भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधान्यवर्गः ८०३ १२. मटर हिं०-मटर, मट्टर । बं०-मटर । म०-वाटाणे । गु०-मटाणा, वटाणा । क०-वटाणि । ते०-गुंडुसानगलु । ता०-पटाणी । फा०-जलबान, कसंग । अ०-खलज, हुब्बुल बकर । अं०-Field Pea (फील्ड पी); Garden Pea (गार्डन् पी) । ले०-Pisum sativum Linn. (पाइसम् सॅटिवम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । मटर-एक प्रसिद्ध खाद्य अन्न प्रायः सब प्रान्तों में प्रतिवर्ष बोया जाता है । इसका क्षुप-वर्षायु तथा सूत्रों के द्वारा आरोहणशील होता है । पत्ते-पक्षवत्, पत्रक १ से ३ जोड़े, अंतिम सूत्रों में परिवर्तित तथा पत्राधार फूला हुआ होता है । पुष्प-अनियमितकार द्विलिंगी एवं अपने वर्गविशिष्ट स्वरूप का होता है । फली-अनेक बीजों से युक्त, चिपटी, लम्बी तथा अग्र पर कुछ टेढ़ी नोकदार होती है । इसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं । रासायनिक संगठन- इसमें प्रोटीन २३, कार्बोहाइड्रेट ५४, स्नेह १, रेशा ५ एवं राख २ भाग रहती है । इसमें ट्राइगोनेल्लीन (Trigonelline) नामक क्षाराभ पाया जाता है । परिपक्व बीजों के तेल में लैंगिक हारमोन विरोधी गुण रहता है । इससे पौरुष हारमोन निष्क्रिय होकर वन्ध्यत्व प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग-कच्चे मटर से दस्त होते हैं । आहार में इसको अन्न की तरह व्यवहार में लाते हैं । अथ त्रिपुटः (खेसारी) । तस्य नामगुणानाह त्रिपुटः खण्डिकोऽपि स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । त्रिपुटो मधुरस्तिक्तस्तुवरो रूक्षणो भृशम् ।।५८।। कफपित्तहरो रुच्यो ग्राहकः शीतलस्तथा । किन्तु खञ्जत्वपङ्गुत्वकारी वातातिकोपनः ।।५९।। खेसारी-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, अत्यन्त रूक्ष, रुचिकारक, ग्राही, शीतल एवम् कफ तथा पित्त को नष्ट करनेवाली होती है और सेवन करने से लँगड़ा तथा पंगुला बना देने वाली और वायु को अत्यन्त कुपित करनेवाली होती है । [५८-५९] १३. खेसारी हिं०-खेसारी, खिसारी, कसूर, मटरभेद । बं०-खेसारी । म०-लाग । गु०-लांग । फा०-मासंग । अ०- इवुल बकर, खलज । अं०-Chickling Vetch (चिलिंग वेच) । ले०-Lathyrus sativus Linn. (लेथीरस् सेटीवस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है और उत्तर भारत में अधिक उत्पन्न होती है । इसकी शाखायें पंखदार होती हैं । पत्ते-पक्षवत् तथा अग्र २ या ३ सूत्रों में विभाजित रहते हैं । पत्रक पतले, १-२ १/२ इञ्च लम्बे, रेखाकार- भालाकार, लम्बाग्र एवं संख्या में २-४ रहते हैं । फूल-नीलापन युक्त लाल या श्वेत होते हैं । फलियाँ-१-१॥ इञ्च लम्बी, एक किनारे पर पंखदार तथा ४ से ५ बीजों से युक्त होती हैं । अकाल के समय गरीब इसकी दाल खाते हैं । इसका चारे के रूप में उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन-बीजों में एक विषैला पदार्थ होता है । गुण और प्रयोग-बीजों का तेल तीव्र तथा हानिकारक विरेचक होता है । इसकी दाल खाने से लकवा जैसा लॉथिरिज्म (Lathyrism) नामक रोग होता है । यह रोग जानवरों को भी होता है । कुछ विद्वानों के मत से इसके साथ मिले अन्य द्रव्यों के कारण यह रोग होता है ।