भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधान्यवर्गः ८०५ तिल-कटु, तिक्त, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में कटुरस युक्त, स्वादिष्ट, गुरु, स्निग्ध, उष्ण, कफ तथा पित्तनाशक, बलकारक, केशों के लिये हितकर, स्पर्श में शीतल, त्वचा के लिये हितकर, दुग्धवर्धक, व्रण में लाभ पहुँचाने वाला, दांतों के विकारों को दूर करनेवाला, थोड़ा मूत्रकारक, ग्राही, वातनाशक, जठराग्नि तथा बुद्धि को बढ़ाने वाला होता है । तिलों में काला तिल—वीर्यवर्धक तथा सर्वोत्तम होता है । सफेद तिल—गुणों में मध्यम होता है । इससे अन्य जो लाल वगैरह तिल हैं वे गुणों अत्यन्त हीन हैं ऐसा निघण्टु के विद्वानों का मत है । [६३-६५] १५. तिल हिं०-तिल, तील, तिली । बं.-तिलगाछ । म०-तील । गु०-तल । क०-बुल्लेल्लु । ते०-नुव्वुलु । ता०-एल्लु । फा०-कुंजद । अ०-सिमासिम, बजरुलखस खासुलवरी । अं०-Gingelli (जिंजेल्ली), Sesame (सीसेम) । ले०-Sesamum indicum Linn. (सिमेमम्, इंडिकम्) ; Fam. Pedaliaceae (पेडालिएसी) । इसकी प्रायः सभी प्रान्तों में खेती की जाती है । इसका क्षुप-३१/२-४१/२ फीट ऊँचा, काण्ड चौपहल एवं अनेक शाखायुक्त होता है । पत्ते-नीचे से ऊपर विभिन्न प्रकार के, दन्तुर या अखण्ड होते हैं । पुष्प-विभिन्न रंगों के, श्वेत से लेकर गहरे बैंगनी रंग के एवं नलिकाकार द्वयोष्ठ होते हैं । फली-११/२ से २ इञ्च लम्बी, करीब १/२-१ इञ्च गोलाई में एवं अनेक बीजों से युक्त होती है । बीज-विभिन्न प्रकार के अनुसार श्वेत, मन्दश्वेत, हलके भूरे, गहरे भूरे या काले रंग के हुआ करते हैं । ये चिपटे, अंडाकार तथा एक इञ्च की लम्बाई में ६ से ८ तथा चौड़ाई में १० से १२ आते हैं । विभिन्न ऋतुओं में बोने के अनुसार इनके भेद हुआ करते हैं । रासायनिक संगठन-इनमें प्रकार तथा स्थानभेद से तेल की मात्रा ३७-५७% एवं कार्बोहाइड्रेट १४ से २२% एवं प्रोटीन २१ से २६% पाया जाता है । काले तिल में प्रोटीन अधिक तथा कार्बोहाइड्रेट कम रहता है । भूरे की अपेक्षा श्वेत में प्रोटीन अधिक पाया जाता है । ताजे पत्तों में काफी लुआब रहता है । गुण और प्रयोग-तिल का तथा इसके तेल का उपयोग नित्य के व्यवहार में किया जाता है । यह स्नेहन, आनुलोमिक, मूत्रजनन, बाजीकर, आर्तवजनन, स्तन्यजनन, बल्य, व्रणशोधन रोपण तथा केशवर्धन है । (१) अर्श में इसको मक्खन के साथ खिलाते हैं तथा पीसकर गरमकर इससे सेंकते हैं । (२) मछली खाकर अजीर्ण हो तो इसके पंचांग का क्षार देते हैं । उदर शूल में तिल को सुगंधि पदार्थ के साथ पीसकर गोली बनाकर देते हैं । तिल से दाँत मजबूत रहते हैं । (३) खाँसी में तिल का क्वाथ, चीनी मिलाकर पिलाते हैं । सूखी खाँसी में ताजे पत्तों का हिम थोड़ा-थोड़ा पिलाते हैं । (४) मूत्राश्मरी में तिलक्षार दूध तथा शहद के साथ देते हैं । (५) इसका गर्भाशय पर संकोचक प्रभाव होने से अनार्तव इत्यादि में इसका उपयोग करते हैं । (६) इसका पुल्टिस व्रण पर बाँधते हैं । तेल का भी उपयोग व्रण पर लगाने के लिये करते हैं । मात्रा-बीज १ से २ तोला; पंचांगक्षार ५ से १२ रत्ती । अथातसी (तीसी) । तस्या नामगुणानाह अतसी नीलपुष्पी च पार्वती स्यादुमा क्षुमा ।।६६।। अतसी मधुरा तिक्ता स्निग्धा पाके कटुर्गुरुः । उष्णा दृक्छुकवातघ्नी कफपित्तविनाशिनी ।।६७।। तीसी के संस्कृत नाम-अतसी, नीलपुष्पी, पार्वती, उमा तथा क्षुमा ये सब हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA