कंगुनी हिं०-कंगुनी, कगनी, टंगुनी। बं०-कांगुनी। म०-कांग। ता०-तेनई। गु०-कांग। क०-नवणे। ते०- कोरलु। फा०-गल, अर्जुन। अ०-दुखुन। ले०-Setaria italica Beauv. (सेटारिया इटेलिका)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। कंगुनी की खेती प्रायः सब प्रान्तों में होती है। यह ६ हजार फीट की ऊँचाई तक हो सकने के कारण हिमालय के तराई प्रदेश में भी इसे लोग बोते हैं। इसकी सालभर तक पैदावार की जा सकती है तथा यह १०० दिन में तैयार हो जाती है। अधिकतर वर्षा के प्रारम्भ में इसे बोते हैं। इसका क्षुप-३-३ १/२ फीट ऊँचा, पतला एवं बाल के बोझ से झुका हुआ होता है। पत्ते-१२-१८ इञ्च लम्बे, १/२ इञ्च चौड़े, हल्के हरे एवं रेखाकार भालाकार होते हैं। पुष्पव्यूह-अवृन्त काण्डज (Spike-स्पाइक्), ६-१२ इञ्च लम्बा, ३/४-१ १/२ इञ्च व्यास का तथा शुकयुक्त होता है। बाल-बाजरे के समान किन्तु उससे छोटे प्रायः ६ इञ्च लम्बे एवं १/२-१ १/२ इञ्च व्यास के होते हैं। भेद के अनुसार ये लम्बे भी होते हैं। धान्य विभिन्न रंगों के हुआ करते हैं। ये चिकने चमकीले, पीले, श्वेत, मलाई के रंग के नारंग रक्त, बैंगनी, काले, हरिताभ श्वेत एवं हल्के पीत रंगों के होते हैं। बालों में से जो बारीक दाने निकलते हैं। उन्हीं को कंगुनी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन ११, स्नेह ४, कार्बोहाइड्रेट ७०, रेशा ५ एवं राख ३ भाग रहती है। इसमें एक विषैला ग्लूकोसाइड तथा तैलीय क्षाराभ पाया गया है। गुण और प्रयोग-चावल की तरह इसे लोग खाते हैं। प्रसवपीड़ा को कम करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। आमवात में इसका लेप किया जाता है। अथ चीनाकः (चीना) तस्य नामगुणानाह चीनाकः काककङ्गुश्च सुश्लक्ष्णः श्लक्ष्णकः स्मृतः । चीनाकः कङ्गुभेदोऽस्ति स ज्ञेयः कङ्गुवद् गुणैः ।।७८।। चीना के संस्कृत नाम-चीनाक, काककंगु, सुश्लक्ष्ण, श्लक्ष्णक तथा कंगुभेद ये सब हैं। चीना-कङ्गुनी का भेद है अतः इसके भी गुण कंगुनी के समान ही समझने चाहिये। [७८]
८१० भावप्रकाशनिघण्टुः २१. चीना हिं०-चीना, चिन्ना, चैना । बं०-चिने । म०-वरिवव । गु०-चीणे, चीणा । क०-बरगु । ता०-पनिवरगु । ते०-वरिगलु । अं०-Indian Millet (इंडियन मिलेट) । ले०-Panicum miliaceum Linn. (पेनीकम मिलिएसिअम्) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । सभी स्थानों पर इसकी खेती की जाती है । यह शीघ्र होनेवाला क्षुद्र धान्य है । क्षुप-सीधा, वर्षायु एवं १८-२४ इञ्च ऊँचा होता है । पत्ते-पतले, रेखाकार तथा पर्व को घेरे रहते हैं । पुष्पव्यूह-अनेक शाखायुक्त तथा शाखाग्र पर सूचिकायें (Spikelets) एक या दो-दो रहती हैं । अंतिम या चतुर्थ बुसपत्र (Glume-ग्लूम) पर पुष्प रहता है जो धान्य में परिवर्तित होता है । धूसर, पीले, चमकीले हलके पीले आदि रंगों के भेद से यह कई प्रकार का होता है । रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन १३, स्नेह १, कार्बोहाइड्रेट ६९, रेशा २, राख ३ एवं आर्द्रता १२ भाग रहती है । गुण और प्रयोग-क्षुप का सोजाक में उपयोग करते हैं । धान्य को पकाकर या पीसकर उपयोग में लाते हैं । अथ श्यामाकः (सामा) । तस्य नामगुणानाह श्यामाकः श्यामकः श्यामस्त्रिबीजः स्यादविप्रियः । सुकुमारो राजधान्यं तृणबीजोत्तमश्च सः ।। श्यामाकः शोषणो रूक्षो वातलः कफपित्तहृत् ।।७९।। सामा के संस्कृत नाम-श्यामाक, श्यामक, श्याम, त्रिबीज, अविप्रिय, सुकुमार, राजधान्य तथा तृणबीजोत्तम ये सब हैं । सामा-शोषण करने वाला, रूक्ष, वातजनक एवम् कफ तथा पित्त को दूर करने वाला होता है । [७९] २२. साँवाँ हिं०-साँव, सावाँ । बं०-सावा, शामुला, श्यामाधान । म०-जंगली सामा, सामुल । गु०-सामो, सामोघास । ते०-ओड्डुलु । ता०-कुद्रैवलि पिल्लु । क०-सस्मै, सवै । अं०-Japanese Barnyard Millet (जापानीज बार्नयार्ड मिलेट) । ले०-Echinochloa frumentacea (एचिनोच्लोआ फ्रूमेण्टेसिआ) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । सभी स्थानों पर इसकी खेती की जाती है । वर्षा के प्रारम्भ में अन्य धान्यों के साथ इसे बोते हैं । यह बहुत जल्दी (६ सप्ताह) तैयार हो सकता है । इसका क्षुप-वर्षायु, २ से ४ फीट ऊँचा, पत्ते चौड़े, सूचिकायें बड़ी एवं बीज छोटे, चिकने, चमकीले, आधार पर गोल एवं अग्र नोकीला रहता है । रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन ६, स्नेह २, खनिज ४, रेशा १०, कार्बोहाइड्रेट ६६ तथा आर्द्रता १२ भाग रहती है । इसमें विटामिन 'बी' १ पर्याप्त रहता है । गुण और प्रयोग-इसका पंचांग पैत्तिक विकार तथा विबंध में लाभदायक माना जाता है । इस धान्य को गरीब खाते हैं । इसको उबाल कर या कुछ भूनकर खाया जाता है । अथ कोद्रवः वनकोद्रवश्च (कोदो-वनकोदो) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह कोद्रवः कोरदूषः स्यादुद्दालो वनकोद्रवः । कोद्रवो वातलो ग्राही हिमः पित्तकफापहः ।। उद्दालस्तु भवेदुष्णो ग्राही वातकरो भृशम् ।।