भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२६ भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-शितिवार तथा सुनिषण्णक वास्तव में दो भिन्न द्रव्य हैं जबकि यहाँ इन्हें पर्यायों में लिखा गया है। यहाँ जिसका स्वरूप वर्णन श्लोक में आया है वह चौपतिया साग है। शितिवार इससे भिन्न है जिसका वर्णन पहले कर्पूरादिवर्ग (पृष्ठ २६४) में केवर्त्तमुस्तक के अन्तर्गत किया जा चुका है। १९. चौपतिया हिं०-चौपतिया, सुनसुनिया साग। बं०-सुवुणी शाक, शुनिशाक, शुशुनी शाक। ले०-Marsilea minuta Linn. (मार्सिलिया माइन्यूटा)। Fam. Rhizocarpeae (राइजो कार्पी)। यह शाकवर्गीय वनस्पति भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों के सजल स्थान में कहीं-न-कहीं पायी जाती है। वर्षा ऋतु में यह अधिक उत्पन्न होती है। इसमें नीचे विसर्पी, पतला एवं सशाख काण्ड होता है। इसके छत्ते-पानी के ऊपर तैरते हुए दिखाई पड़ते हैं। प्रत्येक पत्रदण्ड पर चार-चार पत्ते स्वस्तिक क्रम में निकले रहते हैं, इस कारण इसे चतुष्पत्री या चौपतिया भी कहते हैं। पत्ते और दण्ड आकार में छोटे-बड़े हुआ करते हैं। पत्ते-चांगेरी के पत्तों के समान किन्तु उनसे बड़े होते हैं। बीजाणुकोष एक विशेष प्रकार की अंडाकार परन्तु कुछ-कुछ चिपटी रचना के अन्दर रहते हैं जो फल की तरह मालूम होती है। गुण और प्रयोग-इसका साग निद्राजनक तथा दीपन होता है। निद्रा लाने के लिये तथा अग्निमांद्य में इसका उपयोग करते हैं। अथ मूलकपत्रम् (मुरई का पत्ता) । तस्य गुणानाह पाचनं लघु रुच्योष्णं पत्रं मूलकजं नवम्। स्नेहसिद्धं त्रिदोषघ्नमसिद्धं कफपित्तकृत् ।। ३२ ।। नवीन मुरई के पत्ते का शाक-पाचक, लघु (हल्का), रुचिकारक तथा उष्ण होता है। तेल में भुना हुआ शाक- त्रिदोष-नाशक होता है। बिना भुना हुआ-कफ तथा पित्तकारक होता है। [३२] २०. मूली के पत्ते इसका परिचय कंदशाक वर्ग में दिया जायगा। अथ द्रोणपुष्पी पत्रम् (गूमा का पत्ता) । तस्य गुणानाह द्रोणपुष्पीदलं स्वादु रूक्षं गुरु च पित्तकृत्। भेदनं कामलाशोथमेहज्वरहरं कटु ।। ३३ ।। गूमा के पत्ते का शाक-स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, रूक्ष, गुरु, पित्तकारक, मलभेदक एवं कामला, शोथ, प्रमेह तथा ज्वर को दूर करनेवाला होता है। [३३] २१. गूमा इसका पूर्ण विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ६२५) में दिया गया है। अथ यवानीशाकम् (अजवाइन का शाक) । तस्य गुणानाह यवानीशाकमाग्नेयं रुच्यं वातकफप्रणुत् । उष्णं कटु च तिक्तं च पित्तलं लघु शूलहृत् ।। ३५ ।। अजवाइन के पत्ते का शाक-आग्नेय (अग्नि के गुणों से युक्त), रुचिकारक, उष्ण, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, पित्तजनक, लघु एवम्-वात, कफ तथा शूल को दूर करनेवाला होता है ।। [३४]