भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधान्यवर्गः ८०७ यह पश्चिम हिमालय में १० हजार फीट की ऊँचाई तक होती है। उत्तरभारत में इसकी खेती की जाती है। पंजाब एवं अल्पमात्रा में उत्तर प्रदेश तथा ग्वालियर में शीतकालीन फसलों के साथ इसको बोते हैं। इसका क्षुप-सरसों के जैसा होता है। यह २ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-३ से ७ इञ्च लम्बे, मांसल, दन्तुर, आधे से अधिक पक्षवत् खण्डित एवं खण्ड प्रायः रेखाकार-आयताकार होते हैं। पुष्प-बड़े, श्वेताभ या पीताभ एवं बैंगनी शिराओं से युक्त होते हैं। फली-एक इञ्च लम्बी, सीधी, ऊपर की ओर उठी हुई एवं काण्ड से लगी हुई होती है। बीज- अनेक, छोटे, हल्के रक्ताभ भूरे, अंडोकार, चिकने एवं प्रत्येक कोष्ठ में दो कतारों में रहते हैं। राई, सरसों में इसकी मिलावट की जाती है। इसके तेल को लोग जलाने, खाने एवं मालिश इत्यादि के काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में २०% हल्के पीले रंग का, कुछ कड़वा एवं तीक्ष्ण गंध का तेल प्राप्त होता है। उत्तर प्रदेश के बीजों का तेल पंजाब की अपेक्षा कम तीक्ष्ण होता है। यह तेल ५, ६ महीने रखने से उसकी तीक्ष्णता कम हो जाती है। इसमें एक तीक्ष्ण गंध का उड़नशील तेल भी होता है जिसे चर्म पर लगाने से दाह होता है। गुण और प्रयोग-इसके नये पत्ते दीपन एवं मूत्रल होते हैं। इसके बीज सरसों की तरह प्रतिक्षोभक होते हैं। चर्मरोगों में तेल का उपयोग किया जाता है। कोमल पौधों का साग बनाते हैं। अथ सर्षपो रक्तः-पीतश्च (लाल सरसों और पीली सरसों)। तयोर्नामगुणानाह सर्षपः कटुकः स्नेहस्तुन्तुभश्च कदम्बकः । गौरस्तु सर्षपः प्राज्ञैः सिद्धार्थ इति कथ्यते ॥६९॥ सर्षपस्तु रसे पाके कटुः स्निग्धः सतिक्तकः । तीक्ष्णोष्णः कफवातघ्नो रक्तपित्ताग्निवर्धनः ॥७०॥ रक्षोहरो जयेत्कण्डूं कुष्ठकोष्ठक्रिमिग्रहान् । यथा रक्तस्तथा गौरः किन्तु गौरो वरो मतः ॥७१॥ सरसों (लाल सरसों) के संस्कृत नाम-सर्षप, कटुक, स्नेह, तुन्तुभ और कदम्बक ये सब हैं। सफेद सरसो (पीली सरसों) का संस्कृत नाम-गौर सर्षप और सिद्धार्थ है। सरसों-विपाक में कटुरस युक्त, स्निग्ध, कटु तथा तिक्त रसयुक्त तीक्ष्ण, उष्ण, कफ और वात का नाशक, रक्तपित्त तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाला, रक्षों की बाधा को दूर करनेवाला एवम् खुजली, कुष्ठ, कोष्ठस्थित क्रिमि तथा ग्रहबाधा को नष्ट करनेवाला होता है। सफेद सरसों, गुणों में यद्यपि लाल सरसों के समान ही है तथापि अपेक्षाकृत सफेद ही उत्तम होता है। सरसों के शाक का वर्णन आगे शाकवर्ग में दिया हुआ है। [६९-७१] १८. सरसों हिं०-सरसों, सरिसों, ससों। बं०-सरीसा। म०-शिरशी। गु०-शरशव, सरशव। क०-सासवे। ते०- आबालु। ता०-कुडुगु। फा०-सर्षक, सरशफ, सिपन्दान। अ०-उर्फे अबीयद, खर्दले अबयज, हुर्फ। अं०- Yellow Sarson (यलो सरसों); Indian Colza (इण्डियन् कोलझा)। ले०-Brassica campestris var. sarson Prain (ब्रासिका केम्पेस्ट्रिस् वेराइटी सरसों)। Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं पंजाब में यह अधिक होती है। इसका क्षुप-३ से ५ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-काण्ड की जड़ से सटे हुए, लम्बे, गहरे कटे किनारे वाले और चिकने होते हैं। फूल-अत्यन्त सुहाबने पीले रंग के आते हैं। फलियाँ-२-३ इञ्च लम्बी और गोल होती हैं। इनमें से जो पीले रंग के बीज निकलते हैं उन्हीं को सरसों कहते हैं। इसके कई प्रकार पाये जाते हैं। रंग भेद से पीला तथा भूरा, फली में के कोष्ठ की संख्यानुसार (२, ३, ४), फली की काण्ड के साथ की स्थिति, लटकी हुई या सीधी खड़ी के अनुसार ये भेद होते हैं। इससे 'सरसों का तेल' निकालते हैं। सरसों के खाने के तेल में इसकी अन्य जातियों के बीजों का तेल भी मिला रहता है।