भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 855

८०४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कुलत्थः (कुलथी) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुलत्थिका कुलत्थश्च कत्थन्ते तद्गुणा अथ ।।६०।। कुलत्थः कटुकः पाके कषायः पित्तरक्तकृत् । लघुर्विदाही वीर्योष्णः श्वासकासकफानिलान् ।।६१।। हन्ति हिक्काऽश्मरीशुक्रदाहानाहान् सपीनसान् । स्वेदसंग्राहको मेदोज्वरकृमिहरः सरः ।।६२।। कुलथी के संस्कृत नाम—कुलत्थिका तथा कुलत्थ ये दो हैं । कुलथी—कषायरसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, पित्त तथा रुधिर विकार को करने वाली, लघु, विदाही, उष्णवीर्य, पसीने को रोकने वाली, सारक एवम्—श्वास, कास, कफ, वायु, हिचकी, पथरी, शुक्र, दाह, आनाह (अफरा), पीनस, मेद, ज्वर तथा क्रिमि को दूर करने वाली होती है । [६०-६२] १४. कुलथी हिं०—कुरथी, कुलथी । म०—कुलीथ । क०—हूरूली । ते०—उलवलु । गु०—कुलथी । ता०—कोललु । फा०— किल्लत, माशाहिन्दी, इब्बुलक्कल । अं०—Horse gram (हॉर्स ग्राम) । ले०—Dolichos biflorus Linn. (डोलिकॉस् बाईफ्लोरस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । कुलथी—इस देश में प्रायः सर्वत्र होती है। दक्षिण में जानवरों को खिलाने के लिये इसकी बहुत खेती की जाती है। इसका क्षुप—झाड़ीदार, आरोहणशील, पतला, धूसर, रोमश, १२ से १८ इञ्च ऊँचा एवं मूल से अनेक पतली शाखाओं से युक्त होता है । पत्ते—त्रिपत्रक एवं २ इञ्च लम्बे वृन्तयुक्त होते हैं । पत्रक—पीताभ हरे, १ ३/८ इञ्च लम्बे, तिर्यक् अंडाकार एवं अग्र तीक्ष्ण और रोमश होता है । पुष्प—छोटे पीताभ श्वेत रंग के आते हैं । फली—चिपटी, १ १/२-२ इञ्च लम्बी, १/४ इञ्च चौड़ी तथा कुछ टेढ़ी होती है । बीज—५-६ हलके लाल, काले चितकबरे, चिपटे, १/८-१/४ इञ्च बड़े एवं चमकीले होते हैं । इसको विशेष रूप से घोड़ों को खिलाते हैं । इसको बिना दाल बनाये ही उपयोग में लाते हैं । गरीब इसको खाते हैं । रासायनिक संगठन—बीजों में प्रोटीन २२, स्नेह, ०.५, खनिज ३.१, रेशा ५.३, कार्बोहाइड्रेट ५७.३, खटिक ०.२८, फास्फोरस ०.३९%, लोह ७.६ मि० ग्रा०, निकोटिनिक् ॲसिड १.५ मि० ग्रा० एवं विटामिन 'ए' ११९ एकक प्रति १०० ग्राम में पाया जाता है । इसमें यूरिएस् (Urease) काफी होता है । गुण और प्रयोग—यह उष्ण, मूत्रल, वात-कफनाशक, मेदहर एवं अश्मरीघ्न है । इसका क्वाथ अश्मरी, श्वास, कास एवं श्वेतप्रदर में दिया जाता है । मात्रा—३ से ६ माशा । अथ तिलः । तस्य तद्भेदानां च गुणानाह तिलः कृष्णः सितो रक्तः सवन्योऽल्पतिलः स्मृतः । तिलो रसे कटुस्तिक्तो मधुरस्तुवरो गुरुः ।।६३।। विपाके कटुकः स्वादुः स्निग्धोष्णः कफपित्तनुत् । बल्यः केश्यो हिमस्पर्शस्त्वच्यः स्तन्यो व्रणे हितः ।।६४।। दन्त्योऽल्पमूत्रकृद् ग्राही वातघ्नोऽग्निमतिप्रदः । कृष्णः श्रेष्ठतमस्तेषु शुक्रलो मध्यमः सितः ।। अन्ये हीनतरः प्रोक्तास्तज्ज्ञै रक्तादयस्तिलाः ।।६५।। तिल का संस्कृत नाम—तिल ही है । भेद—काले, सफेद तथा लाल रङ्गों के भेद से तिल तीन प्रकार के होते हैं । जो तिल जङ्गलों में होता है वह वन्यतिल और अल्पतिल नाम से प्रसिद्ध है ।