भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 885, कुल 1167 में से

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८३४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कर्कटी (ककडी)। तस्या नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह एर्वारुः कर्कटी प्रोक्ता कथ्यन्ते तद्गुणा अथ ।।५९।। कर्कटी शीतला रूक्षा ग्राहिणी मधुरा गुरुः । रुच्या पित्तहरा सामा पक्वा तृष्णाऽग्निपित्तकृत् ।।६०।। ककड़ी का संस्कृत नाम—एर्वारु तथा कर्कटी है। कच्ची ककड़ी—मधुररस युक्त, शीतल, रूक्ष, ग्राही, गुरु, रुचिकारक तथा पित्तनाशक होती है। पकी ककड़ी— तृषा, जठराग्नि तथा पित्त को बढ़ाने वाली होती है। [५९-६०] ४१. ककड़ी हिं०—ककड़ी (री)। बं०—कांकुर। म०—काँकडी। क०—सौते। ते०—दोसकाया। ता०—वेल्लरिक्कै। फा०— ख्यार जाब, ख्यार दराल। अ०—किस्सा कदस। अं०—Snake Cucumber (स्नेक् कुकुम्बर)। ले०—Cucumis utilissimus Roxb. (कुकुमिस युटिलिस्सिमस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। यह युक्तप्रान्त, पञ्जाब आदि प्रान्तों में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता खूब फैलती है। पत्ते—पञ्च कोणाकार और दन्तुर होते हैं। फूल—पीले रंग के आते हैं। फल—कुछ इञ्चों से लेकर ३ फीट तक लम्बे होते हैं। यह हलके या गहरे हरे रंग के एवं कोमल अवस्था में मृदु रोमश होते हैं। बीज—छोटे-छोटे होते हैं। इसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं जिनमें कड़वा भेद भी होता है। गरमी के दिनों में इसे लोग कच्चा या सब्जी के रूप में खाते हैं। गुण और प्रयोग—ककड़ी शीत, पाचन एवं मूत्रजनन है। बीज शीत, मूत्रजनन एवं बल्य है। पत्तों की राख कफ निस्सारक है। (१) बीजों का उपयोग मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राघात में करते हैं। इसमें बीज ४ भाग, दारु हल्दी १ भाग, मुलेठी १ भाग इनको पीसकर चावल की मांड के साथ पिलाते हैं। (२) गेहूँ, मकई, अरहर, मूँग आदि प्रोटीन युक्त आहार से उत्पन्न कुपचन में ककड़ी का उपयोग किया जाता है। इसे भोजन के साथ या भोजनोत्तर देते हैं। अजीर्ण से वमन हो तो बींजों को मट्ठे में पीसकर पिलाते हैं। (३) श्वास नलिकाओं में कफ जमा हो तो पत्तों की राख देते हैं। अथ चिचिण्डः (चिचिण्डा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह चिचिण्डः श्वेतराजिः स्यात्सुदीर्घो गृहकूलकः। चिचिण्डो वातपित्तघ्नो बल्यः पथ्यो रुचिप्रदः। शोषणोऽतिहितः किञ्चिद् गुणैर्न्यूनः पटोलतः।।६१।। ४२. चचेण्डा हिं०—चचेंडा, चिचिंडा चिचेंडा। बं०—चिचिंगा। म०—पड़वल। गु०—पंडोलुं। ते०—पोटल काया। अं०— Snake Gourd (स्नेक गोर्ड)। ले०—Trichosanthes anguina Linn. (ट्रॉइकोसेंथीस् ऐंग्विना)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) चिचेंडा—खेतों में बोया जाता है। इसकी लता—विस्तार से फैलती है। पत्ते—कटे किनारे वाले पंचकोणाकार होते हैं। फूल—पीले रंग के आते हैं। फल—ककड़ी के समान लम्बा होता है परन्तु इसके दोनों छोर पतले होते हैं और इस पर लम्बी सफेद धारियाँ होती हैं। इसकी सब्जी लोग खाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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