भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०६ भावप्रकाशनिघण्टुः तीसी-मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध, विपाक में कटुरसयुक्त, गुरु, उष्ण एवम् नेत्रों की शक्ति, शुक्र, वात, कफ तथा पित्त को दूर करनेवाली होती है ।।६६-६७।। १६. तीसी हिं०-तीसी, तिसी, अलसी, मसीना । बं०-तिसी, मसीना । म०-जवंस, अठशी । गु०-अलशी । क०- अगसि । ते०-अविसि । ता०-अलिविराई । फा०-तुख्मे कृतान, वजुरग, वजुर्ग । अ०-बजरूल कतान, बजरूल कनान, वजरुलकतां । अं०-Common Flax (कामन फ्लेक्स), Linseed (लिन्सीड) ले०-Linum usitatissimum Linn. (लीनम् यूसिटेटिसिमम्) Fam. Linaceae (लिनेसी) । तीसी-प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में बोई जाती है । इसका पौधा-१।।-२ फीट ऊँचा होता है । पत्ते-छोटे, रेखाकार या भालाकार एवं ३ शिराओं से युक्त होते हैं । फूल-नीले रंग के घंटाकार; फल-गोल घुंडी सा ऊपर को नोकीला एवं ५ कोषयुक्त होता है । बीज-प्रत्येक कोष में १० के करीब, चिपटे, चिकने, गहरे भूरे एवं चमकीले होते हैं । पीले एवं श्वेत रंग के बीजों के भेद मध्यभारत तथा राजपुताना में होते हैं । बड़े में अधिक मात्रा में तथा कुछ हलके रंग का निकलता है । भूरे में भी छोटे-बड़े भेद होते हैं । बड़े में तेल अधिक रहता है । इसके बीज एवं तेल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । तेल का वार्निश, पेण्ट आदि में उपयोग करते हैं । कांड से लिनेन (Linen) तन्तु बनाते हैं जिसके कपड़े बनाये जाते हैं । रासायनिक संगठन-तीसी में तेल ३८ से ४५% रहता है । घानी से निकालने में २५-३०% ही प्राप्त होता है । इसमें प्रोटीन २०-२५%, पिच्छिल द्रव्य ६%, मोम, राल, फास्फोट, शर्करा १८% एवं अल्प ग्लाइकोसाइड, लिनामेरिन (Linamarin) रहता है । इसके पुष्प एवं अपक्व बीजों में हाइड्रोसाइनिक् अम्ल ०.६९% तक एवं क्षाराभ लिपरीन (Liparine) रहता है । गुण और प्रयोग-इसके बीज, स्नेहन, मार्दवकर, बल्य, वेदनास्थापन, मूत्रजनन एवं वातहर हैं । तेल विरेचन एवं व्रणरोपण है । (१) इसके तेल को या बीजों को सौम्यविरेचक रूप में देते हैं । (२) बीजों को कूटकर, पानी मिलाकर, पकाकर, पुल्टिस के रूप में शोथ आदि पर बाँधने से नवीन शोथ दब जाता है या पककर जल्दी फूट जाता है । इसका तेल तथा चूने का पानी मिला जले पर लगाते हैं । (३) इसके बीजों का फाँट खाँसी में देते हैं । मात्रा-तेल २ से ४ ड्राम; बीज १ बड़ा चम्मच । अथ तुवरी ("तोरी, तोडिस" इति लोके) । तस्य गुणानाह तुवरी ग्राहिणी प्रोक्ता लघ्वी कफविषास्रजित् । तीक्ष्णोष्णा वह्निवा कण्डूकुष्ठकोष्ठक्रिमिप्रणुत् ।।६८।। तुवरी (जिसे लोक में तोरी या तोडिस कहते हैं) के गुण—तोरी-ग्राही, लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, जठराग्निवर्धक एवम्-कफ, विष, रक्तविकार, खुजली, कुष्ठ तथा कोष्ठस्थित क्रिमि को दूर करनेवाली होती है । [६८] १७. तोरी हिं०-तोरी, तीरा, लाही, तारा, मिरा, सेओहा, तिहरा । पं०-असू, तारा । बं०-सेतसरिश । अं०-Rocket Salad (राकेट सलाद) । ले०-Eruca sativa Mill. (एरुका सटाइवा) । Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी) ।