भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 880, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८२९ गुण और प्रयोग—यह उष्ण, कण्ठशोधन, कफघ्न, स्रंसन, ज्वरहर एवं कुष्ठघ्न है। इसकी जड़ मूत्रजनन है। इसका पंचांग विरेचन है। पत्र एवं बीज ज्वरहर हैं। (१) कफज्वर, कुकास, श्वास आदि में पत्रस्वरस मधु के साथ देते हैं। इससे वमन तथा विरेचन भी होता है। (२) पंचांग के क्वाथ से वायु का अनुलोमन होता है तथा शौच साफ होता है। (३) पत्तों का लेप व्रणशोथ, विसर्प आदि दाहयुक्त चर्म रोगों में किया जाता है। त्वचा के रोगों में मूल तथा पत्तों का क्वाथ एवं लेप उपयोगी है। (४) उदर तथा जलशोथ में मूल का उपयोग करते हैं। मात्रा—स्वरस १/२ से १ तोला; पंचांग ३ से ६ माशा; फल ३ से ६ माशा। कासमर्द भेद—इसमें इमोडिन तथा क्राइसोफेनिक ॲसिड पाया जाता है। इसके भी गुण कासमर्द के समान हैं। इसके पत्तों का बाह्य प्रयोग दाद में करते हैं। पंचांग का क्वाथ खाँसी में दिया जाता है। अथ चणकशाकम् (चने का शाक) । तस्य गुणानाह रुच्यं चणकशाकं स्याद् दुर्जरं कफवातकृत्। अम्लं विष्टम्भजनकं पित्तनुद्दन्तशोथहृत् ।।४४।। चने का शाक—रुचिकारक, देर में हजम होने वाला, कफ तथा वातकारक, अम्लरस युक्त, विष्टम्भ पैदा करने वाला एवम्–पित्त तथा दाँतों के शोथ को दूर करने वाला होता है। [४४] ३०. चना चने का वर्णन शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०२) में किया गया है। अथ कलायशाकम् (मटर का शाक) । तस्य गुणानाह कलायशाकं भेदि स्याल्लघु तिक्तं त्रिदोषजित् ।।४७।। मटर का शाक—मल का भेदन करने वाला, लघु, तिक्तरस युक्त, एवम् त्रिदोष-नाशक होता है। [४५] ३१. मटर इसका परिचय शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०२) में दिया गया है। अथ सार्षपं शाकम् (सरसों का शाक) । तस्य गुणानाह कटुकं सार्षपं शाकं बहुमूत्रमलं गुरु। अम्लपाकं विदाहि स्यादुष्णं रूक्षं त्रिदोषकृत्। सक्षारलवणं तीक्ष्णं स्वादु शाकेषु निन्दितम् ।।४६।। सरसों का शाक—कटुरस युक्त, बहुत मूत्र तथा मल को करने वाला, गुरु, विपाक में अम्लरस युक्त, विदाही, उष्ण, रूक्ष, त्रिदोष कारक, क्षार युक्त लवण रस वाला, तीक्ष्ण और स्वादिष्ट होता है। एवम् यह शाकों में निन्दनीय होता है। [४६] ३२. सरसों इसका वर्णन शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०७) में किया गया है। ।। इति पत्रशाकानि ।।