भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धान्यवर्गः ८०९ क्षुद्रधान्य के संस्कृत नाम-क्षुद्रधान्य, कुधान्य तथा तृणधान्य ये सब हैं। क्षुद्रधान्य-किञ्चित् उष्ण, कषाय तथा मधुर रस युक्त, लघु, लेखन, विपाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, क्लेद (आर्द्रता) को सुखाने वाला, वातकारक, मल को बाँधने वाला एवम्-पित्त, रक्तविकार तथा कफ का नाशक होता है। [७४-७५] अथ कङ्गुः (कङ्गुनी) तस्य नामभेदगुणानाह स्त्रियां कङ्गुप्रियङ्गू द्वे कृष्णारक्ता सिता तथा। पीता चतुर्विधा कङ्गुस्तासां पीता वरा स्मृता ।।७६।। कङ्गुस्तु भग्नसन्धानवातकृद् बृंहणी गुरुः । रूक्षा श्लेष्महराऽतीव वाजिनां गुणकृद् भृशम् ।।७७।। कङ्गुनी का संस्कृत नाम-कङ्गु तथा प्रियङ्गु (ये दोनों स्त्रीलिङ्गी हैं) हैं। भेद-काली, लाल, सफेद तथा पीली इन भेदों से कङ्गुनी ४ प्रकार की होती है। इनमें से पीली कंगुनी ही सर्वोत्तम होती है। कंगुनी-टूटी हुई अस्थियों को जोड़ने वाली, वातकारक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक), गुरु, रूक्ष, अत्यन्त कफनाशक और घोड़ों के लिये विशेष रूप से गुण करनेवाली होती है। [७६-७७] २०. कंगुनी हिं०-कंगुनी, कगनी, टंगुनी। बं०-कांगुनी। म०-कांग। ता०-तेनई। गु०-कांग। क०-नवणे। ते०- कोरलु। फा०-गल, अर्जुन। अ०-दुखुन। ले०-Setaria italica Beauv. (सेटारिया इटेलिका)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। कंगुनी की खेती प्रायः सब प्रान्तों में होती है। यह ६ हजार फीट की ऊँचाई तक हो सकने के कारण हिमालय के तराई प्रदेश में भी इसे लोग बोते हैं। इसकी सालभर तक पैदावार की जा सकती है तथा यह १०० दिन में तैयार हो जाती है। अधिकतर वर्षा के प्रारम्भ में इसे बोते हैं। इसका क्षुप-३-३ १/२ फीट ऊँचा, पतला एवं बाल के बोझ से झुका हुआ होता है। पत्ते-१२-१८ इञ्च लम्बे, १/२ इञ्च चौड़े, हल्के हरे एवं रेखाकार भालाकार होते हैं। पुष्पव्यूह-अवृन्त काण्डज (Spike-स्पाइक्), ६-१२ इञ्च लम्बा, ३/४-१ १/२ इञ्च व्यास का तथा शुकयुक्त होता है। बाल-बाजरे के समान किन्तु उससे छोटे प्रायः ६ इञ्च लम्बे एवं १/२-१ १/२ इञ्च व्यास के होते हैं। भेद के अनुसार ये लम्बे भी होते हैं। धान्य विभिन्न रंगों के हुआ करते हैं। ये चिकने चमकीले, पीले, श्वेत, मलाई के रंग के नारंग रक्त, बैंगनी, काले, हरिताभ श्वेत एवं हल्के पीत रंगों के होते हैं। बालों में से जो बारीक दाने निकलते हैं। उन्हीं को कंगुनी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन ११, स्नेह ४, कार्बोहाइड्रेट ७०, रेशा ५ एवं राख ३ भाग रहती है। इसमें एक विषैला ग्लूकोसाइड तथा तैलीय क्षाराभ पाया गया है। गुण और प्रयोग-चावल की तरह इसे लोग खाते हैं। प्रसवपीड़ा को कम करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। आमवात में इसका लेप किया जाता है। अथ चीनाकः (चीना) तस्य नामगुणानाह चीनाकः काककङ्गुश्च सुश्लक्ष्णः श्लक्ष्णकः स्मृतः । चीनाकः कङ्गुभेदोऽस्ति स ज्ञेयः कङ्गुवद् गुणैः ।।७८।। चीना के संस्कृत नाम-चीनाक, काककंगु, सुश्लक्ष्ण, श्लक्ष्णक तथा कंगुभेद ये सब हैं। चीना-कङ्गुनी का भेद है अतः इसके भी गुण कंगुनी के समान ही समझने चाहिये। [७८]