८०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ८११ कोदो के संस्कृत नाम—कोद्रव तथा कोरदूष ये सब हैं। वनकोदो के संस्कृत नाम—उद्दाल तथा वनकोद्रव ये सब हैं। कोदो—वायुकारक, ग्राही शीतल एवम् पित्त तथा कफ का नाशक होता है। वनकोदो—गरम, ग्राही तथा अत्यन्त वातकारक होता है। [८०] २३. कोदो हिं०—कोदो धान, कोदव, कोदो। बं०—कोदो आधान। म०—कोद्र, हरिक, कोद्रु। गु०—कोदरा। क०— हारक। ते०—अरिकेलु। ता०—वरगु। अ०—कोद्रु। फा०—कोदिरम। ले०—Paspalum scrobiculatum Linn. (पास्पेलम् स्क्रोबिक्यूलेटम्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। सभी भागों में यह वन्य अथवा कृषितरूप में होता है। कोदो—एक प्रकार का तृणजातीय धान्य वर्षाकाल के आरम्भ ही में रोपण किया जाता है और आश्विन कार्तिक में काट लिया जाता है। इसका क्षुप—वर्षायु, सीधा खड़ा एवं १ १/२-२ फीट तक ऊँचा होता है। इसके पत्ते—पतले, घास के समान लम्बे होते हैं। इसकी मंजरी बाहर नहीं निकलती बल्कि सींकों के बीच में ही रह कर पक जाती है। इसके बीज सरसों के समान, छिलका सहित काले रंग के और भूसी निकालने पर किंचित् पीलापन युक्त सफेद रंग के होते हैं। इस अन्न में विशेषता यह है कि—भूसी सहित रखने से यह पचासों वर्ष तक नहीं बिगड़ता। इसकी भूसी निकाल कर गरीब कृषक खाते हैं। इसमें आटा भी कम निकलता है तथा भूसी हटाने में भी कठिनाई रहती है। इसके कई प्रकार पाये गये हैं। रासायनिक संगठन—इसके भूसी निकाले धान्य में प्रोटीन १२, कार्बोहाइड्रेट ७७, रेशा १ एवं राख १ भाग रहती है। कभी-कभी इसके पौधे तथा धान्य में मादक तत्त्व उत्पन्न हो जाते हैं जिससे चक्कर आदि आने लगते हैं। गुण और प्रयोग—मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति के लिये चावल के स्थान पर इसको दिया जाता है। अथ चारुकः (शरबीज)। नामगुणानाह चारुकः शरबीजः स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ। चारुको मधुरो रूक्षो रक्तपित्तकफापहः ।। शीतलो लघुवृष्यश्च कषायो वातकोपनः ।।८१।। शरबीज (सरपत के बीज) का संस्कृत नाम—चारुक तथा शरबीज है। शरबीज—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, वीर्यवर्धक, वात को कुपित करने वाले एवं रक्तपित्त तथा कफ के नाशक होते हैं। २४. शरबीज इसका विवरण पहले गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ५४८) में किया गया है। अथ वंशयवाः (बाँस के बीज)। तेषां गुणानाह यवा वंशभवा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः। बद्धमूत्राः कफघ्नाश्च वातपित्तकराः सराः ।।८२।। बाँस के बीज के संस्कृत नाम—वंशयव तथा वंशबीज हैं। बाँस के बीज—कषाय रसयुक्त, रूक्ष, विपाक में कटु रसयुक्त, मूत्र का विबन्ध (रुकावट) करने वाले, वात तथा पित्तकारक, सारक-एवम् कफनाशक होते हैं।
८१२ भावप्रकाशनिघण्टुः २५. वंशयव इसका विवरण पहले गुडूच्यादिवर्ग में पृष्ठ ५४५ पर किया गया है। अथ कुसुम्भबीजम् (कुसुम के बीज, कर्र) । तस्य नामगुणानाह कुसुम्भबीजं वरटा सैव प्रोक्ता वरट्टिका ।।८३।। वरटा मधुरा स्निग्धा रक्तपित्तकफापहा। कषाया शीतला गुर्वी स्याद्वृष्याऽनिलापहा ।।८४।। कुसुम के बीज (कर्र, बर्र) के संस्कृत नाम-कुसुम्भबीज, वरटा तथा वरट्टिका ये सब हैं। कुसुम के बीज-मधुर तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, गुरु, किंचित् वीर्यवर्धक एवं-रक्तपित्त-कफ तथा वात को दूर करने वाले होते हैं। [८३-८४] २६. कुसुम के बीज इसका विवरण हरीतक्यादिवर्ग में पृष्ठ ३०६ पर दिया गया है। अथ गवेधुका (गरहेडुआ) । तस्या नामगुणानाह गवेधुका तु विद्वद्भिर्गवेधुः कथिता स्त्रियाम्। गवेधुः कटुका स्वाद्वी कार्श्यकृत्कफनाशिनी ।।८५।। गरहेडुआ के संस्कृत नाम-गवेधुका और गवेधु (यह स्त्री लिङ्गी है) ये दो विद्वानों ने बतलाये हैं। गरहेडुआ- कटुरस युक्त, स्वादिष्ट, कृशता करने वाला एवं-कफनाशक होता है। [८५] २७. गरहेडुवा हिं०-गरहेडुआ, गरहेडु (दु) वा, सन्कृ। बं०-गड़गड़, देधान, गुरगुड़। म०-कसई। गु०-कसई। अं०- Adlay (अँडले); Jobs Tears (जॉवस् टियर्स्)। ले०-Coix lachryma jobi Linn. (कोइक्स लेक्रिमा जोबी)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। यह बंगाल के गढ़हों और चावल के खेतों में उत्पन्न होता है तथा अन्य प्रान्तों में भी पाया जाता है। इसका पौधा-३ से ६ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-४ से १८ इञ्च तक लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, रेखाकार प्रासवत् एवं उनका किनारा तीक्ष्ण तथा कठोर होता है। पुष्प दण्ड-१ से २¹/₂ इञ्च लम्बे, चिपटे या ३ पहलवाले एवं पत्रकोण से एक साथ कई निकले रहते हैं। फल-अंडाकार या नाशपाती के आकार का या अश्रुक स्वरूप का, ०.३ इञ्च लम्बा तथा चमकीला होता है जिसके अन्दर सफेद या हलके भूरे रंग का चावल जैसा दाना (वास्तविक फल) निकलता है। इसके नाप, आकार, रंग, कठोरता के भेद से कई प्रकार पाये जाते हैं। इसके फल तथा मूल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन १०-२०, कार्बोहाइड्रेट ७३-७४, स्नेह ३-४ एवं आर्द्रता १० भाग रहती है। इसमें खनिज अन्य धान्यों की अपेक्षा कम रहते हैं। कोइसीन (Coicin) नामक एक प्रोलेमीन (Prolamine) इससे प्राप्त किया गया है जिसमें ल्यूसिन (Leucine) तथा ग्लूटेमिक ॲसिड (Glutamic acid) काफी रहता है। गुण और प्रयोग-इसका चावल की तरह उपयोग किया जा सकता है। इसका क्वाथ मूत्रजनन होने से मूत्रकृच्छ्र में दिया जाता है। मूल का उपयोग पीड़ितार्तव में करते हैं। इसकी रोटी खाने से चरबी कम होती है। अथ नीवरः (तीनी) । तस्य नामगुणानाह प्रसाधिका तु नीवारस्तृणान्नमिति च स्मृतम्। नीवारः शीतलो ग्राही पित्तघ्नः कफवातकृत् ।।८६।।
धान्यवर्गः ८१३ तीनी के संस्कृत नाम—प्रसाधिकां, नीवार और तृणान्न ये सब हैं। तीनी—शीतल, ग्राही, पित्तनाशक एवम् कफ तथा वातकारक है ॥८६॥ २८. तीनी हिं०—तीनि, तीन्नी, जंगलीदाल। बं०—उडिधान्य। म०—देवभात। गु०—वंटो। क०—ज्वरहुमेधे। ते०— निवोरीवट्टु। ता०—वल्लीपुल्लु। आसा०—फुटकी। ले०—Hygroryza aristata Nees. (हाइग्रोहाइझा एरिस्टेटा)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। समस्त भारत में यह पाया जाता है। यह एक जलीय घास की जाति का पौधा है जो तालाबों या जलीय भूमि पर फैला हुआ रहता है। वर्षा ऋतु में आसाम में चावल के खेतों पर यह फैला हुआ पाया जाता है। काण्ड १ से १ १/२ फीट लम्बे होते हैं। इसके चावल को गरीब लोग खाते हैं। इस घास को जानवर खाते हैं। गुण और प्रयोग—इसके चावल शीतल, ग्राही, सुपाच्य एवं पित्तशामक माने जाते हैं। अथ यावनालः (पनेरा, जुआर) तस्य गुणानाह यावनालो हिमः स्वादुर्लोहितः श्लेष्मपित्तजित्। अवृष्यस्तुवरो रूक्षः क्लेदकृत्कथितो लघुः ।।८७।। जुआर (पनेरा) का संस्कृत नाम यावनाल है। जुआर—स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, शीतल, किंचित् वीर्यवर्द्धक, रूक्ष, क्लेदकारक, लघु एवम् रक्त विकार, कफ तथा पित्त को नष्ट करने वाला होता है। [८७] २९. जुआर हिं०—जुआर, ज्वार, जुवार। बं०—जुयारा, जोयार। म०—जोंधले, ज्वारी। गु०—जुवार। क०—जोला। ते०—जोन्नलु। ता०—चोलं। फा०—जुरेमका, जिर्रहमका, गावरस हिन्दी। अ०—हंतारुमिया खंदरूस, हिन्तये रूमिया। ले०—Sorghum vulgare (Linn.) Pers. (सोर्घम् व्हलगेर्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। क्षुप—वर्षायु, १० से १५ फीट ऊँचा; काण्ड १/२-२ १/२ इञ्च मोटा; पत्ते— २ से ३ १/२ इञ्च लम्बे, १-३ इञ्च चौड़े, चिकने, किनारा खुरदरा तथा मध्य शिरा श्वेत; बाल-विभिन्न स्वरूप का रहता है। इसके अनेक भेदोपभेद होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें प्रोटीन ९, कार्बोहाइड्रेट ७२, स्नेह २, रेशा २, राख २ तथा आर्द्रता १३ रहती है। इसके पत्तों में हाइड्रोसायनिक ॲसिड पाया जाता है। बीजों में ग्लूकोसाइड धुरिन् (Dhurin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसका अन्न के रूप में उपयोग किया जाता है। यह मूत्रजनन तथा कुछ वृष्य होता है। अथ परिभाषामाह धान्यं सर्वं नवं स्वादु गुरु श्लेष्मकरं स्मृतम्। तत्तु वर्षोषितं पथ्यं यतो लघुतरं हि तत् ।।८८।। वर्षोषितं सर्वधान्यं गौरवं परिमुञ्चति। न तु त्यजति वीर्यं स्वं क्रमान्मुञ्चत्यतः परम् ।।८९।। एतेषु यवगोधूमतिलमाषा नवा हिताः। पुराणा विरसा रूक्षा न तथा गुणकारिणाः ।।९०।। धान्यविषयक परिभाषा—सभी प्रकार के धान्य यदि नवीन हों तो वे स्वादिष्ट, गुरु तथा कफकारक होते हैं। यदि वे वर्ष भर के रक्खे पुराने हों तो पथ्य होते हैं क्योंकि वे अत्यन्त लघु हो जाते हैं। वर्ष भर के बाद जैसे-जैसे वे पुराने
८१४ भावप्रकाशनिघण्टुः होते जाते हैं वैसे-वैसे अपने-अपने वीर्य को क्रम से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में छोड़ते जाते हैं । किन्तु जव, गेहूँ, तिल, उरद ये नवीन ही अवस्था में अपने-अपने गुणों से युक्त रहते हैं और हितकर होते हैं । पुराने होने पर वे विरस तथा रूक्ष हो जाते हैं तथा उतने गुणकारी नहीं होते हैं । [८०-९०] ❖ पुराणा वर्षद्वयादुपरि स्थिताः । यवादयो नवाः स्वस्थान् प्रति हिताः । पथ्याशिनां तु पुराणा हिताः । “पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूल्यभुग् ।'' इति वसन्ते वाग्भटेनोक्तत्वात् ।। ९० ।। यहाँ पर मूल में “पुराण” पद से दो वर्ष के ऊपर के रक्खे हुए जो धान्य हों वे पुराने कहलाते हैं । और जव आदि धान्य यदि नवीन हों तो वे स्वस्थ मनुष्यों के लिये ही हितकर होते हैं । पथ्य रखने वाले रोगियों के लिये तो पुराने अर्थात् दो वर्ष के अन्दर तक हितकर होते हैं और उनके लिये नवीन हितकर नहीं होते हैं । क्योंकि-वसन्त में पथ्य द्रव्यों के वर्णन में वाग्भट ने “पुराणयवगोधूम०—” इत्यादि से ‘पुराना जव तथा गेहूँ, मधु, जंगली जीवों के मांस का कबाब खाना हितकर है” ऐसा कह कर पुराना जव, गेहूँ पथ्य बतलाया है । [८८-९०] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे धान्यवर्गः समाप्तः ।
अथ शाकवर्गः तत्र शाकनिरूपणमाह पत्रं पुष्पं फलं नालं कन्दं संस्वेदजं तथा। शाकं षड्विधमुद्दिष्टं गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।।१।। शाक का निरूपण—(१) पत्र, (२) पुष्प, (३) फल, (४) नाल, (५) कन्द और (६) संस्वेदज ये ६ प्रकार के शाक माने गये हैं, इनमें एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुरु समझना चाहिये । जैसे—पत्र की अपेक्षा पुष्पशाक गुरु होता है उसकी अपेक्षा फल शाक अधिक गुरु होता है इत्यादि क्रम से उत्तरोत्तर गुरु होते हैं । [१] अथ शाकानां गुणानाह प्रायः शाकानि सर्वाणि विष्टम्भीनि गुरूणि च । रूक्षाणि बहुवर्चांसि सृष्टविण्मरुतानि च ।।२।। शाकं भिनत्ति वपुरस्थि निहन्ति नेत्रं वर्णं विनाशयति रक्तमथापि शुक्रम् । प्रज्ञाक्षयं च कुरुते पलितं च नूनं हन्ति स्मृतिं गतिमिति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।।३।। शाकेषु सर्वेषु वसन्ति रोगास्ते हेतवो देहविनाशनाय । तस्माद् बुधः शाकविवर्जनं तु कुर्यात्तथाऽम्लेषु स एव दोषः ।।४।। सभी प्रकार के शाकों के सामान्य रूप से गुण—प्रायः सभी शाक (पत्र-पुष्पादिक ६ प्रकार के)—विष्टम्भक, गुरु, रूक्ष, विशेष रूप से मल निकालने वाले अर्थात् अधिक टट्टी निकालने वाले, मल तथा अधोवायु की प्रवृत्ति कराने वाले होते हैं और द्रव्यगुण जानने वाले विद्वान् लोग शाक के विषय में यह भी कहते हैं कि—शाक-शरीरस्थित हड्डियों का भेदन करने वाला अर्थात् उनकी सारताको नष्ट करने वाला, नेत्रों की शक्ति, रक्त, शुक्र, बुद्धि, स्मरणशक्ति तथा गति (चलने की शक्ति) को नष्ट करने वाला एवम्-पलित (अकाल में बालों का सफेद होना) को करने वाला होता है । सभी शाकों में रोग रहते हैं और वे ही रोग देह के नष्ट करने में हेतु होते हैं । इससे समझदार लोगों को चाहिये कि—शाक का खाना छोड़ दें और अम्ल (खट्टे) पदार्थों में भी पूर्वोक्त दोष होने से उनका सेवन परित्याग करना उचित है । [२-४] ❖ एतानि शाकनिन्दकानि वचनानि सामान्यानि ।।२-४।। यहाँ पर इतना और समझना चाहिये कि—ये सब शाक की निन्दा करनेवाले पूर्वोक्त वचन सामान्य रूप से हैं। [२-४] अथ शाकेषु विशिष्टानि । तत्र पत्रशाकानि । तत्रापि वास्तूकद्वयम् (दोनों बथुआ) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वास्तूकं वास्तुकं च स्यात्क्षारपत्रं च शाकराट् । तदेव तु बृहत्पत्रं रक्तं स्याद्गौडवास्तुकम् ।।५।। प्रायशो यवमध्ये स्याद्यवशाकमतः स्मृतम् । वास्तूकद्वितयं स्वादु क्षारं पाके कटूदितम् ।।६।। दीपनं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदम् । सरं प्लीहास्त्रपित्तार्शः कृमिदोषत्रयापहम् ।।७।।
८१६ भावप्रकाशनिघण्टुः शाक के विषय में विशेष वचन निम्नलिखित हैं—शाकों में प्रथम पत्रशाक का वर्णन करते हैं। उसमें भी प्रथम दोनों प्रकार के बथुआ के विषय में विशेष वचनों का उल्लेख करते हैं। बथुआ के संस्कृत नाम—वास्तूक, वास्तुक, क्षारपत्र और शाकराट् ये सब हैं। बड़ा बथुआ का लक्षण तथा संस्कृत नाम—जो बथुआ बड़े पत्तों वाला एव् रक्तवर्ण का होता है, उसे “गौड़ वास्तुक” कहते हैं। बथुआ अधिकतर जव के खेत में होता है, अतः संस्कृत में इसे “यवशाक” भी कहते हैं। दोनों बथुआ—स्वादिष्ट, क्षारयुक्त, विपाक में कटुरस युक्त, अग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, लघु, शुक्र तथा बल को बढ़ाने वाले, सारक एवम् प्लीहा, रक्तपित्त, बवासीर, कृमि तथा त्रिदोष के नाशक हैं। [५-७] १. बथुआ हिं०—बथुआ, बथवा, चिल्लीशाक। बं०—बेतुया, वेतोशाक। म०—चाकवत, चकवत। गु०—टांको, बथवों, बाथरो, चीलो। ता०—परुपुकिरै। क०—विलिय चिल्लीके। फा०—मुसेलेसा, सरमक, सलमह। अ०—रोक् बतुल बजामेल, कुतुफ, कतफ। अं०—Lambs Quarters (लैम्बस् क्वार्टर्स्)। ले०—Chenopodium album Linn. (चिनोपोडियम् एल्बम्)। Fam. Chenopodiaceae (चिनोपोडिएसी)। भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बहुलता से पाया जाता है विशेष कर यह आप ही आप बिना बोये उत्पन्न होता है। इसका क्षुप—गंधहीन, सीधा या झुका हुआ, १-१ १/२ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—आकार में छोटे-बड़े त्रिकोणाकार, नुकीले एवं कई प्रकार के होते हैं। डण्डियों के अन्त में बारीक पुष्प और बीज कोषों के गुच्छे लगते हैं। इसके श्वेत, हरित एवं कुछ लाली ऐसे तीन प्रकार (Varieties) पाये जाते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें कॅरोटीन (Carotene) तथा विटामिन ‘सी’ होता है। गुण और प्रयोग—यह सारक एवं कृमिघ्न है। जलने पर इसके पत्तों का लेप दाह शान्ति के लिये लगाते हैं। कुपचन में इसका साग देते हैं। २. सुगन्धवास्तुक एक सुगन्धवास्तुक (C. ambrosioides—चि. एम्ब्रोसिओइडिस्) नामक अन्य जाति होती है जो बंगाल, सिलहट, दक्षिण एवं बिहार में पाई जाती है। इसका क्षुप—२ से ४ फीट ऊँचा, सुगन्धित ग्रन्थिरोमश; पत्ते—आयताकार या प्रासवत्, कुण्ठिताग्र तथा नीचे के लहरदार एवं दन्तुर; पुष्प—छोटे, हरित, असंख्य एवं लम्बी मंजरी में गुच्छबद्ध होकर निकले हुये; फल—गोल, कुछ दबे हुये एवं फलभित्ति से आवृत् बीज—छोटे, वृक्काकार, १/३० इञ्च व्यास के, भूरे, चिकने, चमकीले एवं स्वाद में कटुतिक्त रहते हैं। समग्र वनस्पति में तीव्र गंध आती है। रासायनिक संगठन—पुष्प एवं फल आने पर मूल को छोड़कर बाकी भाग से एक उड़नशील तैल (०.१७%) निकाला जाता है जो अमेरिका के इसके एक प्रकार से पाये जाने वाले तेल, चिनोपोडियम ऑईल (Chenopodium oil) का भारतीय प्रतिनिधि है। इस तेल का मुख्य कृमिघ्न तत्त्व एस्कॅरिडॉल् (Ascaridol) भारतीय तेल में ४०- ४५% रहता है जबकि अमेरिकी तेल में यह ६०% तक रहता है। इसलिए इसे अधिक मात्रा (५-२० मिनिमम) में देना पड़ता है। इस पौधे के सभी अंगों में संपोनिन रहता है जो मूल में अधिक रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन ‘सी’ एवं मॅग्नेशियम् फॉस्फेट पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इस तेल का उपयोग बहुत सावधानी के साथ आंत्रस्य कृमियों के लिये स्वतंत्र या अन्य औषध के साथ करते हैं। अंकुश कृमि (Hookworm—हूक्वर्म) के लिये यह बहुत उपयोगी है। विशेष विवरण आदि आधुनिक डाक्टरी ग्रन्थों में देखें। इसके बीज ५ से २० रत्ती की मात्रा में चीनी के साथ कृमि विकार के लिये खिलाते हैं।
शाकवर्गः ८१७ अथ पोतकी (पोई)। तस्या नामगुणानाह पोतक्युपोदिका सा तु मालवाऽमृतवल्लरी। पोतकी शीतला स्निग्धा श्लेष्मला वातपित्तनुत् ।।८।। अकण्ठ्या पिच्छिला निद्राशुक्रदा रक्तपित्तजित्। बलदा रुचिकृत्पथ्या बृंहणी तृप्तिकारिणी ।।९।। पोई के संस्कृत नाम—पोतकी, उपोदिका, मालवा तथा अमृतवल्लरी ये सब हैं। पोई—शीतल, स्निग्ध, कफजनक, वात तथा पित्तनाशक, किञ्चित् कण्ठ के लिये हितकर, पिच्छिल, निद्रा तथा शुक्र को देनेवाली, रक्तपित्त को दूर करनेवाली, बलदायक, रुचिकारक, पथ्य, बृंहण (रस—रक्तादिवर्धक) एवम् तृप्तिकारक होती है। [८-९] ३. पोय हिं०—पोय (शाक), पोय का साग, पोई का साग। बं०—पूंई, पुईशाक। म०—मायाल। गु०—पोथी। क०— वसले। ते०—बच्चलि। ता०—वसलक्किरै। अं०—Indian Spinach (इण्डियन् स्पाइनॅक) ले०—Basella rubra Linn. (बेसिला रुब्रा)। Fam. Basellaceae (बेसेलेसी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में बोई जाती है तथा वन्य भी पाई जाती है। इसका क्षुप—बहुवर्षायु, फैलनेवाला लतासदृश होता है। पत्ते—शीशम के पत्ते के समान गोलाकार परन्तु उनसे मोटे, ५ × ३ इञ्च बड़े और गूदेदार होते हैं। पत्रदण्ड से कोमल सींक निकल कर उस पर क्रमशः लाल मिश्रित सफेद रंग के फूल आते हैं। फल—छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् नोकीले एवं पकने पर कालापन युक्त बैंगनी रंग के हो जाते हैं। सफेद और लाल कांड के भेद से यह दो प्रकार की होती है। रासायनिक संगठन—इसमें खटिक, लोह तथा विटामिन 'ए', 'बी₁', 'बी₂' एवं प्रोटीन रहता है। गुण और प्रयोग—यह शीतल तथा स्नेहन है। इसका स्वरस, उदर्द एवं गर्भिणी तथा बालकों के विबंध में देते हैं। सोजाक में भी इसे दिया जाता हैं। उदर्द में इसको शरीर पर मलते भी हैं। अथ श्वेतरक्तमारिषौ (सफेद व लाल मरसा)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह मारिषो बाष्पको मार्ष श्वेतो रक्तश्च संस्मृतः। मारिषो मधुरः शीतो विष्टम्भी पित्तनुद् गुरुः ।।१०।। वातश्लेष्मकरो रक्तपित्तनुद् विषमाग्निजित्। रक्तमार्षो गुरुर्नाति सक्षारो मधुरः सरः। श्लेष्मलः कटुकः पाके स्वल्पदोष उदीरितः ।।११।। मरसा के संस्कृत नाम—मारिष, बाष्पक और मार्ष ये सब हैं। भेद—सफेद तथा रक्तवर्ण के भेद से मरसा दो प्रकार का होता है। मरसा (सफेद)—मधुर रसयुक्त, शीतल, विष्टम्भजनक, पित्तनाशक, गुरु, वात तथा कफकारक एवम्-रक्तपित्त तथा विषमाग्नि को शमन करने वाला होता है। लाल मरसा—किंचित् गुरु, क्षारयुक्त मधुर रस वाला, सारक, कफजनक, पाक में कटुरसयुक्त तथा स्वल्प दोषवाला कहा हुआ है। [१०-११] ४. सफेद मरसा हिं०—मरसा। बं०—सादानटे। गु०—डांभो। ता०—तण्डुकिरई। ते०—टोटाकुड़ा। म०—भाजी, माठाची भाजी। ले०—Amaranthus blitum var. oleraceae Duthie (अॅमॅरेन्थस् ब्लाइटम वेर ओलेरेसिआ)। Fam. Amaranthaceae (अॅमॅरेन्थेसी)। ५५ भाव. I
८१८ भावप्रकाशनिघण्टुः सभी भागों में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप-गूदेदार तथा सीधा होता है। पत्ते आयताकार होते हैं। इसके बीजों को भी भूनकर खाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन २.९% एवं लोह अधिक मात्रा में (१८.१८ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम में) रहता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, पित्तशामक एवं रक्तपित्तशामक है। इसका साग खाते हैं। ५. लाल मरसा हिं०-लाल मरसा, लाल साग। बं०-डेंगुआ। म०-माठ। क०-दन्तु। ते०-टोटाकुरा। ले०-Amaranthus gangeticus. Linn. (ॲमॅरेन्थस् गॅजेटिकस्) । Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरेन्थेसी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में इसका रोपण करते हैं। इसका क्षुप-२-३ फुट ऊँचा और हरिताभ या गहरा लाल होता है। पत्ते-उक्त मरसे के आकार वाले, प्रकार के अनुसार किंचित् हरापनयुक्त लाल या नीलापन युक्त लाल अथवा चमकिले लाल रंग के एवं विभिन्न आकारवाले होते हैं। डण्डियों के चारों ओर सघन गुलाबी रंग के बारीक फूलों के गुच्छे लगते हैं। बीज-उक्त मरसा के समान होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके कोमल काण्ड में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज एवं विटामिन 'ए', 'बी$_१$' तथा 'सी' पाये जाते हैं। बीजों में सॅपोनिन् रहता है जो अल्प विषैला रहता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तपित्तशामक एवं व्रणरोपण है। अतिसार, रक्तातिसार एवं रक्तप्रदर में इसको देते हैं। व्रण प्रक्षालन एवं मुखपाक में इसका उपयोग करते हैं। अथ तण्डुलीयः (चौलाई) । तस्य नामगुणानाह तण्डुलीयो मेघनादः काण्डेरस्तण्डुलेरकः । भण्डीरस्तण्डुलीबीजो विषघ्नश्चाल्पमारिषः ।।१२।। तण्डुलीयो लघुः शीतो रूक्षः पित्तकफास्रजित् । सृष्टमूत्रमलो रुच्यो दीपनो विषहारकः ।।१३।। चौलाई के संस्कृत नाम-तण्डुलीय, मेघनाद, काण्डेर, तण्डुलेरक, भण्डीर, तण्डुलीबीज, विषघ्न तथा अल्पमारिष ये सब हैं। चौलाई-लघु, शीतल, रूक्ष, मूत्र तथा मल को निकालने वाली, रुचिकारक, अग्निदीपक एवम् पित्त, कफ, रक्तविकार तथा विष को दूर करने वाली होती है। [१२-१३] ६. चौलाई हिं०-चौलाई का शांक, चौराई का साग, कटैली चवलाई। बं०-कांटा नटे। म०-कांटेमाठ। गु०-कांटालो डांभो। क०-मुल्लुहरिवेसोप्पु । ते०-मोला टोटा कुरा। ता०-मुलुक्वोरै। अं०-Prickly Amaranth (प्रिक्ली ॲमॅरेन्थ)। ले०-Amaranthus spinosus Linn. (ॲमॅरेन्थस् स्पाइनोसस्) । Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरेन्थेसी) । यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के खेत, बाग, बगीचों में और बीरान भूमि में आप ही आप उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-२ फीट तक ऊँचा और शाखाएँ झाड़ीदार होती हैं। पत्ते-१।।-२ इञ्च लम्बे, चौड़े भालाकार किन्तु नोकरहित होते हैं। पत्तों की जड़ में महीन तीक्ष्ण काँटे होते हैं। काण्ड पर बारीक फूलों के गुच्छे रहते हैं। इनमें से बारीक काले रंग के गोल चमकीले बीज निकलते हैं।
शाकवर्गः ८१९ काँटे वाली, बिना काँटे वाली, हरे पत्ते की, लाल पत्ते की और नीलापन युक्त लाल अथवा लालीयुक्त नीले पत्ते की, इस प्रकार चौलाई कई प्रकार की होती है। रासायनिक संगठन-इसमें काफी पोषक तत्त्व रहते हैं। इसमें प्रोटीन ३, स्नेह ०.३, कार्बोहाइड्रेट ८, खनिज ३.६, खटिक ०.८, लोह २३ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम में रहता है। गुण और प्रयोग-यह शीतल, मूत्रजनन, स्नेहन एवं गर्भाशय के लिये वेदनास्थापन तथा शक्तिदायक और स्तन्यजनन है। (१) इसकी जड़ का क्वाथ मुलेठी तथा अपामार्ग के साथ सोजाक में दिया जाता है। (२) रक्तप्रदर के लिये इसका बहुत उपयोग करते हैं। इसमें इसके मूल के साथ आँवला, अशोक की छाल एवं दारुहल्दी का उपयोग किया जाता है। इससे पीड़ा भी कम होती है तथा रक्तस्राव बंद होता है। श्वेतप्रदर में इसके साथ हिराबोल देते हैं। इससे गर्भपात की आदत दूर होती है। मासिक के काल के समय गर्भिणी को इसे ३-४ दिन देते हैं। (३) स्तन्यवृद्धि के लिये इसके पंचांग को अरहर की दाल के साथ पकाकर देते हैं। जानवरों में भी इसका उपयोग करते हैं। (४) गाँठ, फोड़े आदि जल्दी पकाने के लिये मूल का लेप करते हैं। विसर्प तथा अन्य दाहयुक्त चर्मरोग में दाहशांति के लिये इसके पत्तों को पीसकर लेप करते हैं। अथ पानीयतण्डुलीयम् (जलचौलाई) । (चौलाईभेदो जलतण्डुलीयं शास्त्रे कञ्झटमिति प्रसिद्धम्) । तस्य नामगुणानाह पानीयतण्डुलीयं तु कञ्झटं समुदाहृतम्। कञ्झटं तिक्तकं रक्तपित्तानिलहरं लघु ।।१४।। जल चौलाई (यह चौलाई का भेद है और शास्त्र में "कञ्झट" नाम से प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-पानीयतण्डुलीय, जलतण्डुलीय तथा कञ्झट ये सब हैं। जल चौलाई-तिक्त रस युक्त, लघु एवम्-रक्तपित्त तथा वायुदोष को नष्ट करने वाली होती है। [१४] ७. जलचौलाई यह भी अॅमॅरेन्थस् की जल के समीप होने वाली कोई जाति (Species) है। ८. रामदाना रामदाना-इस नाम के बीज इसकी एक जाति अँ. कॉडेटस् (A. caudatus Linn.) से प्राप्त होते हैं जो श्वेत या पीले एवं गोल मोटे किनारेदार होते हैं। इसके क्षुप-ऊँचे; पत्ते-लम्बे वृन्त युक्त, दीर्घवृत्ताभ; पुष्प-चमकीले पीत या गहरे रक्त लटकी हुई मंजरी में आते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में आक्जेलिक ॲसिड रहता है। गुण और प्रयोग-रामदाने में पौष्टिक तत्त्व रहते हैं। इसका पंचांग मूत्रल एवं रक्तशोधक है। इसे अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र में देते हैं। गण्डमाला में भी इसे देते हैं तथा बाहर से लेप करते हैं। अथ पलक्या (पालक) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पलक्या वास्तुकाकारा छुरिका चीरितच्छदा। पलक्या वातला शीता श्लेष्मला भेदिनी गुरुः । विष्टम्भिनी मदश्वासपित्तरक्तकफापहा ।।१५।।
८२० भावप्रकाशनिघण्टुः पालक के संस्कृत नाम-पलक्या, वास्तुकाकारा, छुरिका तथा चीरितच्छदा ये सब हैं। पालक-वातजनक, शीतल, कफकारक, मलभेदक, गुरु, विष्टम्भ उत्पन्न करने वाला-एवम् मद (नशा), श्वास, पित्त, रक्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। ९. पालक हिं०-पालक शाक, पला। बं०-पालंग शाक। म०-पालख, पालक। गु०-पालखनी भाजी। क०- पालक्य। ता०-वसैलिक्किर्रै। ते०-मट्टरवच्चलि। अं०-Spsinach (स्पाइर्नक्)। ले०-Spinacia oleracea Linn. (स्पाइनेसिया ओलेरेसिया)। Fam. Chenopodiaceae (चिनोपोडिएसी)। सभी प्रान्तों में इसको लगाया जाता है। इसका क्षुप-करीब १ फूट ऊँचा रहता है। काण्ड-पोला तथा कोणयुक्त रहता है। पत्ते-मोटे, मांसल, हरे, कुछ त्रिकोणाकार एवं लम्बेकृत से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे गुच्छों में आते हैं। पुंजाति के क्षुप में पुष्प काण्ड के अंत में एवं स्त्रीजाति के पुष्प पत्र कोण में आते हैं। इसमें एक प्रकार गोल पत्तों एवं चिकने बीजों वाला होता है। प्रथम में बीज काँटेदार होते हैं। इसके बीज एवं पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें आयोडीन (Iodine), लेसिथिन् (Lecithin), कॅरोटिन् (Carotin), आक्जेलिक ॲसिड (Oxalic acid) एवं आर्सेनिकू (Arsenic) होता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, मूत्रजनन, रोचन, शोथघ्न एवं दाहशामक है। (१) पंचांग का क्वाथ शोथयुक्त ज्वरों में देते हैं। (२) आंत्रविकारों में इसका साग उपयोगी है। (३) अश्मरी में पत्तों का रस का क्वाथ पिलाते हैं। (४) इसके बीज सारक एवं शीतल हैं तथा यकृतशोथ, कामला एवं श्वासकृच्छ्र में दिये जाते हैं। अथ कालशाकम् (नाडीका शाक) । तस्या नामगुणानाह नाडिकं कालशाकं च श्राद्धशाकं च कालकम्। कालशाकं सरं रुच्यं वातकृत्कफशोथहृत्। बल्यं रुचिकरं मेध्यं रक्तपित्तहरं हिमम् ।।१६।। नाडीका शाक के संस्कृत नाम-नाडिक, कालशाक, श्राद्धशाक और कालक ये सब हैं। नाडीका शाक-सारक, रोचक, वातकारक, कफ तथा शोथ नाशक, बलदायक, रुचि को उत्पन्न करने वाला, मेधा के लिये हितकर अथवा पवित्र, शीतल एवम्-रक्तपित्तनाशक है। [१७] १०. कालशाक (नाड़ी का शाक) हिं०-नरिचा, नाड़ी का शाक, तीता पाट। बं०-नालिता शाक, तितपाट, चिनल्तेपात, नची। म०-चोंचे, सण। गु०-छूँछ। ले०-Corchorus capsularis Linn. (कोकोरस कॅपसुलेरिस्)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। यह गरम प्रदेशों में अधिक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-३-४ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, आध से पौन इञ्च चौड़े; प्रासवत् अथवा आयताकार, लम्बाग्र एवं आरावत् दन्तुर होते हैं। फूल-पीले रंग के आते हैं। फल-गोलाकार पाँच भाग वाले तथा पृष्ठ पर दानेदार होते हैं। बीज-ताम्ररंग के होते हैं। इसके कृषित भेद में यह १०।१२ फीट तक ऊँचा होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८२१ रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में कॅप्सूलेरिन् नामक एक क्षारभ पाया गया है। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का फांट ज्वर में देने से मूत्र एवं स्वेद अधिक आता है तथा मुँह का सूखना कम होता है। कुपचन, अतिसार तथा आँव में पत्तों का हिम देते हैं। इसके बीज विरेचन हैं। अथ पट्टशाकः (पटुआ शाक) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पट्टशाकस्तु नाडीको नाडीशाकश्च स स्मृतः । नाडीको रक्तपित्तघ्नो विष्टम्भो वातकोपनः ।।१७।। पटुआ शाक के संस्कृत नाम-पट्टशाक, नाडीक और नाडीशाक ये सब हैं। पटुआशाक-रक्तपित्तनाशक, विष्टम्भजनक एवम् वात को कुपित करने वाला होता है। [१७] ११. पट्टशाक (पटुआ शाक) हिं०-पटुआ, पटवा, पटुए का शाक, कोष्ट । बं०-मीठा पाट, ललिता पाट । म०-मोठे चोंचे । गु०-मोटी छूॅंछ। ले०-Corchorus olitorius Linn. (कोकोरस् ओलिटोरियस्) । Fam. Tiliaceae (टिलिएसी) । वह कई प्रान्तों में आप ही आप जंगली उत्पन्न होता है किन्तु बंगाल में नहीं होता। इसका क्षुप-३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-२ इञ्च चौड़े, चिकने, अंडाकार और पर्णमूल के पास दो पुच्छ सदृश रचनाओं से युक्त होते हैं। फूल-बड़े तथा गहरे पीले रंग के आते हैं। फल-१-२ इञ्च लम्बे होते हैं। बीज-धूसराभ हरित या नीलाभ कृष्ण तथा कालशाक की अपेक्षा छोटे होते हैं। इसके पत्ते तथा कोमल काण्ड लोग खाते हैं। इसका कृषित भेद कालशाक से भी ऊँचा जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में विटामिन 'सी' पाया गया है। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते स्नेहन, दाहशामक, संग्राहक, मूत्रजनन एवं बल्य हैं। इसके पत्तों का फाट बल्य तथा ज्वर शामक मानते हैं। इसके बीज विरेचन होते हैं। अथ कलम्बी (कलमी शाक) । तस्या नामगुणानाह कलम्बी शतपर्वी च कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । कलम्बी स्तन्यदा प्रोक्ता मधुरा शुक्रकारिणी ।।१८।। कलमी शाक का संस्कृत नाम-कलम्बी और शतपर्वी है। कलमी शाक-मधुर रसयुक्त, दुग्धवर्धक तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला होता है। [१८] १२. कलम्बी हिं०-कलंबी शाक, करमी, कलमी का साग, करेमु। बं-कल्मी शाक। ते०-तोमे वच्चलि। म०-नालीची भाजी। गु०-नालोनी भाजी। अं०-Swamp Cabbage (स्वैम्प कॅबेज) । ले०-Ipomoea aquatica Forsk. (आइपोमिया ॲक्वेटिका)। Fam. Convolvulaceae (कन्हॉल्व्हयुलेसी) । यह लता जाति की वनस्पति प्रायः सब प्रान्तों के सजल स्थान में जल के ऊपर तैरती हुई या समीप की भूमि पर फैली हुई दिखाई देती है। पर्व से इसकी जड़ निकलकर कीचड़ में फैलती है। डंडी पोली होती है। पत्ते-३ से ६ इञ्च लम्बे, दीर्घवृत्ताभ या अंडाकार-आयताकार, आधार की तरफ हृदयाकार या दो कोनें निकले हुये (Hastate) एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। फूल-नलिकाकार, १-२ इञ्च लम्बे, निसोत के समान, श्वेत या हलके जामुनी (कंठ में गाढ़े जामुनी) रंग के तथा एकाकी या ५ के समूह में आते हैं। फल-०.८ से० मी० व्यास में, गोलाभ, चिकना तथा २ से ४ घनरमेश बीज युक्त होता है। इसकी नवीन शाखाओं तथा पत्तों का शाक होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA