भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३२ भावप्रकाशनिघण्टुः कुम्हड़ी का संस्कृत नाम-अत्यन्त लघु पेठे को "कुष्माण्डी" कहते हैं, इसकी का नाम "कर्कारु" भी है। कुम्हड़ी-ग्राही, शीतल, रक्तपित्त नाशक तथा गुरु होती है। पकी कुम्हड़ी-तिक्तरस युक्त, अग्निवर्धक, क्षार युक्त एवम्-कफ तथा वात को दूर करने वाली होती है। [५५] ३८. कुष्माण्डी (कोहला) हिं०-कुम्हड़ा, सफेद कद्दू। बं०-सादा कुम्हड़ा। म०-कौला। ता०-सुरईकई। अं०-Vegetable Marrow (वेजिटेबुल मॅरो); Field Pumpkin (फील्ड पम्पकिन)। ले०-Cucurbita pepo Linn. (कुकुरविटा पेपो)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। यह सभी प्रान्तों में कृषित अवस्था में होता है। इसकी लता-वर्षायु, दृढ़ एवं खुरदरी से रोमश होती है। पत्ते- गोलाकार, अल्प खण्डित एवं वृन्त तीक्ष्ण रोमश होते हैं। पुष्प-पीले रंग के आते हैं। फल-कई प्रकार के किन्तु सामान्यतः नाशपाती के आकार वाले या कुछ आयताकार होते हैं। इसका डण्ठल कड़ा, अनेक गहरी धारियों से युक्त एवं फल के आधारीय भाग में फूला हुआ नहीं रहता। इसके अनेक प्रकार होते हैं। गुद्दी हलके रंग की एवं गंधहीन होती है। बीजों को तथा उसके तेल को खाने के काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें आर्द्रता ९५, प्रोटीन ०.५, स्नेह ०.१, कार्बोहाइड्रेट ४ एवं खनिजों में लोह तथा अत्यल्प खटिक, आर्सेनिक और विटामिन 'सी' १०० ग्राम में १८ मि० ग्रा० रहता है। बीजमज्जा में प्रोटीन, तैल (३८%), रालीय द्रव्य एवं सॅलिसिलिक् ॲसिड आदि द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके ताजे बीज, चिपटे कृमियों में लाभदायक हैं। ३० से ग्राम बीजों को कूटकर दूध एवं मधु मिलाकर खालीपेट पिलाते हैं। बाद में विरेचन देते हैं। इसके पत्तों का लेप जलने पर करते हैं। नोट-कुम्हड़े के निम्नलिखित अन्य भेद भी पाये जाते हैं- (क) हिं०-लाल कुम्हड़ा, सीताफल। अं०-Red Gourd (रेड गोर्ड); Squash (स्कैश)। ले०-C. maxima Duchesne (कु. मॅक्सिमा)। इसमें भी फल विभिन्न नाप के होते हैं एवं डंठल न तो धारीदार रहता है न फल से लगा भाग बढ़ा हुआ रहता है। इसका गूदा पकने पर पीताभ या रक्ताभ रहता है। इसके बीज श्वेत या भूरे तथा उनके किनारे भी उसी तरह होते हैं। इसके पत्र, पुष्प, फल एवं बीज का उपयोग खाद्य रूप में किया जाता है। बीज कृमिघ्न, मूत्रल तथा बल्य होते हैं। (ख) ले०-C. moschata Duchesne ex Poir. (कु. मास्केटा)। इसमें के फल का डंठल धारीदार एवं फल से लगा भाग बढ़ा हुआ रहता है। इसमें बीज धूसराभ श्वेत या पीताभ किन्तु किनारे गहरे रंग के होते हैं। इसके अन्य भाषा नाम एवं इसका व्यवहार (क) की तरह ही होता है। अथ अलाबूर्दीर्घा-वर्तुला च तस्या नामानि भेदांस्तत्फलगुणाँश्चाह अलाबूः कथिता तुम्बी द्विधा दीर्घा च वर्तुला ।।५६।। मिष्टतुम्बीफलं हृद्यं पित्तश्लेष्मापहं गुरु । वृष्यं रुचिकरं प्रोक्तं धातु पुष्टिविवर्धनम् ।।५७।। लौकी के संस्कृत नाम-अलाबु तथा तुम्बी है। भेद-लम्बी तथा गोल भेद से लौकी दो प्रकार की होती है अर्थात्-१ दीर्घा अलाबु, २ वर्तुला अलाबु। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA