भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन- इसमें ३५ से ४८% स्थिर तैल, ०.२७% उड़नशील तैल एवं प्रोटीन २०% एवं एरुसिक् एसिड (Erucic acid) रहता है। गुण और प्रयोग- इसका तेल खाने एवं मालिश के काम आता है। आमवातादि में कपूर मिलाकर इससे मालिश की जाती है। गरम जल में इसको मिलाकर पुलटिस के रूप में इसका प्रयोग करते हैं। इसमें का उड़नशील तैल प्रतिक्षोभक होता है एवं इसको चर्म पर लगाने से फोड़े आ सकते हैं। अथ राजिका कृष्णराजिका च (राई, कृष्णराई)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह राजीतु राजिका तीक्ष्णगन्धा क्षुज्जनिकाऽऽसुरी। क्षवः क्षुताभिजनकः कृष्णीका कृष्णसर्षपः ।।७२।। राजिका कफपित्तघ्नी तीक्ष्णोष्णा रक्तपित्तकृत्। किञ्चित् रूक्षाऽग्निदा कण्डूकुष्ठकोष्ठक्रिमीन्हरेत् ।। अतितीक्ष्णा विशेषेण तद्वत्कृष्णाऽपि राजिका ।।७३।। राई के संस्कृत नाम- राजी, राजिका, तीक्ष्णगन्धा, क्षुज्जनिका तथा आसुरी ये सब हैं। काली राई के संस्कृत नाम- क्षव, क्षुताभिजनक, कृष्णिका तथा कृष्णसर्षप ये सब हैं। राई- कफ तथा पित्तनाशक, तीक्ष्ण, उष्ण, रक्तपित्तकारक, किञ्चित् रूक्ष, जठराग्निवर्धक एवम् खुजली, कुष्ठ तथा कोष्ठस्थित क्रिमि को दूर करनेवाली होती है। काली राई- यह वैसे तो गुणों में राई ही के समान होती है किन्तु उसकी अपेक्षा विशेषतः अत्यन्त तीक्ष्ण होती है। [७२-७३] १९. राई हिं०- राई, लाल राई, माकड़ा राई। बं०- राइ, सरिषा। म०- राई। गु०- राई। क०- सासि। ते०- आवाल्। ता०- कडुगु। अ०- खरदल, खर्दल। फा०- सर्शप। अं०- Indian Mustard (इंडियन मस्टर्ड)। ले०- Brassica juncea Linn. (ब्रासीका जून्सिआ)। Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। राई- सरसों के समान खेतों में बोई जाती है। क्षुप- सरसों के समान होता है। पत्ते- साधारण, एकान्तर, मूलीय एवं काण्डीय तथा गहरे कटे हुये होते हैं। पुष्प- चमकीले पीले होते हैं। फली- पतली एवं आधार से फट जाती है। बीज- रक्ताभ भूरे, सरसों से छोटे एवं सिकुड़नदार होते हैं। इनसे भी तेल निकाला जाता है। एक बनारसी राई और होती है जिसका ले० नाम Brassica nigra Linn. (ब्रासिका नाइग्रा) है। इसके बीजों पर सूक्ष्म जाली दिखलाई देती है। इनसे तेल नहीं निकालते किन्तु चटनी-अचार इत्यादि में इसे डालते हैं। रासायनिक संगठन- राई में तेल ३५.५, प्रोटीन २४.६, रेशा ८ एवं राख ५.३ भाग रहती है। इसका तेल अधिक स्वच्छ तथा सरसों के जैसी गंध इसमें नहीं होती। गुण और प्रयोग- कम मात्रा में यह दीपन, पाचन, उत्तेजक तथा स्वेदजनन है। अधिक मात्रा अधिक देर रखने से फोड़े भी हो जाते हैं। इसे एक घंटे से अधिक कदापि न रखे। प्रतिश्याय में इसका तेल नाक एवं पावों पर मलते हैं। अथ क्षुद्रधान्यम्। तस्य नामगुणानाह क्षुद्रधान्यं कुधान्यं च तृणधान्यमिति स्मृतम्। क्षुद्रधान्यमनुष्णं स्यात्कषायं लघु लेखनम् ।।७४।। मधुरं कटुकं पाके रूक्षं चक्लेदशोषकम्। वातकृद् बद्धविट्कं च पित्तरक्तकफापहम् ।।७५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA