भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१० भावप्रकाशनिघण्टुः २१. चीना हिं०-चीना, चिन्ना, चैना । बं०-चिने । म०-वरिवव । गु०-चीणे, चीणा । क०-बरगु । ता०-पनिवरगु । ते०-वरिगलु । अं०-Indian Millet (इंडियन मिलेट) । ले०-Panicum miliaceum Linn. (पेनीकम मिलिएसिअम्) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । सभी स्थानों पर इसकी खेती की जाती है । यह शीघ्र होनेवाला क्षुद्र धान्य है । क्षुप-सीधा, वर्षायु एवं १८-२४ इञ्च ऊँचा होता है । पत्ते-पतले, रेखाकार तथा पर्व को घेरे रहते हैं । पुष्पव्यूह-अनेक शाखायुक्त तथा शाखाग्र पर सूचिकायें (Spikelets) एक या दो-दो रहती हैं । अंतिम या चतुर्थ बुसपत्र (Glume-ग्लूम) पर पुष्प रहता है जो धान्य में परिवर्तित होता है । धूसर, पीले, चमकीले हलके पीले आदि रंगों के भेद से यह कई प्रकार का होता है । रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन १३, स्नेह १, कार्बोहाइड्रेट ६९, रेशा २, राख ३ एवं आर्द्रता १२ भाग रहती है । गुण और प्रयोग-क्षुप का सोजाक में उपयोग करते हैं । धान्य को पकाकर या पीसकर उपयोग में लाते हैं । अथ श्यामाकः (सामा) । तस्य नामगुणानाह श्यामाकः श्यामकः श्यामस्त्रिबीजः स्यादविप्रियः । सुकुमारो राजधान्यं तृणबीजोत्तमश्च सः ।। श्यामाकः शोषणो रूक्षो वातलः कफपित्तहृत् ।।७९।। सामा के संस्कृत नाम-श्यामाक, श्यामक, श्याम, त्रिबीज, अविप्रिय, सुकुमार, राजधान्य तथा तृणबीजोत्तम ये सब हैं । सामा-शोषण करने वाला, रूक्ष, वातजनक एवम् कफ तथा पित्त को दूर करने वाला होता है । [७९] २२. साँवाँ हिं०-साँव, सावाँ । बं०-सावा, शामुला, श्यामाधान । म०-जंगली सामा, सामुल । गु०-सामो, सामोघास । ते०-ओड्डुलु । ता०-कुद्रैवलि पिल्लु । क०-सस्मै, सवै । अं०-Japanese Barnyard Millet (जापानीज बार्नयार्ड मिलेट) । ले०-Echinochloa frumentacea (एचिनोच्लोआ फ्रूमेण्टेसिआ) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । सभी स्थानों पर इसकी खेती की जाती है । वर्षा के प्रारम्भ में अन्य धान्यों के साथ इसे बोते हैं । यह बहुत जल्दी (६ सप्ताह) तैयार हो सकता है । इसका क्षुप-वर्षायु, २ से ४ फीट ऊँचा, पत्ते चौड़े, सूचिकायें बड़ी एवं बीज छोटे, चिकने, चमकीले, आधार पर गोल एवं अग्र नोकीला रहता है । रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन ६, स्नेह २, खनिज ४, रेशा १०, कार्बोहाइड्रेट ६६ तथा आर्द्रता १२ भाग रहती है । इसमें विटामिन 'बी' १ पर्याप्त रहता है । गुण और प्रयोग-इसका पंचांग पैत्तिक विकार तथा विबंध में लाभदायक माना जाता है । इस धान्य को गरीब खाते हैं । इसको उबाल कर या कुछ भूनकर खाया जाता है । अथ कोद्रवः वनकोद्रवश्च (कोदो-वनकोदो) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह कोद्रवः कोरदूषः स्यादुद्दालो वनकोद्रवः । कोद्रवो वातलो ग्राही हिमः पित्तकफापहः ।। उद्दालस्तु भवेदुष्णो ग्राही वातकरो भृशम् ।।८०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA