भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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शाकवर्गः ८३१ अथ फलशाकानि । तत्रकूष्माण्डम् (पेठा) । तस्य नामानि तद्बाल-मध्यम-वृद्धफलानां च गुणानाह कूष्माण्डं स्यात्पुष्पफलं पीतपुष्पं बृहत्फलम् ।।५२।। कूष्माण्डं बृंहणं वृष्यं गुरु पित्तास्रवातनुत् । बालं पित्तापहं शीतं मध्यमं कफकारकम् ।।५३।। वृद्धंनातिहिमं स्वादु सक्षारं दीपनं लघु । बस्तिशुद्धिकरं चेतोरोगहृत्सर्वदोषजित् ।।५४।। पेठा के नाम—कूष्माण्ड, पुष्पफल, पीतपुष्प तथा बृहत्फल ये सब हैं। पेठा—बृंहण (बलवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), गुरु एवम् पित्त, रक्तविकार तथा वात को नष्ट करने वाला होता है। कच्चा पेठा—शीतल तथा पित्तनाशक होता है। मध्यम अवस्था का पेठा—कफकारक होता है। पका पेठा—स्वादिष्ट, क्षारयुक्त, किंचित् शीतल, अग्निदीपक, लघु, बस्ति (मूत्राशय) का शोधन करने वाला, मानसिक रोग (उन्माद आदि) तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाला होता है। [५२-५४] ३७. पेठा हिं०—पेठा, भूरा कुम्हड़ा, भतुआ, रकसा कोंहड़ा । बं०—कुमड़ा । म०—कोहला । गु०—भुरुं कोह्लुं । क०— दार कोहोला । ता०—पुशानीकै । ते०—गुम्मडि । फा०—पजदाब, पदुव । अ०—महदवः । अं०—The Ash Gourd (दी अॅश गोर्ड) । ले०—Benincasa cerifera Savi (बेनिनर्कैसा सेरीफेरा) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । पेठा—प्रायः सब प्रान्तों में रोपण किया जाता है। इसकी लता—मचान आदि के सहारे खूब फैलती है। पत्ते— कद्दू के समान ४-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार, कटे किनारे वाले या ५ भाग वाले होते हैं। फूल—पीले रंग के आते हैं। फल—गोलाई युक्त, किञ्चित् लम्बे तथा लम्बाई में १ से १.५ फीट होते हैं। इसकी गूदी सफेद रहती है। बीज— अनेक, चिपटे एवं किनारेदार होते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में आर्द्रता ९६, प्रोटीन ०.४, स्नेह ०.१, कार्बोहाइड्रेट ३.२, खनिज ०.३ भाग तथा विटामिन बी₁ २१ अ. एकक प्रति १०० ग्राम में रहता है। गुण और प्रयोग—इसका फल मूत्रजनन, सौम्य विरेचक, बल्य, पौष्टिक, पित्तशामक, रक्तपित्त प्रशमन एवं रक्त संग्राहक है। इसका उपयोग रक्तपित्त, रक्तष्ठीवन, आन्तरिक रक्तस्राव, पागलपन, अपस्मार, मूत्रकृच्छ्र, तृष्णा एवं प्रमेह में किया जाता है। इससे रक्ताभिसरण की तेजी कम होती है। अधिक मात्रा में शौच साफ होकर नींद आती है। (१) उन्माद में इसका रस पिलाते हैं जिससे शौच साफ होकर नींद आती है। (२) राजयक्ष्मा में रक्तष्ठीवन होने पर इसका रस देते हैं। (३) अर्श में कूष्माण्डपाक देते हैं। (४) इसके बीज तथा बीजों का तेल चिपटे कृमियों के उपसर्ग में लाभदायक है। मात्रा—स्वरस २ से ४ औंस; बीजचूर्ण ३ से ६ माशा। अथ कूष्माण्डी (कुम्हडी) । तस्यानामगुणानाह कूष्माण्डी तु भृशं लघ्वी कर्कारुरपि कीर्त्तिता । कर्कारुर्ग्राहिणी शीता रक्तपित्तहरा गुरुः । पक्वा तिक्ताऽग्निजननी सक्षारा कफवातनुत् ।।५६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA