भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८२५ अथ हिलमोचिका (हरकुच) । तस्य नामगुणानाह ब्राह्मी शङ्खधराऽऽचारी मत्स्याक्षी हिलमोचिका । शोथं कुष्ठं कफं पित्तं हरते हिलमोचिका ॥२७॥ हरकुच के संस्कृत नाम-ब्राह्मी, शङ्खधरा, आचारी, मत्स्याक्षी तथा हिलमोचिका ये सब हैं। हरकुच-शोथ, कुष्ठ, कफ तथा पित्त का नाशक है। [२७] १८. हरकुच शाक हिं०-हरकुच । बं०-हिलेंचा शाक, हिंलंचशाक, हिंगचा । ले०-Enhydra fluctuans Lour. (एन्हाइड्रा फ्लक्चुएन्स) । Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । यह आसाम, बिहार और बंगाल में पाया जाता है। यह जल के निकटवर्ती स्थान और दलदल में उत्पन्न होने वाली प्रसरणशील वनस्पति है। इसकी शाखा १-२ फीट लम्बी, मांसल, रोमश, भूमि पर पसरी हुई रहती है और गाँठों से मूल निकल कर भूमि में घुस जाते हैं। पत्ते- विपरीत, अवृन्त, रेखाकार-आयताकार १ से ३ इञ्च लम्बे और दन्तुर होते हैं। फूल (मुण्डक)-पीले, दण्डरहित, व्यास में ३ से ७ इञ्च एवं विषमलिंग होते हैं। इनमें प्रान्तीय पुष्प स्त्रीलिंग, जिह्वाकार एवं कई चक्रों में तथा केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग होते हैं। अधःपत्रावलि के पत्र केवल चार होते हैं। इसके पत्ते कुछ कड़वे होते हैं तथा बंगाल में इसका साग बनाते हैं। रासायनिक संगठन-इसके शुष्क पौधे में उड़नशील तेल, स्टिग्मॅस्टेराल् (Stigmasterol) एवं अत्यल्प कड़वा पदार्थ होता है। गुण और प्रयोग-यह मृदुसारक, पित्तशामक, स्नेहन तथा त्वचा एवं वातिक विकारों में लाभदायक है। (१) त्वचा के रोग तथा वातिक विकारों में इसका स्वरस १ तोले की मात्रा में पिलाते हैं। (२) यकृत् का कार्य ठीक न होता हो तो चावल की माँड़ में इसको उबालकर सेंधव तथा सरसों का तेल डालकर देते हैं। नोट-टीकाकारों ने हिलमोचिका को कहीं-कहीं हुरहुर लिखा है जो वास्तव में इससे भिन्न है। अथ शितिवारः (चौपतिया) । तस्य नामलक्षणगुणानाह शितिवार शितिवारः स्वस्तिकः सुनिषण्णकः । श्रीवारकः सूचिपत्रः पर्णकः कुक्कुटः शिखी ॥२८॥ चाङ्गेरीसदृशः पत्रैश्चतुर्दल इतीरितः । शाको जलान्विते देशे चतुष्पत्रीति चोच्यते ॥२९॥ सुनिषण्णो हिमो ग्राही मेदोदोषत्रयापहः ॥३०॥ अविदाही लघुः स्वादुः कषायो रूक्षदीपनः । वृष्यो रुच्योज्वरश्वासमेहकुष्ठभ्रम प्रणुत् ॥३१॥ चौपतियो के संस्कृत नाम-शितिवार, शितिवर, स्वस्तिक, सुनिषण्णक, श्रीवारक, सूचिपत्र, पर्णक, कुक्कुट और शिखी ये सब हैं। लक्षण-चौपतिया के पत्ते चांगेरी (तिनपतिया) के पत्तों के समान होते हैं और इसके पत्रदण्ड में ४ पत्रक रहते हैं इसी से इसको चतुष्पत्री अर्थात् चौपतिया कहते हैं। यह शाक जलयुक्त देश में उत्पन्न होता है। चौपतिया-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, ग्राही, किंचित् विदाही, लघु, रूक्ष, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक एवं-मेद, त्रिदोष, ज्वर, श्वास, प्रमेह, कुष्ठ तथा भ्रम रोग नाशक है। [२९-३२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA