भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८२८ भावप्रकाशनिघण्टुः २७. पटोल-पत्र इसका परिचय आगे शाक वर्ग (पृष्ठ ८३७) में लिखा गया है। अथ गुडूचीपत्रम् (गिलोयशाक) । तस्य गुणानाह गुडूचीपत्रमाग्नेयं सर्वज्वरहरं लघु । कषायं कटु तिक्तं च स्वादुपाकं रसायनम् ।।४०।। बल्यमुष्णं च संग्राहि हन्याद्दोषत्रयं तृषाम् । दाहप्रमेहवातासृक्कामलाकुष्ठपाण्डुताः ।।४१।। गिलोय के पत्ते-आग्नेय (अग्नि के गुणों से युक्त), सर्व प्रकार के ज्वर को दूर करने वाले, लघु, कषाय, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, विपाक में मधुर रस युक्त, रसायन, बलकारक, उष्ण, ग्राही, एवम्-त्रिदोष, तृषा, दाह, प्रमेह, वात, रक्तविकार या वातरक्त, कामला, कुष्ठ तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाले होते हैं । [४०-४०] २८. गिलोय शाक इसका विस्तृत वर्णन गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४४८) में किया गया है। अथ कासमर्दः (कसौंदी शाक) । तस्य नामानि तत्पत्रस्य गुणांश्चाह कासमर्दोऽरिमर्दश्च कासारिः कर्कशस्तथा । कासमर्ददलं रुच्यं वृष्यं कासविषास्रनुत् ।।४२।। मधुरं कफवातघ्नं पाचनं कण्ठशोधनम् । विशेषतः कासहरं पित्तघ्नं ग्राहकं लघु ।।४३।। कसौंदी के संस्कृत नाम-कासमर्द, अरिमर्द, कासारि तथा कर्कश ये सब हैं । कासमर्द के पत्ते-मधुर रसयुक्त, रुचिकारक, वीर्यवर्धक, पाचक, कण्ठ को शुद्ध करने वाले लघु, ग्राही, एवम्-खाँसी, विष, रक्तविकार, कफ तथा वात को नाश करने वाले होते हैं और विशेषतः ये कासनाशक तथा पित्त को दूर करने वाले होते हैं । [४२-४३] २९. कसोंदी हिं०-कसौंदी, कसौंदी । बं०-कालकासुन्दा । म०-कासविंदा । गु०-कासोंदरो । क०-दोग्दुतगचे । ते०- कर्सि । मला०-पीन्ना बीर । ता०-पैदाविरै । अं०-The Negro Coffee (दी निग्रो कॉफी) । ले०-Cassia occidentalls Linn. (कंसोआ ऑक्सीडेण्टॅलिस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । कसौंदी-क्षुप जाति की वनस्पति वर्षा ऋतु में अधिक होती है। इसका क्षुप-३-४ फीट तक ऊँचा तथा कुछ दुर्गन्ध युक्त होता है । कांड-कुछ नालीदार होता है । पत्ते-संयुक्त एवं ६ से १२ इञ्च लम्बे तथा वृन्त के आधार पर एक ग्रन्थि युक्त होते हैं । पत्रक-लट्वाकार, लट्वाकार-आयताकार या लट्वाकार-प्रासवत, १ १/४ से ४ इञ्च लम्बे, मुलायम एवं प्रायः लम्बाग्र होते हैं । पुष्प-पीले रंग के होते हैं । फली-४-५ इञ्च लम्बी तथा चिपटी होती है । इसके पत्र, मूल तथा बीजों का उपयोग किया जाता है। बीजों को भूनकर कॉफी की तरह व्यवहार में लाते हैं। भेद-इसका एक अन्य भेद कँ. सोफेरा (C. sophera) होता है। इसके क्षुप-४ से ७ फीट ऊँचे; पत्रक ६ से १२ जोड़े, प्रायः १ से ३ इञ्च लम्बे, लम्बे प्रासवत्, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र एवं वृन्त आधारीय ग्रंथि एक किन्तु भिन्न आकार की होती है । रासायनिक संगठन-इसके बीजों में टॅनिन् ॲसिड, म्यूसिलेज, तेल, एमोडिन (Emodin), टॉक्सअल्ब्यूमिन (Toxalbumin) एवं क्राइसोरोबिन (Chrysorobin) पाया जाता है । विरेचन द्रव्य इनको भूनने से नष्ट हो जाते हैं । यह विरेचन द्रव्य सनाय जैसे इसके पत्तों में भी होते हैं ।