भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 865, कुल 1167 में से

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८१४ भावप्रकाशनिघण्टुः होते जाते हैं वैसे-वैसे अपने-अपने वीर्य को क्रम से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में छोड़ते जाते हैं । किन्तु जव, गेहूँ, तिल, उरद ये नवीन ही अवस्था में अपने-अपने गुणों से युक्त रहते हैं और हितकर होते हैं । पुराने होने पर वे विरस तथा रूक्ष हो जाते हैं तथा उतने गुणकारी नहीं होते हैं । [८०-९०] ❖ पुराणा वर्षद्वयादुपरि स्थिताः । यवादयो नवाः स्वस्थान् प्रति हिताः । पथ्याशिनां तु पुराणा हिताः । “पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूल्यभुग् ।'' इति वसन्ते वाग्भटेनोक्तत्वात् ।। ९० ।। यहाँ पर मूल में “पुराण” पद से दो वर्ष के ऊपर के रक्खे हुए जो धान्य हों वे पुराने कहलाते हैं । और जव आदि धान्य यदि नवीन हों तो वे स्वस्थ मनुष्यों के लिये ही हितकर होते हैं । पथ्य रखने वाले रोगियों के लिये तो पुराने अर्थात् दो वर्ष के अन्दर तक हितकर होते हैं और उनके लिये नवीन हितकर नहीं होते हैं । क्योंकि-वसन्त में पथ्य द्रव्यों के वर्णन में वाग्भट ने “पुराणयवगोधूम०—” इत्यादि से ‘पुराना जव तथा गेहूँ, मधु, जंगली जीवों के मांस का कबाब खाना हितकर है” ऐसा कह कर पुराना जव, गेहूँ पथ्य बतलाया है । [८८-९०] इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे धान्यवर्गः समाप्तः ।

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