भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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धान्यवर्गः ८११ कोदो के संस्कृत नाम—कोद्रव तथा कोरदूष ये सब हैं। वनकोदो के संस्कृत नाम—उद्दाल तथा वनकोद्रव ये सब हैं। कोदो—वायुकारक, ग्राही शीतल एवम् पित्त तथा कफ का नाशक होता है। वनकोदो—गरम, ग्राही तथा अत्यन्त वातकारक होता है। [८०] २३. कोदो हिं०—कोदो धान, कोदव, कोदो। बं०—कोदो आधान। म०—कोद्र, हरिक, कोद्रु। गु०—कोदरा। क०— हारक। ते०—अरिकेलु। ता०—वरगु। अ०—कोद्रु। फा०—कोदिरम। ले०—Paspalum scrobiculatum Linn. (पास्पेलम् स्क्रोबिक्यूलेटम्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। सभी भागों में यह वन्य अथवा कृषितरूप में होता है। कोदो—एक प्रकार का तृणजातीय धान्य वर्षाकाल के आरम्भ ही में रोपण किया जाता है और आश्विन कार्तिक में काट लिया जाता है। इसका क्षुप—वर्षायु, सीधा खड़ा एवं १ १/२-२ फीट तक ऊँचा होता है। इसके पत्ते—पतले, घास के समान लम्बे होते हैं। इसकी मंजरी बाहर नहीं निकलती बल्कि सींकों के बीच में ही रह कर पक जाती है। इसके बीज सरसों के समान, छिलका सहित काले रंग के और भूसी निकालने पर किंचित् पीलापन युक्त सफेद रंग के होते हैं। इस अन्न में विशेषता यह है कि—भूसी सहित रखने से यह पचासों वर्ष तक नहीं बिगड़ता। इसकी भूसी निकाल कर गरीब कृषक खाते हैं। इसमें आटा भी कम निकलता है तथा भूसी हटाने में भी कठिनाई रहती है। इसके कई प्रकार पाये गये हैं। रासायनिक संगठन—इसके भूसी निकाले धान्य में प्रोटीन १२, कार्बोहाइड्रेट ७७, रेशा १ एवं राख १ भाग रहती है। कभी-कभी इसके पौधे तथा धान्य में मादक तत्त्व उत्पन्न हो जाते हैं जिससे चक्कर आदि आने लगते हैं। गुण और प्रयोग—मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति के लिये चावल के स्थान पर इसको दिया जाता है। अथ चारुकः (शरबीज)। नामगुणानाह चारुकः शरबीजः स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ। चारुको मधुरो रूक्षो रक्तपित्तकफापहः ।। शीतलो लघुवृष्यश्च कषायो वातकोपनः ।।८१।। शरबीज (सरपत के बीज) का संस्कृत नाम—चारुक तथा शरबीज है। शरबीज—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, वीर्यवर्धक, वात को कुपित करने वाले एवं रक्तपित्त तथा कफ के नाशक होते हैं। २४. शरबीज इसका विवरण पहले गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ५४८) में किया गया है। अथ वंशयवाः (बाँस के बीज)। तेषां गुणानाह यवा वंशभवा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः। बद्धमूत्राः कफघ्नाश्च वातपित्तकराः सराः ।।८२।। बाँस के बीज के संस्कृत नाम—वंशयव तथा वंशबीज हैं। बाँस के बीज—कषाय रसयुक्त, रूक्ष, विपाक में कटु रसयुक्त, मूत्र का विबन्ध (रुकावट) करने वाले, वात तथा पित्तकारक, सारक-एवम् कफनाशक होते हैं।