भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८२७ २२. अजवाइन इसका पूर्ण परिचय हरीतक्यादि वर्ग (पृष्ठ २२७) में दिया जा चुका है। अथ दद्रुघ्नपत्रम् (पमार, चकवड़ शाक)। तस्य गुणानाह दद्रुघ्नपत्रं दोषघ्नमम्लं वातकफापहम्। कण्डूकासक्रिमिश्वासदद्रुकुष्ठप्रणुल्लघु ।।३६।। चकवड़ के पत्ते—दोषनाशक, लघु, अम्लरस युक्त, वात, कफ, खुजली, खाँसी, क्रिमि, श्वास, दाद और कुष्ठ को दूर करनेवाले होते हैं। [३५] २३. चकवड़ इसका पूर्ण विवरण हरीतक्यादि वर्ग (पृष्ठ ३१८) में दिया गया है। अथ सेहुण्डः (थूहर)। तत्पत्रस्य गुणानाह सेहुण्डस्य दलं तीक्ष्णं दीपनं रेचनं हरेत्। आध्मानाष्ठीलिकागुल्मशूलशोथोदराणि च ।।३६।। थूहर के पत्ते—तीक्ष्ण, अग्निदीपक, रेचक (दस्तावर) एवम्—आध्मान (अफरा), अष्ठीलिका, गुल्म, शूल, शोथ तथा उदररोग को दूर करने वाले होते हैं। [३६] २४. थूहर इसका पूर्ण परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४८२) में दिया गया है। अथ पर्पटः (पित्तपापड़ा)। तत्पत्रस्य गुणानाह पर्पटो हन्ति पित्तास्रज्वरतृष्णाकफभ्रमान्। संग्राही शीतलस्तिक्तो दाहनुद्वातलो लघुः ।।३७।। पित्तपापड़ा—तिक्त रस युक्त, ग्राही, शीतल, वातजनक, लघु एवम्—पित्त, रक्तविकार, ज्वर, प्यास, कफ, भ्रमरोग तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [३७] २५. पित्तपापड़ा इसका पूर्ण विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४९७) में किया गया है। अथ गोजिह्वा। तस्या गुणानाह गोजिह्वा कुष्ठमेहास्रकृच्छ्रज्वरहरी लघुः ।।३८।। गोजिह्वा के पत्ते—लघु एवम् कुष्ठ, प्रमेह, रक्तविकार, मूत्रकृच्छ्र तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [३८] २६. गोजिह्वा इसका पूर्ण वर्णन गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ६३२) में दिया गया है। अथ पटोलपत्रम्। तस्य गुणानाह पटोलपत्रं पित्तघ्नं दीपनं पाचनं लघु। स्निग्धं वृष्यं तथोष्णं च ज्वरकासक्रिमिप्रणुत् ।।३९।। परवर के पत्ते—पित्तनाशक, अग्निदीपक, पाचक, लघु, स्निग्ध, वीर्यवर्धक, उष्ण, एवम्—ज्वर, खाँसी तथा क्रिमि को नष्ट करने वाले होते हैं। [३९] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA