भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 863

८१२ भावप्रकाशनिघण्टुः २५. वंशयव इसका विवरण पहले गुडूच्यादिवर्ग में पृष्ठ ५४५ पर किया गया है। अथ कुसुम्भबीजम् (कुसुम के बीज, कर्र) । तस्य नामगुणानाह कुसुम्भबीजं वरटा सैव प्रोक्ता वरट्टिका ।।८३।। वरटा मधुरा स्निग्धा रक्तपित्तकफापहा। कषाया शीतला गुर्वी स्याद्वृष्याऽनिलापहा ।।८४।। कुसुम के बीज (कर्र, बर्र) के संस्कृत नाम-कुसुम्भबीज, वरटा तथा वरट्टिका ये सब हैं। कुसुम के बीज-मधुर तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, शीतल, गुरु, किंचित् वीर्यवर्धक एवं-रक्तपित्त-कफ तथा वात को दूर करने वाले होते हैं। [८३-८४] २६. कुसुम के बीज इसका विवरण हरीतक्यादिवर्ग में पृष्ठ ३०६ पर दिया गया है। अथ गवेधुका (गरहेडुआ) । तस्या नामगुणानाह गवेधुका तु विद्वद्भिर्गवेधुः कथिता स्त्रियाम्। गवेधुः कटुका स्वाद्वी कार्श्यकृत्कफनाशिनी ।।८५।। गरहेडुआ के संस्कृत नाम-गवेधुका और गवेधु (यह स्त्री लिङ्गी है) ये दो विद्वानों ने बतलाये हैं। गरहेडुआ- कटुरस युक्त, स्वादिष्ट, कृशता करने वाला एवं-कफनाशक होता है। [८५] २७. गरहेडुवा हिं०-गरहेडुआ, गरहेडु (दु) वा, सन्कृ। बं०-गड़गड़, देधान, गुरगुड़। म०-कसई। गु०-कसई। अं०- Adlay (अँडले); Jobs Tears (जॉवस् टियर्स्)। ले०-Coix lachryma jobi Linn. (कोइक्स लेक्रिमा जोबी)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। यह बंगाल के गढ़हों और चावल के खेतों में उत्पन्न होता है तथा अन्य प्रान्तों में भी पाया जाता है। इसका पौधा-३ से ६ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-४ से १८ इञ्च तक लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, रेखाकार प्रासवत् एवं उनका किनारा तीक्ष्ण तथा कठोर होता है। पुष्प दण्ड-१ से २¹/₂ इञ्च लम्बे, चिपटे या ३ पहलवाले एवं पत्रकोण से एक साथ कई निकले रहते हैं। फल-अंडाकार या नाशपाती के आकार का या अश्रुक स्वरूप का, ०.३ इञ्च लम्बा तथा चमकीला होता है जिसके अन्दर सफेद या हलके भूरे रंग का चावल जैसा दाना (वास्तविक फल) निकलता है। इसके नाप, आकार, रंग, कठोरता के भेद से कई प्रकार पाये जाते हैं। इसके फल तथा मूल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन १०-२०, कार्बोहाइड्रेट ७३-७४, स्नेह ३-४ एवं आर्द्रता १० भाग रहती है। इसमें खनिज अन्य धान्यों की अपेक्षा कम रहते हैं। कोइसीन (Coicin) नामक एक प्रोलेमीन (Prolamine) इससे प्राप्त किया गया है जिसमें ल्यूसिन (Leucine) तथा ग्लूटेमिक ॲसिड (Glutamic acid) काफी रहता है। गुण और प्रयोग-इसका चावल की तरह उपयोग किया जा सकता है। इसका क्वाथ मूत्रजनन होने से मूत्रकृच्छ्र में दिया जाता है। मूल का उपयोग पीड़ितार्तव में करते हैं। इसकी रोटी खाने से चरबी कम होती है। अथ नीवरः (तीनी) । तस्य नामगुणानाह प्रसाधिका तु नीवारस्तृणान्नमिति च स्मृतम्। नीवारः शीतलो ग्राही पित्तघ्नः कफवातकृत् ।।८६।।