भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 884, कुल 1167 में से

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शाकवर्गः ८३३ मीठी लौकी का फल—गुरु, रुचिकारक, वीर्यवर्धक, हृदय के लिये हितकर, पित्त तथा कफ नाशक एवम् धातु की पुष्टि को विशेष रूप से करने वाला होता है। [५६-५७] ३९. अलाबू (लौकी) हिं०—तुम्बी, लौआ, लौकी, कद्दू, कदुआ, मीठी तोम्बी, लम्बा कद्दू । बं०—लाउ। म०—दुध्या भोंपला। गु०—दुधियुं, तुंबड़ी। क०—उवलकाई। ते०—अलबुवु, आनपकाया। फा०—शीरिन् । अ०—युक्तिनेहुलुकुर । अं०— White Gourd (ह्वाइट गोर्ड) । ले०—Lagenaria vulgaris Ser (लॅगेनेरिया वर्ल्गेरिस्) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में रोपण की जाती है। खेत, बाग, मचान, छप्पर आदि पर फैली हुई इसकी बेल देखने में आती है। इसके पत्ते—मृदुरोमश, ६-७ इञ्च के घेरे में गोलाकार, पञ्च कोणाकार या पाँच खण्डवाले होते हैं। फूल— सफेद रंग के आते हैं। फल—१-२ हाथ लम्बा गोल या गोल अथवा चिपटा गोल विभिन्न आकार का होता है। कृषिजन्य इसके अनेक प्रकार होते हैं। कृषिजन्य की गुद्दी मीठी होती है तथा वन्य की कड़वी होती है। गुण और प्रयोग—इसके कृषित प्रकार की लोग सब्जी इत्यादि के काम में लाते हैं। वन्यभेद जो स्वाद में कड़वा होता है उसका चिकित्सा में उपयोग होता है जिसका आगे वर्णन दिया गया है। अथ कटुतुम्बी (कड़वी लौकी)। तस्या नामगुणानाह इक्ष्वाकुः कटुतुम्बी स्यात्सा तुम्बी च महाफला । कटुतुम्बी हिमा हृद्या पित्तकासविषापहा । तिक्ता कटुर्विपाके च वातपित्तज्वरान्तकृत् ।।५९।। कड़वी तुम्बी के संस्कृत नाम—इक्ष्वाकु, कटुतुम्बी, तुम्बी और महाफला ये सब हैं। कड़वी तुम्बी—तिक्तरसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, शीतल, हृदय के लिए हितकर एवम्-पित्त, खाँसी, विष, वात तथा पित्तज्वर को नष्ट करने वाली होती है। [५९] ४०. कटुतुम्बी (कड़वी तुम्बी) हिं०—कटुलौकी, कड़वी तोंबी, तित लौकी, तितुआ लौका, तुमरी, तुम्बी । बं०—तितलाउ, तित लाओ । म०— कडु मोपला । गु०—कड़वी तुम्बरी । क०—कहि सोरे । फा०—कदूय तल्ख । अ०—कर अउल् मुर, करउब् मुर । अं०—Bitter Gourd (बिटर गोर्ड) । ले०—Lagenaria vulgaris Ser. (लॅगेनेरिया वर्ल्गेरिस्) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । कड़वी तुम्बी—इसके लता-पत्र-पुष्पादि सब उक्त अलाबू के समान होते हैं। फल—यह बहुत कड़वा होता है। यह इसका वन्य भेद है। रासायनिक संगठन—बीजों में सॅपोनिन् होता है। गुण और प्रयोग—इसकी गुद्दी अत्यन्त कड़वी, वामक एवं भेदन होती है। इन्द्रायण की तरह इसका प्रभाव है। इससे हैजे जैसी अवस्था होती है। प्राचीन ग्रन्थों में वमन कराने के लिये इसका उपयोग लिखा है। अल्प मात्रा में इससे मिचली आकर कफ निकलता है तथा शौच साफ होता है। कामला तथा कास श्वास में इसे देते हैं। कामला में पत्तों का क्वाथ देते हैं। यह भी विरेचक होता है। दाह एवं शोथ पर गुद्दी को लगाते हैं। पत्तों से सिद्ध तैल गंडमाला, गाँठ या बद आदि पर मलते हैं। ५६ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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