भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
८१० भावप्रकाशनिघण्टुः २१. चीना हिं०-चीना, चिन्ना, चैना । बं०-चिने । म०-वरिवव । गु०-चीणे, चीणा । क०-बरगु । ता०-पनिवरगु । ते०-वरिगलु । अं०-Indian Millet (इंडियन मिलेट) । ले०-Panicum miliaceum Linn. (पेनीकम मिलिएसिअम्) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । सभी स्थानों पर इसकी खेती की जाती है । यह शीघ्र होनेवाला क्षुद्र धान्य है । क्षुप-सीधा, वर्षायु एवं १८-२४ इञ्च ऊँचा होता है । पत्ते-पतले, रेखाकार तथा पर्व को घेरे रहते हैं । पुष्पव्यूह-अनेक शाखायुक्त तथा शाखाग्र पर सूचिकायें (Spikelets) एक या दो-दो रहती हैं । अंतिम या चतुर्थ बुसपत्र (Glume-ग्लूम) पर पुष्प रहता है जो धान्य में परिवर्तित होता है । धूसर, पीले, चमकीले हलके पीले आदि रंगों के भेद से यह कई प्रकार का होता है । रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन १३, स्नेह १, कार्बोहाइड्रेट ६९, रेशा २, राख ३ एवं आर्द्रता १२ भाग रहती है । गुण और प्रयोग-क्षुप का सोजाक में उपयोग करते हैं । धान्य को पकाकर या पीसकर उपयोग में लाते हैं । अथ श्यामाकः (सामा) । तस्य नामगुणानाह श्यामाकः श्यामकः श्यामस्त्रिबीजः स्यादविप्रियः । सुकुमारो राजधान्यं तृणबीजोत्तमश्च सः ।। श्यामाकः शोषणो रूक्षो वातलः कफपित्तहृत् ।।७९।। सामा के संस्कृत नाम-श्यामाक, श्यामक, श्याम, त्रिबीज, अविप्रिय, सुकुमार, राजधान्य तथा तृणबीजोत्तम ये सब हैं । सामा-शोषण करने वाला, रूक्ष, वातजनक एवम् कफ तथा पित्त को दूर करने वाला होता है । [७९] २२. साँवाँ हिं०-साँव, सावाँ । बं०-सावा, शामुला, श्यामाधान । म०-जंगली सामा, सामुल । गु०-सामो, सामोघास । ते०-ओड्डुलु । ता०-कुद्रैवलि पिल्लु । क०-सस्मै, सवै । अं०-Japanese Barnyard Millet (जापानीज बार्नयार्ड मिलेट) । ले०-Echinochloa frumentacea (एचिनोच्लोआ फ्रूमेण्टेसिआ) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । सभी स्थानों पर इसकी खेती की जाती है । वर्षा के प्रारम्भ में अन्य धान्यों के साथ इसे बोते हैं । यह बहुत जल्दी (६ सप्ताह) तैयार हो सकता है । इसका क्षुप-वर्षायु, २ से ४ फीट ऊँचा, पत्ते चौड़े, सूचिकायें बड़ी एवं बीज छोटे, चिकने, चमकीले, आधार पर गोल एवं अग्र नोकीला रहता है । रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन ६, स्नेह २, खनिज ४, रेशा १०, कार्बोहाइड्रेट ६६ तथा आर्द्रता १२ भाग रहती है । इसमें विटामिन 'बी' १ पर्याप्त रहता है । गुण और प्रयोग-इसका पंचांग पैत्तिक विकार तथा विबंध में लाभदायक माना जाता है । इस धान्य को गरीब खाते हैं । इसको उबाल कर या कुछ भूनकर खाया जाता है । अथ कोद्रवः वनकोद्रवश्च (कोदो-वनकोदो) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह कोद्रवः कोरदूषः स्यादुद्दालो वनकोद्रवः । कोद्रवो वातलो ग्राही हिमः पित्तकफापहः ।। उद्दालस्तु भवेदुष्णो ग्राही वातकरो भृशम् ।।८०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ८११ कोदो के संस्कृत नाम—कोद्रव तथा कोरदूष ये सब हैं। वनकोदो के संस्कृत नाम—उद्दाल तथा वनकोद्रव ये सब हैं। कोदो—वायुकारक, ग्राही शीतल एवम् पित्त तथा कफ का नाशक होता है। वनकोदो—गरम, ग्राही तथा अत्यन्त वातकारक होता है। [८०] २३. कोदो हिं०—कोदो धान, कोदव, कोदो। बं०—कोदो आधान। म०—कोद्र, हरिक, कोद्रु। गु०—कोदरा। क०— हारक। ते०—अरिकेलु। ता०—वरगु। अ०—कोद्रु। फा०—कोदिरम। ले०—Paspalum scrobiculatum Linn. (पास्पेलम् स्क्रोबिक्यूलेटम्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। सभी भागों में यह वन्य अथवा कृषितरूप में होता है। कोदो—एक प्रकार का तृणजातीय धान्य वर्षाकाल के आरम्भ ही में रोपण किया जाता है और आश्विन कार्तिक में काट लिया जाता है। इसका क्षुप—वर्षायु, सीधा खड़ा एवं १ १/२-२ फीट तक ऊँचा होता है। इसके पत्ते—पतले, घास के समान लम्बे होते हैं। इसकी मंजरी बाहर नहीं निकलती बल्कि सींकों के बीच में ही रह कर पक जाती है। इसके बीज सरसों के समान, छिलका सहित काले रंग के और भूसी निकालने पर किंचित् पीलापन युक्त सफेद रंग के होते हैं। इस अन्न में विशेषता यह है कि—भूसी सहित रखने से यह पचासों वर्ष तक नहीं बिगड़ता। इसकी भूसी निकाल कर गरीब कृषक खाते हैं। इसमें आटा भी कम निकलता है तथा भूसी हटाने में भी कठिनाई रहती है। इसके कई प्रकार पाये गये हैं। रासायनिक संगठन—इसके भूसी निकाले धान्य में प्रोटीन १२, कार्बोहाइड्रेट ७७, रेशा १ एवं राख १ भाग रहती है। कभी-कभी इसके पौधे तथा धान्य में मादक तत्त्व उत्पन्न हो जाते हैं जिससे चक्कर आदि आने लगते हैं। गुण और प्रयोग—मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति के लिये चावल के स्थान पर इसको दिया जाता है। अथ चारुकः (शरबीज)। नामगुणानाह चारुकः शरबीजः स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ। चारुको मधुरो रूक्षो रक्तपित्तकफापहः ।। शीतलो लघुवृष्यश्च कषायो वातकोपनः ।।८१।। शरबीज (सरपत के बीज) का संस्कृत नाम—चारुक तथा शरबीज है। शरबीज—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, वीर्यवर्धक, वात को कुपित करने वाले एवं रक्तपित्त तथा कफ के नाशक होते हैं। २४. शरबीज इसका विवरण पहले गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ५४८) में किया गया है। अथ वंशयवाः (बाँस के बीज)। तेषां गुणानाह यवा वंशभवा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः। बद्धमूत्राः कफघ्नाश्च वातपित्तकराः सराः ।।८२।। बाँस के बीज के संस्कृत नाम—वंशयव तथा वंशबीज हैं। बाँस के बीज—कषाय रसयुक्त, रूक्ष, विपाक में कटु रसयुक्त, मूत्र का विबन्ध (रुकावट) करने वाले, वात तथा पित्तकारक, सारक-एवम् कफनाशक होते हैं।
८१२ भावप्रकाशनिघण्टुः २५. वंशयव इसका विवरण पहले गुडूच्यादिवर्ग में पृष्ठ ५४५ पर किया गया है। अथ कुसुम्भबीजम् (कुसुम के बीज, कर्र) । तस्य नामगुणानाह कुसुम्भबीजं वरटा सैव प्रोक्ता वरट्टिका ।।८३।। वरटा मधुरा स्निग्धा रक्तपित्तकफापहा। कषाया शीतला गुर्वी स्याद्वृष्याऽनिलापहा ।।८४।। कुसुम के बीज (कर्र, बर्र) के संस्कृत नाम-कुसुम्भबीज, वरटा तथा वरट्टिका ये सब हैं। कुसुम के बीज-मधुर तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, गुरु, किंचित् वीर्यवर्धक एवं-रक्तपित्त-कफ तथा वात को दूर करने वाले होते हैं। [८३-८४] २६. कुसुम के बीज इसका विवरण हरीतक्यादिवर्ग में पृष्ठ ३०६ पर दिया गया है। अथ गवेधुका (गरहेडुआ) । तस्या नामगुणानाह गवेधुका तु विद्वद्भिर्गवेधुः कथिता स्त्रियाम्। गवेधुः कटुका स्वाद्वी कार्श्यकृत्कफनाशिनी ।।८५।। गरहेडुआ के संस्कृत नाम-गवेधुका और गवेधु (यह स्त्री लिङ्गी है) ये दो विद्वानों ने बतलाये हैं। गरहेडुआ- कटुरस युक्त, स्वादिष्ट, कृशता करने वाला एवं-कफनाशक होता है। [८५] २७. गरहेडुवा हिं०-गरहेडुआ, गरहेडु (दु) वा, सन्कृ। बं०-गड़गड़, देधान, गुरगुड़। म०-कसई। गु०-कसई। अं०- Adlay (अँडले); Jobs Tears (जॉवस् टियर्स्)। ले०-Coix lachryma jobi Linn. (कोइक्स लेक्रिमा जोबी)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। यह बंगाल के गढ़हों और चावल के खेतों में उत्पन्न होता है तथा अन्य प्रान्तों में भी पाया जाता है। इसका पौधा-३ से ६ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-४ से १८ इञ्च तक लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, रेखाकार प्रासवत् एवं उनका किनारा तीक्ष्ण तथा कठोर होता है। पुष्प दण्ड-१ से २¹/₂ इञ्च लम्बे, चिपटे या ३ पहलवाले एवं पत्रकोण से एक साथ कई निकले रहते हैं। फल-अंडाकार या नाशपाती के आकार का या अश्रुक स्वरूप का, ०.३ इञ्च लम्बा तथा चमकीला होता है जिसके अन्दर सफेद या हलके भूरे रंग का चावल जैसा दाना (वास्तविक फल) निकलता है। इसके नाप, आकार, रंग, कठोरता के भेद से कई प्रकार पाये जाते हैं। इसके फल तथा मूल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन १०-२०, कार्बोहाइड्रेट ७३-७४, स्नेह ३-४ एवं आर्द्रता १० भाग रहती है। इसमें खनिज अन्य धान्यों की अपेक्षा कम रहते हैं। कोइसीन (Coicin) नामक एक प्रोलेमीन (Prolamine) इससे प्राप्त किया गया है जिसमें ल्यूसिन (Leucine) तथा ग्लूटेमिक ॲसिड (Glutamic acid) काफी रहता है। गुण और प्रयोग-इसका चावल की तरह उपयोग किया जा सकता है। इसका क्वाथ मूत्रजनन होने से मूत्रकृच्छ्र में दिया जाता है। मूल का उपयोग पीड़ितार्तव में करते हैं। इसकी रोटी खाने से चरबी कम होती है। अथ नीवरः (तीनी) । तस्य नामगुणानाह प्रसाधिका तु नीवारस्तृणान्नमिति च स्मृतम्। नीवारः शीतलो ग्राही पित्तघ्नः कफवातकृत् ।।८६।।
धान्यवर्गः ८१३ तीनी के संस्कृत नाम—प्रसाधिकां, नीवार और तृणान्न ये सब हैं। तीनी—शीतल, ग्राही, पित्तनाशक एवम् कफ तथा वातकारक है ॥८६॥ २८. तीनी हिं०—तीनि, तीन्नी, जंगलीदाल। बं०—उडिधान्य। म०—देवभात। गु०—वंटो। क०—ज्वरहुमेधे। ते०— निवोरीवट्टु। ता०—वल्लीपुल्लु। आसा०—फुटकी। ले०—Hygroryza aristata Nees. (हाइग्रोहाइझा एरिस्टेटा)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। समस्त भारत में यह पाया जाता है। यह एक जलीय घास की जाति का पौधा है जो तालाबों या जलीय भूमि पर फैला हुआ रहता है। वर्षा ऋतु में आसाम में चावल के खेतों पर यह फैला हुआ पाया जाता है। काण्ड १ से १ १/२ फीट लम्बे होते हैं। इसके चावल को गरीब लोग खाते हैं। इस घास को जानवर खाते हैं। गुण और प्रयोग—इसके चावल शीतल, ग्राही, सुपाच्य एवं पित्तशामक माने जाते हैं। अथ यावनालः (पनेरा, जुआर) तस्य गुणानाह यावनालो हिमः स्वादुर्लोहितः श्लेष्मपित्तजित्। अवृष्यस्तुवरो रूक्षः क्लेदकृत्कथितो लघुः ।।८७।। जुआर (पनेरा) का संस्कृत नाम यावनाल है। जुआर—स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, शीतल, किंचित् वीर्यवर्द्धक, रूक्ष, क्लेदकारक, लघु एवम् रक्त विकार, कफ तथा पित्त को नष्ट करने वाला होता है। [८७] २९. जुआर हिं०—जुआर, ज्वार, जुवार। बं०—जुयारा, जोयार। म०—जोंधले, ज्वारी। गु०—जुवार। क०—जोला। ते०—जोन्नलु। ता०—चोलं। फा०—जुरेमका, जिर्रहमका, गावरस हिन्दी। अ०—हंतारुमिया खंदरूस, हिन्तये रूमिया। ले०—Sorghum vulgare (Linn.) Pers. (सोर्घम् व्हलगेर्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। क्षुप—वर्षायु, १० से १५ फीट ऊँचा; काण्ड १/२-२ १/२ इञ्च मोटा; पत्ते— २ से ३ १/२ इञ्च लम्बे, १-३ इञ्च चौड़े, चिकने, किनारा खुरदरा तथा मध्य शिरा श्वेत; बाल-विभिन्न स्वरूप का रहता है। इसके अनेक भेदोपभेद होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें प्रोटीन ९, कार्बोहाइड्रेट ७२, स्नेह २, रेशा २, राख २ तथा आर्द्रता १३ रहती है। इसके पत्तों में हाइड्रोसायनिक ॲसिड पाया जाता है। बीजों में ग्लूकोसाइड धुरिन् (Dhurin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसका अन्न के रूप में उपयोग किया जाता है। यह मूत्रजनन तथा कुछ वृष्य होता है। अथ परिभाषामाह धान्यं सर्वं नवं स्वादु गुरु श्लेष्मकरं स्मृतम्। तत्तु वर्षोषितं पथ्यं यतो लघुतरं हि तत् ।।८८।। वर्षोषितं सर्वधान्यं गौरवं परिमुञ्चति। न तु त्यजति वीर्यं स्वं क्रमान्मुञ्चत्यतः परम् ।।८९।। एतेषु यवगोधूमतिलमाषा नवा हिताः। पुराणा विरसा रूक्षा न तथा गुणकारिणाः ।।९०।। धान्यविषयक परिभाषा—सभी प्रकार के धान्य यदि नवीन हों तो वे स्वादिष्ट, गुरु तथा कफकारक होते हैं। यदि वे वर्ष भर के रक्खे पुराने हों तो पथ्य होते हैं क्योंकि वे अत्यन्त लघु हो जाते हैं। वर्ष भर के बाद जैसे-जैसे वे पुराने
८१४ भावप्रकाशनिघण्टुः होते जाते हैं वैसे-वैसे अपने-अपने वीर्य को क्रम से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में छोड़ते जाते हैं । किन्तु जव, गेहूँ, तिल, उरद ये नवीन ही अवस्था में अपने-अपने गुणों से युक्त रहते हैं और हितकर होते हैं । पुराने होने पर वे विरस तथा रूक्ष हो जाते हैं तथा उतने गुणकारी नहीं होते हैं । [८०-९०] ❖ पुराणा वर्षद्वयादुपरि स्थिताः । यवादयो नवाः स्वस्थान् प्रति हिताः । पथ्याशिनां तु पुराणा हिताः । “पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूल्यभुग् ।'' इति वसन्ते वाग्भटेनोक्तत्वात् ।। ९० ।। यहाँ पर मूल में “पुराण” पद से दो वर्ष के ऊपर के रक्खे हुए जो धान्य हों वे पुराने कहलाते हैं । और जव आदि धान्य यदि नवीन हों तो वे स्वस्थ मनुष्यों के लिये ही हितकर होते हैं । पथ्य रखने वाले रोगियों के लिये तो पुराने अर्थात् दो वर्ष के अन्दर तक हितकर होते हैं और उनके लिये नवीन हितकर नहीं होते हैं । क्योंकि-वसन्त में पथ्य द्रव्यों के वर्णन में वाग्भट ने “पुराणयवगोधूम०—” इत्यादि से ‘पुराना जव तथा गेहूँ, मधु, जंगली जीवों के मांस का कबाब खाना हितकर है” ऐसा कह कर पुराना जव, गेहूँ पथ्य बतलाया है । [८८-९०] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे धान्यवर्गः समाप्तः ।
अथ शाकवर्गः तत्र शाकनिरूपणमाह पत्रं पुष्पं फलं नालं कन्दं संस्वेदजं तथा। शाकं षड्विधमुद्दिष्टं गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।।१।। शाक का निरूपण—(१) पत्र, (२) पुष्प, (३) फल, (४) नाल, (५) कन्द और (६) संस्वेदज ये ६ प्रकार के शाक माने गये हैं, इनमें एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुरु समझना चाहिये । जैसे—पत्र की अपेक्षा पुष्पशाक गुरु होता है उसकी अपेक्षा फल शाक अधिक गुरु होता है इत्यादि क्रम से उत्तरोत्तर गुरु होते हैं । [१] अथ शाकानां गुणानाह प्रायः शाकानि सर्वाणि विष्टम्भीनि गुरूणि च । रूक्षाणि बहुवर्चांसि सृष्टविण्मरुतानि च ।।२।। शाकं भिनत्ति वपुरस्थि निहन्ति नेत्रं वर्णं विनाशयति रक्तमथापि शुक्रम् । प्रज्ञाक्षयं च कुरुते पलितं च नूनं हन्ति स्मृतिं गतिमिति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।।३।। शाकेषु सर्वेषु वसन्ति रोगास्ते हेतवो देहविनाशनाय । तस्माद् बुधः शाकविवर्जनं तु कुर्यात्तथाऽम्लेषु स एव दोषः ।।४।। सभी प्रकार के शाकों के सामान्य रूप से गुण—प्रायः सभी शाक (पत्र-पुष्पादिक ६ प्रकार के)—विष्टम्भक, गुरु, रूक्ष, विशेष रूप से मल निकालने वाले अर्थात् अधिक टट्टी निकालने वाले, मल तथा अधोवायु की प्रवृत्ति कराने वाले होते हैं और द्रव्यगुण जानने वाले विद्वान् लोग शाक के विषय में यह भी कहते हैं कि—शाक-शरीरस्थित हड्डियों का भेदन करने वाला अर्थात् उनकी सारताको नष्ट करने वाला, नेत्रों की शक्ति, रक्त, शुक्र, बुद्धि, स्मरणशक्ति तथा गति (चलने की शक्ति) को नष्ट करने वाला एवम्-पलित (अकाल में बालों का सफेद होना) को करने वाला होता है । सभी शाकों में रोग रहते हैं और वे ही रोग देह के नष्ट करने में हेतु होते हैं । इससे समझदार लोगों को चाहिये कि—शाक का खाना छोड़ दें और अम्ल (खट्टे) पदार्थों में भी पूर्वोक्त दोष होने से उनका सेवन परित्याग करना उचित है । [२-४] ❖ एतानि शाकनिन्दकानि वचनानि सामान्यानि ।।२-४।। यहाँ पर इतना और समझना चाहिये कि—ये सब शाक की निन्दा करनेवाले पूर्वोक्त वचन सामान्य रूप से हैं। [२-४] अथ शाकेषु विशिष्टानि । तत्र पत्रशाकानि । तत्रापि वास्तूकद्वयम् (दोनों बथुआ) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वास्तूकं वास्तुकं च स्यात्क्षारपत्रं च शाकराट् । तदेव तु बृहत्पत्रं रक्तं स्याद्गौडवास्तुकम् ।।५।। प्रायशो यवमध्ये स्याद्यवशाकमतः स्मृतम् । वास्तूकद्वितयं स्वादु क्षारं पाके कटूदितम् ।।६।। दीपनं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदम् । सरं प्लीहास्त्रपित्तार्शः कृमिदोषत्रयापहम् ।।७।।
८१६ भावप्रकाशनिघण्टुः शाक के विषय में विशेष वचन निम्नलिखित हैं—शाकों में प्रथम पत्रशाक का वर्णन करते हैं। उसमें भी प्रथम दोनों प्रकार के बथुआ के विषय में विशेष वचनों का उल्लेख करते हैं। बथुआ के संस्कृत नाम—वास्तूक, वास्तुक, क्षारपत्र और शाकराट् ये सब हैं। बड़ा बथुआ का लक्षण तथा संस्कृत नाम—जो बथुआ बड़े पत्तों वाला एव् रक्तवर्ण का होता है, उसे “गौड़ वास्तुक” कहते हैं। बथुआ अधिकतर जव के खेत में होता है, अतः संस्कृत में इसे “यवशाक” भी कहते हैं। दोनों बथुआ—स्वादिष्ट, क्षारयुक्त, विपाक में कटुरस युक्त, अग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, लघु, शुक्र तथा बल को बढ़ाने वाले, सारक एवम् प्लीहा, रक्तपित्त, बवासीर, कृमि तथा त्रिदोष के नाशक हैं। [५-७] १. बथुआ हिं०—बथुआ, बथवा, चिल्लीशाक। बं०—बेतुया, वेतोशाक। म०—चाकवत, चकवत। गु०—टांको, बथवों, बाथरो, चीलो। ता०—परुपुकिरै। क०—विलिय चिल्लीके। फा०—मुसेलेसा, सरमक, सलमह। अ०—रोक् बतुल बजामेल, कुतुफ, कतफ। अं०—Lambs Quarters (लैम्बस् क्वार्टर्स्)। ले०—Chenopodium album Linn. (चिनोपोडियम् एल्बम्)। Fam. Chenopodiaceae (चिनोपोडिएसी)। भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बहुलता से पाया जाता है विशेष कर यह आप ही आप बिना बोये उत्पन्न होता है। इसका क्षुप—गंधहीन, सीधा या झुका हुआ, १-१ १/२ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—आकार में छोटे-बड़े त्रिकोणाकार, नुकीले एवं कई प्रकार के होते हैं। डण्डियों के अन्त में बारीक पुष्प और बीज कोषों के गुच्छे लगते हैं। इसके श्वेत, हरित एवं कुछ लाली ऐसे तीन प्रकार (Varieties) पाये जाते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें कॅरोटीन (Carotene) तथा विटामिन ‘सी’ होता है। गुण और प्रयोग—यह सारक एवं कृमिघ्न है। जलने पर इसके पत्तों का लेप दाह शान्ति के लिये लगाते हैं। कुपचन में इसका साग देते हैं। २. सुगन्धवास्तुक एक सुगन्धवास्तुक (C. ambrosioides—चि. एम्ब्रोसिओइडिस्) नामक अन्य जाति होती है जो बंगाल, सिलहट, दक्षिण एवं बिहार में पाई जाती है। इसका क्षुप—२ से ४ फीट ऊँचा, सुगन्धित ग्रन्थिरोमश; पत्ते—आयताकार या प्रासवत्, कुण्ठिताग्र तथा नीचे के लहरदार एवं दन्तुर; पुष्प—छोटे, हरित, असंख्य एवं लम्बी मंजरी में गुच्छबद्ध होकर निकले हुये; फल—गोल, कुछ दबे हुये एवं फलभित्ति से आवृत् बीज—छोटे, वृक्काकार, १/३० इञ्च व्यास के, भूरे, चिकने, चमकीले एवं स्वाद में कटुतिक्त रहते हैं। समग्र वनस्पति में तीव्र गंध आती है। रासायनिक संगठन—पुष्प एवं फल आने पर मूल को छोड़कर बाकी भाग से एक उड़नशील तैल (०.१७%) निकाला जाता है जो अमेरिका के इसके एक प्रकार से पाये जाने वाले तेल, चिनोपोडियम ऑईल (Chenopodium oil) का भारतीय प्रतिनिधि है। इस तेल का मुख्य कृमिघ्न तत्त्व एस्कॅरिडॉल् (Ascaridol) भारतीय तेल में ४०- ४५% रहता है जबकि अमेरिकी तेल में यह ६०% तक रहता है। इसलिए इसे अधिक मात्रा (५-२० मिनिमम) में देना पड़ता है। इस पौधे के सभी अंगों में संपोनिन रहता है जो मूल में अधिक रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन ‘सी’ एवं मॅग्नेशियम् फॉस्फेट पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इस तेल का उपयोग बहुत सावधानी के साथ आंत्रस्य कृमियों के लिये स्वतंत्र या अन्य औषध के साथ करते हैं। अंकुश कृमि (Hookworm—हूक्वर्म) के लिये यह बहुत उपयोगी है। विशेष विवरण आदि आधुनिक डाक्टरी ग्रन्थों में देखें। इसके बीज ५ से २० रत्ती की मात्रा में चीनी के साथ कृमि विकार के लिये खिलाते हैं।
शाकवर्गः ८१७ अथ पोतकी (पोई)। तस्या नामगुणानाह पोतक्युपोदिका सा तु मालवाऽमृतवल्लरी। पोतकी शीतला स्निग्धा श्लेष्मला वातपित्तनुत् ।।८।। अकण्ठ्या पिच्छिला निद्राशुक्रदा रक्तपित्तजित्। बलदा रुचिकृत्पथ्या बृंहणी तृप्तिकारिणी ।।९।। पोई के संस्कृत नाम—पोतकी, उपोदिका, मालवा तथा अमृतवल्लरी ये सब हैं। पोई—शीतल, स्निग्ध, कफजनक, वात तथा पित्तनाशक, किञ्चित् कण्ठ के लिये हितकर, पिच्छिल, निद्रा तथा शुक्र को देनेवाली, रक्तपित्त को दूर करनेवाली, बलदायक, रुचिकारक, पथ्य, बृंहण (रस—रक्तादिवर्धक) एवम् तृप्तिकारक होती है। [८-९] ३. पोय हिं०—पोय (शाक), पोय का साग, पोई का साग। बं०—पूंई, पुईशाक। म०—मायाल। गु०—पोथी। क०— वसले। ते०—बच्चलि। ता०—वसलक्किरै। अं०—Indian Spinach (इण्डियन् स्पाइनॅक) ले०—Basella rubra Linn. (बेसिला रुब्रा)। Fam. Basellaceae (बेसेलेसी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में बोई जाती है तथा वन्य भी पाई जाती है। इसका क्षुप—बहुवर्षायु, फैलनेवाला लतासदृश होता है। पत्ते—शीशम के पत्ते के समान गोलाकार परन्तु उनसे मोटे, ५ × ३ इञ्च बड़े और गूदेदार होते हैं। पत्रदण्ड से कोमल सींक निकल कर उस पर क्रमशः लाल मिश्रित सफेद रंग के फूल आते हैं। फल—छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् नोकीले एवं पकने पर कालापन युक्त बैंगनी रंग के हो जाते हैं। सफेद और लाल कांड के भेद से यह दो प्रकार की होती है। रासायनिक संगठन—इसमें खटिक, लोह तथा विटामिन 'ए', 'बी₁', 'बी₂' एवं प्रोटीन रहता है। गुण और प्रयोग—यह शीतल तथा स्नेहन है। इसका स्वरस, उदर्द एवं गर्भिणी तथा बालकों के विबंध में देते हैं। सोजाक में भी इसे दिया जाता हैं। उदर्द में इसको शरीर पर मलते भी हैं। अथ श्वेतरक्तमारिषौ (सफेद व लाल मरसा)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह मारिषो बाष्पको मार्ष श्वेतो रक्तश्च संस्मृतः। मारिषो मधुरः शीतो विष्टम्भी पित्तनुद् गुरुः ।।१०।। वातश्लेष्मकरो रक्तपित्तनुद् विषमाग्निजित्। रक्तमार्षो गुरुर्नाति सक्षारो मधुरः सरः। श्लेष्मलः कटुकः पाके स्वल्पदोष उदीरितः ।।११।। मरसा के संस्कृत नाम—मारिष, बाष्पक और मार्ष ये सब हैं। भेद—सफेद तथा रक्तवर्ण के भेद से मरसा दो प्रकार का होता है। मरसा (सफेद)—मधुर रसयुक्त, शीतल, विष्टम्भजनक, पित्तनाशक, गुरु, वात तथा कफकारक एवम्-रक्तपित्त तथा विषमाग्नि को शमन करने वाला होता है। लाल मरसा—किंचित् गुरु, क्षारयुक्त मधुर रस वाला, सारक, कफजनक, पाक में कटुरसयुक्त तथा स्वल्प दोषवाला कहा हुआ है। [१०-११] ४. सफेद मरसा हिं०—मरसा। बं०—सादानटे। गु०—डांभो। ता०—तण्डुकिरई। ते०—टोटाकुड़ा। म०—भाजी, माठाची भाजी। ले०—Amaranthus blitum var. oleraceae Duthie (अॅमॅरेन्थस् ब्लाइटम वेर ओलेरेसिआ)। Fam. Amaranthaceae (अॅमॅरेन्थेसी)। ५५ भाव. I
८१८ भावप्रकाशनिघण्टुः सभी भागों में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप-गूदेदार तथा सीधा होता है। पत्ते आयताकार होते हैं। इसके बीजों को भी भूनकर खाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन २.९% एवं लोह अधिक मात्रा में (१८.१८ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम में) रहता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, पित्तशामक एवं रक्तपित्तशामक है। इसका साग खाते हैं। ५. लाल मरसा हिं०-लाल मरसा, लाल साग। बं०-डेंगुआ। म०-माठ। क०-दन्तु। ते०-टोटाकुरा। ले०-Amaranthus gangeticus. Linn. (ॲमॅरेन्थस् गॅजेटिकस्) । Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरेन्थेसी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में इसका रोपण करते हैं। इसका क्षुप-२-३ फुट ऊँचा और हरिताभ या गहरा लाल होता है। पत्ते-उक्त मरसे के आकार वाले, प्रकार के अनुसार किंचित् हरापनयुक्त लाल या नीलापन युक्त लाल अथवा चमकिले लाल रंग के एवं विभिन्न आकारवाले होते हैं। डण्डियों के चारों ओर सघन गुलाबी रंग के बारीक फूलों के गुच्छे लगते हैं। बीज-उक्त मरसा के समान होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके कोमल काण्ड में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज एवं विटामिन 'ए', 'बी$_१$' तथा 'सी' पाये जाते हैं। बीजों में सॅपोनिन् रहता है जो अल्प विषैला रहता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तपित्तशामक एवं व्रणरोपण है। अतिसार, रक्तातिसार एवं रक्तप्रदर में इसको देते हैं। व्रण प्रक्षालन एवं मुखपाक में इसका उपयोग करते हैं। अथ तण्डुलीयः (चौलाई) । तस्य नामगुणानाह तण्डुलीयो मेघनादः काण्डेरस्तण्डुलेरकः । भण्डीरस्तण्डुलीबीजो विषघ्नश्चाल्पमारिषः ।।१२।। तण्डुलीयो लघुः शीतो रूक्षः पित्तकफास्रजित् । सृष्टमूत्रमलो रुच्यो दीपनो विषहारकः ।।१३।। चौलाई के संस्कृत नाम-तण्डुलीय, मेघनाद, काण्डेर, तण्डुलेरक, भण्डीर, तण्डुलीबीज, विषघ्न तथा अल्पमारिष ये सब हैं। चौलाई-लघु, शीतल, रूक्ष, मूत्र तथा मल को निकालने वाली, रुचिकारक, अग्निदीपक एवम् पित्त, कफ, रक्तविकार तथा विष को दूर करने वाली होती है। [१२-१३] ६. चौलाई हिं०-चौलाई का शांक, चौराई का साग, कटैली चवलाई। बं०-कांटा नटे। म०-कांटेमाठ। गु०-कांटालो डांभो। क०-मुल्लुहरिवेसोप्पु । ते०-मोला टोटा कुरा। ता०-मुलुक्वोरै। अं०-Prickly Amaranth (प्रिक्ली ॲमॅरेन्थ)। ले०-Amaranthus spinosus Linn. (ॲमॅरेन्थस् स्पाइनोसस्) । Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरेन्थेसी) । यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के खेत, बाग, बगीचों में और बीरान भूमि में आप ही आप उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-२ फीट तक ऊँचा और शाखाएँ झाड़ीदार होती हैं। पत्ते-१।।-२ इञ्च लम्बे, चौड़े भालाकार किन्तु नोकरहित होते हैं। पत्तों की जड़ में महीन तीक्ष्ण काँटे होते हैं। काण्ड पर बारीक फूलों के गुच्छे रहते हैं। इनमें से बारीक काले रंग के गोल चमकीले बीज निकलते हैं।
शाकवर्गः ८१९ काँटे वाली, बिना काँटे वाली, हरे पत्ते की, लाल पत्ते की और नीलापन युक्त लाल अथवा लालीयुक्त नीले पत्ते की, इस प्रकार चौलाई कई प्रकार की होती है। रासायनिक संगठन-इसमें काफी पोषक तत्त्व रहते हैं। इसमें प्रोटीन ३, स्नेह ०.३, कार्बोहाइड्रेट ८, खनिज ३.६, खटिक ०.८, लोह २३ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम में रहता है। गुण और प्रयोग-यह शीतल, मूत्रजनन, स्नेहन एवं गर्भाशय के लिये वेदनास्थापन तथा शक्तिदायक और स्तन्यजनन है। (१) इसकी जड़ का क्वाथ मुलेठी तथा अपामार्ग के साथ सोजाक में दिया जाता है। (२) रक्तप्रदर के लिये इसका बहुत उपयोग करते हैं। इसमें इसके मूल के साथ आँवला, अशोक की छाल एवं दारुहल्दी का उपयोग किया जाता है। इससे पीड़ा भी कम होती है तथा रक्तस्राव बंद होता है। श्वेतप्रदर में इसके साथ हिराबोल देते हैं। इससे गर्भपात की आदत दूर होती है। मासिक के काल के समय गर्भिणी को इसे ३-४ दिन देते हैं। (३) स्तन्यवृद्धि के लिये इसके पंचांग को अरहर की दाल के साथ पकाकर देते हैं। जानवरों में भी इसका उपयोग करते हैं। (४) गाँठ, फोड़े आदि जल्दी पकाने के लिये मूल का लेप करते हैं। विसर्प तथा अन्य दाहयुक्त चर्मरोग में दाहशांति के लिये इसके पत्तों को पीसकर लेप करते हैं। अथ पानीयतण्डुलीयम् (जलचौलाई) । (चौलाईभेदो जलतण्डुलीयं शास्त्रे कञ्झटमिति प्रसिद्धम्) । तस्य नामगुणानाह पानीयतण्डुलीयं तु कञ्झटं समुदाहृतम्। कञ्झटं तिक्तकं रक्तपित्तानिलहरं लघु ।।१४।। जल चौलाई (यह चौलाई का भेद है और शास्त्र में "कञ्झट" नाम से प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-पानीयतण्डुलीय, जलतण्डुलीय तथा कञ्झट ये सब हैं। जल चौलाई-तिक्त रस युक्त, लघु एवम्-रक्तपित्त तथा वायुदोष को नष्ट करने वाली होती है। [१४] ७. जलचौलाई यह भी अॅमॅरेन्थस् की जल के समीप होने वाली कोई जाति (Species) है। ८. रामदाना रामदाना-इस नाम के बीज इसकी एक जाति अँ. कॉडेटस् (A. caudatus Linn.) से प्राप्त होते हैं जो श्वेत या पीले एवं गोल मोटे किनारेदार होते हैं। इसके क्षुप-ऊँचे; पत्ते-लम्बे वृन्त युक्त, दीर्घवृत्ताभ; पुष्प-चमकीले पीत या गहरे रक्त लटकी हुई मंजरी में आते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में आक्जेलिक ॲसिड रहता है। गुण और प्रयोग-रामदाने में पौष्टिक तत्त्व रहते हैं। इसका पंचांग मूत्रल एवं रक्तशोधक है। इसे अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र में देते हैं। गण्डमाला में भी इसे देते हैं तथा बाहर से लेप करते हैं। अथ पलक्या (पालक) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पलक्या वास्तुकाकारा छुरिका चीरितच्छदा। पलक्या वातला शीता श्लेष्मला भेदिनी गुरुः । विष्टम्भिनी मदश्वासपित्तरक्तकफापहा ।।१५।।
८२० भावप्रकाशनिघण्टुः पालक के संस्कृत नाम-पलक्या, वास्तुकाकारा, छुरिका तथा चीरितच्छदा ये सब हैं। पालक-वातजनक, शीतल, कफकारक, मलभेदक, गुरु, विष्टम्भ उत्पन्न करने वाला-एवम् मद (नशा), श्वास, पित्त, रक्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। ९. पालक हिं०-पालक शाक, पला। बं०-पालंग शाक। म०-पालख, पालक। गु०-पालखनी भाजी। क०- पालक्य। ता०-वसैलिक्किर्रै। ते०-मट्टरवच्चलि। अं०-Spsinach (स्पाइर्नक्)। ले०-Spinacia oleracea Linn. (स्पाइनेसिया ओलेरेसिया)। Fam. Chenopodiaceae (चिनोपोडिएसी)। सभी प्रान्तों में इसको लगाया जाता है। इसका क्षुप-करीब १ फूट ऊँचा रहता है। काण्ड-पोला तथा कोणयुक्त रहता है। पत्ते-मोटे, मांसल, हरे, कुछ त्रिकोणाकार एवं लम्बेकृत से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे गुच्छों में आते हैं। पुंजाति के क्षुप में पुष्प काण्ड के अंत में एवं स्त्रीजाति के पुष्प पत्र कोण में आते हैं। इसमें एक प्रकार गोल पत्तों एवं चिकने बीजों वाला होता है। प्रथम में बीज काँटेदार होते हैं। इसके बीज एवं पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें आयोडीन (Iodine), लेसिथिन् (Lecithin), कॅरोटिन् (Carotin), आक्जेलिक ॲसिड (Oxalic acid) एवं आर्सेनिकू (Arsenic) होता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, मूत्रजनन, रोचन, शोथघ्न एवं दाहशामक है। (१) पंचांग का क्वाथ शोथयुक्त ज्वरों में देते हैं। (२) आंत्रविकारों में इसका साग उपयोगी है। (३) अश्मरी में पत्तों का रस का क्वाथ पिलाते हैं। (४) इसके बीज सारक एवं शीतल हैं तथा यकृतशोथ, कामला एवं श्वासकृच्छ्र में दिये जाते हैं। अथ कालशाकम् (नाडीका शाक) । तस्या नामगुणानाह नाडिकं कालशाकं च श्राद्धशाकं च कालकम्। कालशाकं सरं रुच्यं वातकृत्कफशोथहृत्। बल्यं रुचिकरं मेध्यं रक्तपित्तहरं हिमम् ।।१६।। नाडीका शाक के संस्कृत नाम-नाडिक, कालशाक, श्राद्धशाक और कालक ये सब हैं। नाडीका शाक-सारक, रोचक, वातकारक, कफ तथा शोथ नाशक, बलदायक, रुचि को उत्पन्न करने वाला, मेधा के लिये हितकर अथवा पवित्र, शीतल एवम्-रक्तपित्तनाशक है। [१७] १०. कालशाक (नाड़ी का शाक) हिं०-नरिचा, नाड़ी का शाक, तीता पाट। बं०-नालिता शाक, तितपाट, चिनल्तेपात, नची। म०-चोंचे, सण। गु०-छूँछ। ले०-Corchorus capsularis Linn. (कोकोरस कॅपसुलेरिस्)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। यह गरम प्रदेशों में अधिक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-३-४ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, आध से पौन इञ्च चौड़े; प्रासवत् अथवा आयताकार, लम्बाग्र एवं आरावत् दन्तुर होते हैं। फूल-पीले रंग के आते हैं। फल-गोलाकार पाँच भाग वाले तथा पृष्ठ पर दानेदार होते हैं। बीज-ताम्ररंग के होते हैं। इसके कृषित भेद में यह १०।१२ फीट तक ऊँचा होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८२१ रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में कॅप्सूलेरिन् नामक एक क्षारभ पाया गया है। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का फांट ज्वर में देने से मूत्र एवं स्वेद अधिक आता है तथा मुँह का सूखना कम होता है। कुपचन, अतिसार तथा आँव में पत्तों का हिम देते हैं। इसके बीज विरेचन हैं। अथ पट्टशाकः (पटुआ शाक) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पट्टशाकस्तु नाडीको नाडीशाकश्च स स्मृतः । नाडीको रक्तपित्तघ्नो विष्टम्भो वातकोपनः ।।१७।। पटुआ शाक के संस्कृत नाम-पट्टशाक, नाडीक और नाडीशाक ये सब हैं। पटुआशाक-रक्तपित्तनाशक, विष्टम्भजनक एवम् वात को कुपित करने वाला होता है। [१७] ११. पट्टशाक (पटुआ शाक) हिं०-पटुआ, पटवा, पटुए का शाक, कोष्ट । बं०-मीठा पाट, ललिता पाट । म०-मोठे चोंचे । गु०-मोटी छूॅंछ। ले०-Corchorus olitorius Linn. (कोकोरस् ओलिटोरियस्) । Fam. Tiliaceae (टिलिएसी) । वह कई प्रान्तों में आप ही आप जंगली उत्पन्न होता है किन्तु बंगाल में नहीं होता। इसका क्षुप-३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-२ इञ्च चौड़े, चिकने, अंडाकार और पर्णमूल के पास दो पुच्छ सदृश रचनाओं से युक्त होते हैं। फूल-बड़े तथा गहरे पीले रंग के आते हैं। फल-१-२ इञ्च लम्बे होते हैं। बीज-धूसराभ हरित या नीलाभ कृष्ण तथा कालशाक की अपेक्षा छोटे होते हैं। इसके पत्ते तथा कोमल काण्ड लोग खाते हैं। इसका कृषित भेद कालशाक से भी ऊँचा जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में विटामिन 'सी' पाया गया है। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते स्नेहन, दाहशामक, संग्राहक, मूत्रजनन एवं बल्य हैं। इसके पत्तों का फाट बल्य तथा ज्वर शामक मानते हैं। इसके बीज विरेचन होते हैं। अथ कलम्बी (कलमी शाक) । तस्या नामगुणानाह कलम्बी शतपर्वी च कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । कलम्बी स्तन्यदा प्रोक्ता मधुरा शुक्रकारिणी ।।१८।। कलमी शाक का संस्कृत नाम-कलम्बी और शतपर्वी है। कलमी शाक-मधुर रसयुक्त, दुग्धवर्धक तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला होता है। [१८] १२. कलम्बी हिं०-कलंबी शाक, करमी, कलमी का साग, करेमु। बं-कल्मी शाक। ते०-तोमे वच्चलि। म०-नालीची भाजी। गु०-नालोनी भाजी। अं०-Swamp Cabbage (स्वैम्प कॅबेज) । ले०-Ipomoea aquatica Forsk. (आइपोमिया ॲक्वेटिका)। Fam. Convolvulaceae (कन्हॉल्व्हयुलेसी) । यह लता जाति की वनस्पति प्रायः सब प्रान्तों के सजल स्थान में जल के ऊपर तैरती हुई या समीप की भूमि पर फैली हुई दिखाई देती है। पर्व से इसकी जड़ निकलकर कीचड़ में फैलती है। डंडी पोली होती है। पत्ते-३ से ६ इञ्च लम्बे, दीर्घवृत्ताभ या अंडाकार-आयताकार, आधार की तरफ हृदयाकार या दो कोनें निकले हुये (Hastate) एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। फूल-नलिकाकार, १-२ इञ्च लम्बे, निसोत के समान, श्वेत या हलके जामुनी (कंठ में गाढ़े जामुनी) रंग के तथा एकाकी या ५ के समूह में आते हैं। फल-०.८ से० मी० व्यास में, गोलाभ, चिकना तथा २ से ४ घनरमेश बीज युक्त होता है। इसकी नवीन शाखाओं तथा पत्तों का शाक होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८२२ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके पत्तों में पर्याप्त खनिज तथा विटामिन 'ए', 'बी', 'सी' तथा 'ई' पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—इसका स्वरस संखिया तथा अफीम की विषाक्तता में वमन कराने के लिये देते हैं। इसका सुखाया हुआ स्वरस विरेचक होता है। स्त्रियों के शारीरिक एवं तन्त्रिकीय (Nervous) दुस्वास्थ्य में इसका उपयोग किया जाता है। इसको अर्श में भी देते हैं। कलिकाओं को दाद पर लगाते हैं। अथ लोणी बृहल्लोणी च (नोनिया, बड़ा नोनियाकुल्फा)। तयोर्नामगुणानाह लोनालोणी च कथिता बृहल्लोणी तु घोटिका। लोणी रूक्षा स्मृता गुर्वी वातश्लेष्महरी पटुः ।।१९।। अर्शोघ्नी दीपनी चाम्ला मन्दाग्निविषनाशिनी। घोटिकाऽम्ला सराचोष्णा वातकृत्कफपित्तहृत् ।।२०।। वाग्दोषव्रणगुल्मघ्नी श्वासकासप्रमेहनुत्। शोथे लोचनरोगे च हिता तज्ज्ञैरुदाहृता ।।२१।। नोनिया का संस्कृत नाम—लोणा तथा लोणी हैं। बड़ी नोनियाँ का संस्कृत नाम—बृहल्लोणी और घोटिका हैं। नोनिया—लवण तथा अम्लरसयुक्त, रूक्ष, गुरु, अग्निदीपक एवम् वात, कफ, अर्श (बवासीर) अग्नि की मन्दता तथा विष का नाश करने वाली है। बड़ी नोनिया—इसके गुण के जानने वालों द्वारा इसे अम्लरसयुक्त, सारक, उष्ण, वातकारक एवम्-कफ, पित्त, वाणी दोष (बोलने में हकलाना आदि दोष) व्रण, श्वास, खाँसी और प्रमेह को दूर करने वाली तथा शोथ और नेत्ररोग में हितकर बतलायी गयी है। [१९-२१] १३. छोटी लोणा हिं०-छोटीलोणा, नोनीसाग, छोटी नोनिया, जंगलीलोनिया। बं०-क्षुद्रे णुनी, वनणुनी। म०-भुई घोल, लहान घोल। गु०-लुणी। क०-गोलि। ते०-पइल कुर। ता०-कोरिल कीरई। अ०-बुल्क तुलहमका। ले०- Portulaca quadrifida Linn. (पोर्तुलेका क्वाड्रिफीडा)। Fam. Portulacaceae (पोर्तुलेकेसी)। छोटी लोणा एक प्रसिद्ध शाक है जो सब जगह होता है। यह जमीन पर फैला हुआ होता है। शाखा-सूत जैसी पतली तथा सन्धि से मूल निकले हुए रहते हैं। पत्ते-१/५-१/३ इञ्च, विपरीत, अंडाकार या अंडाकार-भालाकार एवं अल्पवृन्त युक्त होते हैं। पुष्प—पीले होते हैं। यह ललाई लिये हरे रंग की एवं स्वाद में खारी और खट्टी होती है। गुण और प्रयोग—इसके ताजे पत्तों का लेप विसर्प में लगाया जाता है। इसका फांट मूत्रकृच्छ्र में एवं बीज कृमिघ्न रूप में प्रयोग में लाये जाते हैं। १४. बड़ी लोणा हिं०-बड़ी लोणा, लोणाशाक, कुल्फा। बं०-बड़णुनी। म०-घोल। गु०-लुणी, म्होटी। फा०-खुल्फा, खुर्फा। अ०-बकुतुल हुनका। अं०-Garden purslane (गार्डन पर्सलेन)। ले०-Portulaca oleracea Linn. (पोर्तुलेका ओलेरेसीया)। Fam. Portulacaceae (पोर्तुलेकेसी)। कुल्फा—यह प्रसिद्ध साग सीधा या जमीन पर फैला हुआ सभी स्थानों पर होता है। पत्ते—स्फानवत्-आयताकार, गोलखण्डिताग्र एवं १/४-१ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प—पीले होते। बीज—दानेदार होते हैं। इसका साग बनाते हैं। इसमें कुछ अम्लता रहती है। रासायनिक संगठन—इसमें पिच्छिल पदार्थ एवं पोटैशियम ऑक्जेलेट पाया जाता है।
गुण और प्रयोग-यह शीतल, शोथहर एवं रक्तशोधक है। इसके बीज स्नेहन, मूत्रजनन एवं कृमिघ्न हैं। वृक्कशोथ, बस्तिशोथ में इसका साग तथा बीज देते हैं। इसका स्वरस सभी प्रकार के रक्तपित्त में तथा ज्वर में लाभदायक है। अर्श में इसका साग देते हैं। इसको ताजा पीसकर विसर्प, मोच, चोट, सूजन एवं हाथ पैर की जलन आदि में दाह एवं शोथ कम करने के लिये बांधते हैं। अथ चांगेरी (तिनपतिया) । तस्या नामानि गुणांश्चाह चाङ्गेरी चुक्रिका दन्तशठाम्बष्ठाऽम्ललोणिका । अश्मन्तकस्तु शफरी कुशली चाम्लपत्रकः ।।२२।। चाङ्गेरी दीपनी रुच्या रूक्षोष्णा कफवातनुत् । पित्तलाऽम्ला ग्रहण्यर्शः कुष्ठातीसारनाशिनी ।।२३।। तिनपतिया के संस्कृत नाम-चाङ्गेरी, चुक्रिका, दन्तशठा, अम्बष्ठा, अम्ललोणिका, अश्मन्तक, शफरी, कुशली और अम्लपत्रक ये सब हैं। चांगेरी-अम्लरसयुक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, रूक्ष, उष्ण, पित्तजनक एवम्-कफ, वात ग्रहणी, अर्श, कुष्ठ तथा अतीसार को दूर करने वाली है। [२२-२३] १५. चाङ्गेरी हिं०-चांगेरी, तिनपतिया, अंबिलोना। पं०-खटकल, खट्टी बूटी। बं०-अमरूल। म०-आंबटी, अंबुटी, भुईसर्पटी। गु०-आम्बोती। क०-सिंबर्गी। ते०-पुलि चिंत। ता०-पुलियोरे। अं०-Indian Sorrel (इण्डियन सॉरिल)। ले०-Oxalis corni culata Linn. (ऑक्झेलिस् कोर्नी क्युलेटा)। Fam. Oxalidaceae (आग्जेलिडेसी)। यह प्रायः सभी गरम प्रान्तों की ऊसर भूमि, खंडहर तथा घरों के आसपास आप ही आप जंगली उत्पन्न होती है। यह प्रसरी वनस्पति जमीन पर फैली हुई रहती है। ग्रंथियों से आगन्तकमूल निकले रहते हैं। पत्ते-त्रिपत्रक एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पत्रक-अभिहृद्वत् होते हैं। उपपत्र-आयताकार एवं वृन्तलग्न रहते हैं। पुष्प-पीले रंग के पुष्प, पत्तों से छोटे दण्ड पर प्रायः दो-दो आते हैं। फली-मृदु रोमश अनेक बीज युक्त एवं पकने पर अपने आप फूटती हैं। इसका स्वाद खट्टा होता है तथा इसका साग बनाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें ॲसिड पोटॅशियम ऑग्जेलेट पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह अम्ल, रोचक, उष्ण, दीपन, ग्राही, अर्शोघ्न एवं वातकफ नाशक है। इससे छोटी धमनियों का संकोचन होकर रक्तस्राव रुकता है। कुपचन में अन्न में अम्लता लाने के लिये इसका उपयोग करते हैं। खूनी आँव तथा गुदभ्रंश में इसे देते हैं। शोथ पर इसको पीसकर बाँधने से पीड़ा एवं दाह कम होकर सूतन उतरती है। धतूरे के विष के निवारण के लिये इसका रस पिलाते हैं। अथ चुक्रिका (चूक) । तस्या नामगुणानाह चुक्रिका स्यात्तु पत्राम्ला रोचनी शतवेधिनी ।।२४।। चुक्रा त्वम्लतरा स्वाद्धी वातघ्नी कफपित्तकृत् । रुच्या लघुतरा पाके वृन्ताकेनातिरोचनी ।।२५।। चूक के संस्कृत नाम-चुक्रिका, 'पत्राम्ला, रोचनी तथा शतवेधिनी ये सब हैं। चूक-अत्यन्त अम्ल रसयुक्त (अत्यन्त खट्टा), स्वादिष्ठ, वातनाशक, कफ तथा पित्त को उत्पन्न करनेवाला, रुचिकारी, विपाक में अत्यन्त लघु तथा बैंगन के साथ खाने में अत्यन्त रुचिकारक है। [२४-२५]
८२४ भावप्रकाशनिघण्टुः १६. चूका हिं०-चूका (शाक) । बं०-चुका, पालंग । म०-चुका, आंबट चुका । गु०-चुको, खारी भाजी । क०- हुलीचकोत । फा०-तुरश्क बड़ा, तुर्रे, खुरासानी, तरह हिरा साई । अ०-हुम्माज बुकलेहा मेजा, बुल्फ येह मिजई । अं०-Bladder Dock (ब्लैडर डॉक्) । ले०-Rumex vesicarius Linn. (रूमेक्स वेसिकेरियस्) । Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी) । यह पश्चिम पंजाब और सिन्ध के आस-पास पहाड़ी जमीन में अधिक होता है और दूसरे प्रान्त में भी कहीं-कहीं पाया जाता है । इसका क्षुप-६ से १२ इञ्च तक ऊँचा, पाण्डुर हरित, कुछ मांसल एवं मूल के पास से ही दो भागों में बँटा रहता है । पत्ते-अंडाकार-लट्त्वाकार या आयताकार, १ से ३ इञ्च लम्बे, आधार स्फानवत् या हृद्वत् या दो कोने निकले हुवे तथा लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत या गुलाबी होते हैं । इसके बीज यूनानी वैद्यक में तुख्म हुम्माज नाम से व्यवहार में आते हैं । इसका साग बनाया जाता है । गुण और प्रयोग-यह दीपन, रुचिकर, सारक, शोथघ्न एवं वेदना स्थापन है । पचन नलिका के विकार में इसका साग देते हैं । आमाशय में दाह, आँव, वमन एवं क्षुधा नाश आदि में इसे देते हैं । इसके बीज शीतल, ग्राही, लेसदार तथा दाह शामक होते हैं । इनका उपयोग पित्त विकार, पित्तातिसार, मूत्र मार्ग में दाह एवं आमाशय शोथ में करते हैं । पत्तों का लेप सूजन पर तथा कीटदंश पर करते हैं । दंतशूल में भी रस लगाते हैं । अथ चञ्चुकी (भाफली) तस्या नामगुणानाह चिञ्चा चञ्चुश्चञ्चुकी च दीर्घपत्रा सतिक्तका । चञ्चुः शीता सरा रुच्या स्वाद्वी दोषत्रयापहा ।। धातुपुष्टिकरी बल्या मेध्या पिच्छिलका स्मृताः ।।२६।। चञ्चुकी के संस्कृत नाम-चिञ्चा, चञ्चु, चञ्चुकी दीर्घपत्रा तथा सतिक्तका ये सब हैं । चंचु-स्वादिष्ट, शीतल, सारक, रुचिकारक, त्रिदोषनाशक, धातु को पुष्ट करनेवाला, बलदायक, मेधा के लिये हितकर तथा पिच्छिल है । [२६] १७. चंचु हिं०-चंचु शाक, चोंच, (बा) माफली । बं०-बिलनलिता । म०-हरणखुरी, मगरमिठी । गु०-उमी बहुफली, छुंछडी । ले०-Corchorus fascicularis Lam. (कोकोर्रस् फॅसीक्यूलेरिस) । Fam. Tiliaceae (टिलिएसी) । यह गरम प्रान्तों में अधिक उत्पन्न होता है । इसका क्षुप-एक ऊंचा, प्रसरणशील एवं वर्षायु होता है । पत्ते- १-२ इञ्च लम्बे, पाव से आध इञ्च तक चौड़े, एकान्तर, आयताकार-भालाकार तथा दन्तुर होते हैं । फूल-पीले रंग के, २ से ५ एक वृन्त पर पत्तों के सामने आते हैं । फलियाँ-मृदुरोमश, करीब ½ इञ्च लम्बी, ३-४ एक साथ एवं प्रत्येक ३-४ कोष्ठ युक्त होती हैं । बीज-अनेक, काले एवं कोनयुक्त होते हैं । इसके पंचांग का उपयोग किया जाता है । गुण और प्रयोग-यह उत्तम स्नेहन एवं बल्य है । इसका क्वाथ सोजाक में देते हैं जिससे पेशाब की मात्रा बढ़कर जलन इत्यादि कम होती है । मात्रा-½ से १ तोला । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८२५ अथ हिलमोचिका (हरकुच) । तस्य नामगुणानाह ब्राह्मी शङ्खधराऽऽचारी मत्स्याक्षी हिलमोचिका । शोथं कुष्ठं कफं पित्तं हरते हिलमोचिका ॥२७॥ हरकुच के संस्कृत नाम-ब्राह्मी, शङ्खधरा, आचारी, मत्स्याक्षी तथा हिलमोचिका ये सब हैं। हरकुच-शोथ, कुष्ठ, कफ तथा पित्त का नाशक है। [२७] १८. हरकुच शाक हिं०-हरकुच । बं०-हिलेंचा शाक, हिंलंचशाक, हिंगचा । ले०-Enhydra fluctuans Lour. (एन्हाइड्रा फ्लक्चुएन्स) । Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । यह आसाम, बिहार और बंगाल में पाया जाता है। यह जल के निकटवर्ती स्थान और दलदल में उत्पन्न होने वाली प्रसरणशील वनस्पति है। इसकी शाखा १-२ फीट लम्बी, मांसल, रोमश, भूमि पर पसरी हुई रहती है और गाँठों से मूल निकल कर भूमि में घुस जाते हैं। पत्ते- विपरीत, अवृन्त, रेखाकार-आयताकार १ से ३ इञ्च लम्बे और दन्तुर होते हैं। फूल (मुण्डक)-पीले, दण्डरहित, व्यास में ३ से ७ इञ्च एवं विषमलिंग होते हैं। इनमें प्रान्तीय पुष्प स्त्रीलिंग, जिह्वाकार एवं कई चक्रों में तथा केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग होते हैं। अधःपत्रावलि के पत्र केवल चार होते हैं। इसके पत्ते कुछ कड़वे होते हैं तथा बंगाल में इसका साग बनाते हैं। रासायनिक संगठन-इसके शुष्क पौधे में उड़नशील तेल, स्टिग्मॅस्टेराल् (Stigmasterol) एवं अत्यल्प कड़वा पदार्थ होता है। गुण और प्रयोग-यह मृदुसारक, पित्तशामक, स्नेहन तथा त्वचा एवं वातिक विकारों में लाभदायक है। (१) त्वचा के रोग तथा वातिक विकारों में इसका स्वरस १ तोले की मात्रा में पिलाते हैं। (२) यकृत् का कार्य ठीक न होता हो तो चावल की माँड़ में इसको उबालकर सेंधव तथा सरसों का तेल डालकर देते हैं। नोट-टीकाकारों ने हिलमोचिका को कहीं-कहीं हुरहुर लिखा है जो वास्तव में इससे भिन्न है। अथ शितिवारः (चौपतिया) । तस्य नामलक्षणगुणानाह शितिवार शितिवारः स्वस्तिकः सुनिषण्णकः । श्रीवारकः सूचिपत्रः पर्णकः कुक्कुटः शिखी ॥२८॥ चाङ्गेरीसदृशः पत्रैश्चतुर्दल इतीरितः । शाको जलान्विते देशे चतुष्पत्रीति चोच्यते ॥२९॥ सुनिषण्णो हिमो ग्राही मेदोदोषत्रयापहः ॥३०॥ अविदाही लघुः स्वादुः कषायो रूक्षदीपनः । वृष्यो रुच्योज्वरश्वासमेहकुष्ठभ्रम प्रणुत् ॥३१॥ चौपतियो के संस्कृत नाम-शितिवार, शितिवर, स्वस्तिक, सुनिषण्णक, श्रीवारक, सूचिपत्र, पर्णक, कुक्कुट और शिखी ये सब हैं। लक्षण-चौपतिया के पत्ते चांगेरी (तिनपतिया) के पत्तों के समान होते हैं और इसके पत्रदण्ड में ४ पत्रक रहते हैं इसी से इसको चतुष्पत्री अर्थात् चौपतिया कहते हैं। यह शाक जलयुक्त देश में उत्पन्न होता है। चौपतिया-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, ग्राही, किंचित् विदाही, लघु, रूक्ष, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक एवं-मेद, त्रिदोष, ज्वर, श्वास, प्रमेह, कुष्ठ तथा भ्रम रोग नाशक है। [२९-३२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८२६ भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-शितिवार तथा सुनिषण्णक वास्तव में दो भिन्न द्रव्य हैं जबकि यहाँ इन्हें पर्यायों में लिखा गया है। यहाँ जिसका स्वरूप वर्णन श्लोक में आया है वह चौपतिया साग है। शितिवार इससे भिन्न है जिसका वर्णन पहले कर्पूरादिवर्ग (पृष्ठ २६४) में केवर्त्तमुस्तक के अन्तर्गत किया जा चुका है। १९. चौपतिया हिं०-चौपतिया, सुनसुनिया साग। बं०-सुवुणी शाक, शुनिशाक, शुशुनी शाक। ले०-Marsilea minuta Linn. (मार्सिलिया माइन्यूटा)। Fam. Rhizocarpeae (राइजो कार्पी)। यह शाकवर्गीय वनस्पति भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों के सजल स्थान में कहीं-न-कहीं पायी जाती है। वर्षा ऋतु में यह अधिक उत्पन्न होती है। इसमें नीचे विसर्पी, पतला एवं सशाख काण्ड होता है। इसके छत्ते-पानी के ऊपर तैरते हुए दिखाई पड़ते हैं। प्रत्येक पत्रदण्ड पर चार-चार पत्ते स्वस्तिक क्रम में निकले रहते हैं, इस कारण इसे चतुष्पत्री या चौपतिया भी कहते हैं। पत्ते और दण्ड आकार में छोटे-बड़े हुआ करते हैं। पत्ते-चांगेरी के पत्तों के समान किन्तु उनसे बड़े होते हैं। बीजाणुकोष एक विशेष प्रकार की अंडाकार परन्तु कुछ-कुछ चिपटी रचना के अन्दर रहते हैं जो फल की तरह मालूम होती है। गुण और प्रयोग-इसका साग निद्राजनक तथा दीपन होता है। निद्रा लाने के लिये तथा अग्निमांद्य में इसका उपयोग करते हैं। अथ मूलकपत्रम् (मुरई का पत्ता) । तस्य गुणानाह पाचनं लघु रुच्योष्णं पत्रं मूलकजं नवम्। स्नेहसिद्धं त्रिदोषघ्नमसिद्धं कफपित्तकृत् ।। ३२ ।। नवीन मुरई के पत्ते का शाक-पाचक, लघु (हल्का), रुचिकारक तथा उष्ण होता है। तेल में भुना हुआ शाक- त्रिदोष-नाशक होता है। बिना भुना हुआ-कफ तथा पित्तकारक होता है। [३२] २०. मूली के पत्ते इसका परिचय कंदशाक वर्ग में दिया जायगा। अथ द्रोणपुष्पी पत्रम् (गूमा का पत्ता) । तस्य गुणानाह द्रोणपुष्पीदलं स्वादु रूक्षं गुरु च पित्तकृत्। भेदनं कामलाशोथमेहज्वरहरं कटु ।। ३३ ।। गूमा के पत्ते का शाक-स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, रूक्ष, गुरु, पित्तकारक, मलभेदक एवं कामला, शोथ, प्रमेह तथा ज्वर को दूर करनेवाला होता है। [३३] २१. गूमा इसका पूर्ण विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ६२५) में दिया गया है। अथ यवानीशाकम् (अजवाइन का शाक) । तस्य गुणानाह यवानीशाकमाग्नेयं रुच्यं वातकफप्रणुत् । उष्णं कटु च तिक्तं च पित्तलं लघु शूलहृत् ।। ३५ ।। अजवाइन के पत्ते का शाक-आग्नेय (अग्नि के गुणों से युक्त), रुचिकारक, उष्ण, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, पित्तजनक, लघु एवम्-वात, कफ तथा शूल को दूर करनेवाला होता है ।। [३४]
शाकवर्गः ८२७ २२. अजवाइन इसका पूर्ण परिचय हरीतक्यादि वर्ग (पृष्ठ २२७) में दिया जा चुका है। अथ दद्रुघ्नपत्रम् (पमार, चकवड़ शाक)। तस्य गुणानाह दद्रुघ्नपत्रं दोषघ्नमम्लं वातकफापहम्। कण्डूकासक्रिमिश्वासदद्रुकुष्ठप्रणुल्लघु ।।३६।। चकवड़ के पत्ते—दोषनाशक, लघु, अम्लरस युक्त, वात, कफ, खुजली, खाँसी, क्रिमि, श्वास, दाद और कुष्ठ को दूर करनेवाले होते हैं। [३५] २३. चकवड़ इसका पूर्ण विवरण हरीतक्यादि वर्ग (पृष्ठ ३१८) में दिया गया है। अथ सेहुण्डः (थूहर)। तत्पत्रस्य गुणानाह सेहुण्डस्य दलं तीक्ष्णं दीपनं रेचनं हरेत्। आध्मानाष्ठीलिकागुल्मशूलशोथोदराणि च ।।३६।। थूहर के पत्ते—तीक्ष्ण, अग्निदीपक, रेचक (दस्तावर) एवम्—आध्मान (अफरा), अष्ठीलिका, गुल्म, शूल, शोथ तथा उदररोग को दूर करने वाले होते हैं। [३६] २४. थूहर इसका पूर्ण परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४८२) में दिया गया है। अथ पर्पटः (पित्तपापड़ा)। तत्पत्रस्य गुणानाह पर्पटो हन्ति पित्तास्रज्वरतृष्णाकफभ्रमान्। संग्राही शीतलस्तिक्तो दाहनुद्वातलो लघुः ।।३७।। पित्तपापड़ा—तिक्त रस युक्त, ग्राही, शीतल, वातजनक, लघु एवम्—पित्त, रक्तविकार, ज्वर, प्यास, कफ, भ्रमरोग तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [३७] २५. पित्तपापड़ा इसका पूर्ण विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४९७) में किया गया है। अथ गोजिह्वा। तस्या गुणानाह गोजिह्वा कुष्ठमेहास्रकृच्छ्रज्वरहरी लघुः ।।३८।। गोजिह्वा के पत्ते—लघु एवम् कुष्ठ, प्रमेह, रक्तविकार, मूत्रकृच्छ्र तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [३८] २६. गोजिह्वा इसका पूर्ण वर्णन गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ६३२) में दिया गया है। अथ पटोलपत्रम्। तस्य गुणानाह पटोलपत्रं पित्तघ्नं दीपनं पाचनं लघु। स्निग्धं वृष्यं तथोष्णं च ज्वरकासक्रिमिप्रणुत् ।।३९।। परवर के पत्ते—पित्तनाशक, अग्निदीपक, पाचक, लघु, स्निग्ध, वीर्यवर्धक, उष्ण, एवम्—ज्वर, खाँसी तथा क्रिमि को नष्ट करने वाले होते हैं। [३९] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८२८ भावप्रकाशनिघण्टुः २७. पटोल-पत्र इसका परिचय आगे शाक वर्ग (पृष्ठ ८३७) में लिखा गया है। अथ गुडूचीपत्रम् (गिलोयशाक) । तस्य गुणानाह गुडूचीपत्रमाग्नेयं सर्वज्वरहरं लघु । कषायं कटु तिक्तं च स्वादुपाकं रसायनम् ।।४०।। बल्यमुष्णं च संग्राहि हन्याद्दोषत्रयं तृषाम् । दाहप्रमेहवातासृक्कामलाकुष्ठपाण्डुताः ।।४१।। गिलोय के पत्ते-आग्नेय (अग्नि के गुणों से युक्त), सर्व प्रकार के ज्वर को दूर करने वाले, लघु, कषाय, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, विपाक में मधुर रस युक्त, रसायन, बलकारक, उष्ण, ग्राही, एवम्-त्रिदोष, तृषा, दाह, प्रमेह, वात, रक्तविकार या वातरक्त, कामला, कुष्ठ तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाले होते हैं । [४०-४०] २८. गिलोय शाक इसका विस्तृत वर्णन गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४४८) में किया गया है। अथ कासमर्दः (कसौंदी शाक) । तस्य नामानि तत्पत्रस्य गुणांश्चाह कासमर्दोऽरिमर्दश्च कासारिः कर्कशस्तथा । कासमर्ददलं रुच्यं वृष्यं कासविषास्रनुत् ।।४२।। मधुरं कफवातघ्नं पाचनं कण्ठशोधनम् । विशेषतः कासहरं पित्तघ्नं ग्राहकं लघु ।।४३।। कसौंदी के संस्कृत नाम-कासमर्द, अरिमर्द, कासारि तथा कर्कश ये सब हैं । कासमर्द के पत्ते-मधुर रसयुक्त, रुचिकारक, वीर्यवर्धक, पाचक, कण्ठ को शुद्ध करने वाले लघु, ग्राही, एवम्-खाँसी, विष, रक्तविकार, कफ तथा वात को नाश करने वाले होते हैं और विशेषतः ये कासनाशक तथा पित्त को दूर करने वाले होते हैं । [४२-४३] २९. कसोंदी हिं०-कसौंदी, कसौंदी । बं०-कालकासुन्दा । म०-कासविंदा । गु०-कासोंदरो । क०-दोग्दुतगचे । ते०- कर्सि । मला०-पीन्ना बीर । ता०-पैदाविरै । अं०-The Negro Coffee (दी निग्रो कॉफी) । ले०-Cassia occidentalls Linn. (कंसोआ ऑक्सीडेण्टॅलिस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । कसौंदी-क्षुप जाति की वनस्पति वर्षा ऋतु में अधिक होती है। इसका क्षुप-३-४ फीट तक ऊँचा तथा कुछ दुर्गन्ध युक्त होता है । कांड-कुछ नालीदार होता है । पत्ते-संयुक्त एवं ६ से १२ इञ्च लम्बे तथा वृन्त के आधार पर एक ग्रन्थि युक्त होते हैं । पत्रक-लट्वाकार, लट्वाकार-आयताकार या लट्वाकार-प्रासवत, १ १/४ से ४ इञ्च लम्बे, मुलायम एवं प्रायः लम्बाग्र होते हैं । पुष्प-पीले रंग के होते हैं । फली-४-५ इञ्च लम्बी तथा चिपटी होती है । इसके पत्र, मूल तथा बीजों का उपयोग किया जाता है। बीजों को भूनकर कॉफी की तरह व्यवहार में लाते हैं। भेद-इसका एक अन्य भेद कँ. सोफेरा (C. sophera) होता है। इसके क्षुप-४ से ७ फीट ऊँचे; पत्रक ६ से १२ जोड़े, प्रायः १ से ३ इञ्च लम्बे, लम्बे प्रासवत्, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र एवं वृन्त आधारीय ग्रंथि एक किन्तु भिन्न आकार की होती है । रासायनिक संगठन-इसके बीजों में टॅनिन् ॲसिड, म्यूसिलेज, तेल, एमोडिन (Emodin), टॉक्सअल्ब्यूमिन (Toxalbumin) एवं क्राइसोरोबिन (Chrysorobin) पाया जाता है । विरेचन द्रव्य इनको भूनने से नष्ट हो जाते हैं । यह विरेचन द्रव्य सनाय जैसे इसके पत्तों में भी होते हैं ।
शाकवर्गः ८२९ गुण और प्रयोग—यह उष्ण, कण्ठशोधन, कफघ्न, स्रंसन, ज्वरहर एवं कुष्ठघ्न है। इसकी जड़ मूत्रजनन है। इसका पंचांग विरेचन है। पत्र एवं बीज ज्वरहर हैं। (१) कफज्वर, कुकास, श्वास आदि में पत्रस्वरस मधु के साथ देते हैं। इससे वमन तथा विरेचन भी होता है। (२) पंचांग के क्वाथ से वायु का अनुलोमन होता है तथा शौच साफ होता है। (३) पत्तों का लेप व्रणशोथ, विसर्प आदि दाहयुक्त चर्म रोगों में किया जाता है। त्वचा के रोगों में मूल तथा पत्तों का क्वाथ एवं लेप उपयोगी है। (४) उदर तथा जलशोथ में मूल का उपयोग करते हैं। मात्रा—स्वरस १/२ से १ तोला; पंचांग ३ से ६ माशा; फल ३ से ६ माशा। कासमर्द भेद—इसमें इमोडिन तथा क्राइसोफेनिक ॲसिड पाया जाता है। इसके भी गुण कासमर्द के समान हैं। इसके पत्तों का बाह्य प्रयोग दाद में करते हैं। पंचांग का क्वाथ खाँसी में दिया जाता है। अथ चणकशाकम् (चने का शाक) । तस्य गुणानाह रुच्यं चणकशाकं स्याद् दुर्जरं कफवातकृत्। अम्लं विष्टम्भजनकं पित्तनुद्दन्तशोथहृत् ।।४४।। चने का शाक—रुचिकारक, देर में हजम होने वाला, कफ तथा वातकारक, अम्लरस युक्त, विष्टम्भ पैदा करने वाला एवम्–पित्त तथा दाँतों के शोथ को दूर करने वाला होता है। [४४] ३०. चना चने का वर्णन शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०२) में किया गया है। अथ कलायशाकम् (मटर का शाक) । तस्य गुणानाह कलायशाकं भेदि स्याल्लघु तिक्तं त्रिदोषजित् ।।४७।। मटर का शाक—मल का भेदन करने वाला, लघु, तिक्तरस युक्त, एवम् त्रिदोष-नाशक होता है। [४५] ३१. मटर इसका परिचय शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०२) में दिया गया है। अथ सार्षपं शाकम् (सरसों का शाक) । तस्य गुणानाह कटुकं सार्षपं शाकं बहुमूत्रमलं गुरु। अम्लपाकं विदाहि स्यादुष्णं रूक्षं त्रिदोषकृत्। सक्षारलवणं तीक्ष्णं स्वादु शाकेषु निन्दितम् ।।४६।। सरसों का शाक—कटुरस युक्त, बहुत मूत्र तथा मल को करने वाला, गुरु, विपाक में अम्लरस युक्त, विदाही, उष्ण, रूक्ष, त्रिदोष कारक, क्षार युक्त लवण रस वाला, तीक्ष्ण और स्वादिष्ट होता है। एवम् यह शाकों में निन्दनीय होता है। [४६] ३२. सरसों इसका वर्णन शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०७) में किया गया है। ।। इति पत्रशाकानि ।।