भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८३० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ पुष्पशाकानि। तत्रागस्तिपुष्पस्य गुणानाह अगस्तिकुसुमं शीतं चातुर्थिकनिवारणम्। नक्तान्ध्यनाशनं तिक्तं कषायं कटुपाकि च। पीनसश्लेष्मपित्तघ्नं वातघ्नं मुनिभिर्मतम् ।।४७।। अगस्त का पुष्प—तिक्त तथा कषायरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, शीतल एवम् चौथिया ज्वर, नक्तान्ध्य (रतौंधी), पीनस, कफ, पित्त तथा वात को नष्ट करने वाला होता है ऐसा मुनि लोग मानते हैं। [४७] ३३. अगस्त इसका विवरण पुष्पवर्ग (पृष्ठ ६६७) में दिया गया है। अथ कदलीपुष्पम् (केले का फूल)। तस्य गुणानाह कदल्यः कुसुमं स्निग्धं मधुरं तुवरं गुरु। वातपित्तहरं शीतं रक्तपित्तक्षयप्रणुत् ।।४८।। केले का फूल—मधुर तथा कषायरस युक्त, स्निग्ध, गुरु, शीतल एवम्—वात-पित्त, रक्तपित्त तथा क्षय को दूर करने वाला होता है। [४८] ३४. केला इसका परिचय फलवर्ग (पृष्ठ ७१४) में दिया गया है। अथ शिग्रोः मधुशिग्रोः च पुष्पं (सहजना एवं उसके भेद एवं फूल)। तयोर्गुणानाह शिग्रोः पुष्पं तु कटुकं तीक्ष्णोष्णं स्नायुशोथनुत्। कृमिहृत्कफवातघ्नं विद्रधिप्लीहगुल्मजित्। मधु शिग्रोस्त्वक्षिहितं रक्तपित्तप्रसादनम् ।।४९।। सहजन का फूल—कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, स्नायुगत शोथ को दूर करने वाला एवम् कृमि, कफ, वात, विद्रधि, प्लीहा तथा गुल्म को नष्ट करने वाला होता है। मधुशिग्रु (सहजन भेद) का फूल—नेत्रों के लिये हितकर तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [५०] ३५. सहजना इसका विवरण गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ५१२) में किया गया है। अथ शाल्मलीपुष्पम् (सेमल के फूल)। तस्य गुणानाह शाल्मलीपुष्पशाकं तु घृतसैन्धवसाधितम्। प्रदरं नाशयेत्येव दुःसाध्यं च न संशयः ।।५०।। रसे पाके च मधुरं कषायं शीतलं गुरु। कफपित्तास्रजिद् ग्राहि वातलं च प्रकीर्त्तितम् ।।५१।। सेमल के फूल का शाक—यदि यह घी तथा सेन्धा निमक डाल कर बनाया जाय तो सेवन करने से दुःसाध्य प्रदर को दूर करता है इसमें कोई संशय नहीं है। और यह कषाय तथा मधुररस युक्त, विपाक में मधुररस युक्त, शीतल, गुरु, ग्राही, वातजनक एवम् कफ, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [५०-५१] ३६. सेमर इसका विवरण वटादिवर्ग (पृष्ठ ६९५) में दिया गया है। ।। इति पुष्पशाकानि ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

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