भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ शाकवर्गः तत्र शाकनिरूपणमाह पत्रं पुष्पं फलं नालं कन्दं संस्वेदजं तथा। शाकं षड्विधमुद्दिष्टं गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।।१।। शाक का निरूपण—(१) पत्र, (२) पुष्प, (३) फल, (४) नाल, (५) कन्द और (६) संस्वेदज ये ६ प्रकार के शाक माने गये हैं, इनमें एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर गुरु समझना चाहिये । जैसे—पत्र की अपेक्षा पुष्पशाक गुरु होता है उसकी अपेक्षा फल शाक अधिक गुरु होता है इत्यादि क्रम से उत्तरोत्तर गुरु होते हैं । [१] अथ शाकानां गुणानाह प्रायः शाकानि सर्वाणि विष्टम्भीनि गुरूणि च । रूक्षाणि बहुवर्चांसि सृष्टविण्मरुतानि च ।।२।। शाकं भिनत्ति वपुरस्थि निहन्ति नेत्रं वर्णं विनाशयति रक्तमथापि शुक्रम् । प्रज्ञाक्षयं च कुरुते पलितं च नूनं हन्ति स्मृतिं गतिमिति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।।३।। शाकेषु सर्वेषु वसन्ति रोगास्ते हेतवो देहविनाशनाय । तस्माद् बुधः शाकविवर्जनं तु कुर्यात्तथाऽम्लेषु स एव दोषः ।।४।। सभी प्रकार के शाकों के सामान्य रूप से गुण—प्रायः सभी शाक (पत्र-पुष्पादिक ६ प्रकार के)—विष्टम्भक, गुरु, रूक्ष, विशेष रूप से मल निकालने वाले अर्थात् अधिक टट्टी निकालने वाले, मल तथा अधोवायु की प्रवृत्ति कराने वाले होते हैं और द्रव्यगुण जानने वाले विद्वान् लोग शाक के विषय में यह भी कहते हैं कि—शाक-शरीरस्थित हड्डियों का भेदन करने वाला अर्थात् उनकी सारताको नष्ट करने वाला, नेत्रों की शक्ति, रक्त, शुक्र, बुद्धि, स्मरणशक्ति तथा गति (चलने की शक्ति) को नष्ट करने वाला एवम्-पलित (अकाल में बालों का सफेद होना) को करने वाला होता है । सभी शाकों में रोग रहते हैं और वे ही रोग देह के नष्ट करने में हेतु होते हैं । इससे समझदार लोगों को चाहिये कि—शाक का खाना छोड़ दें और अम्ल (खट्टे) पदार्थों में भी पूर्वोक्त दोष होने से उनका सेवन परित्याग करना उचित है । [२-४] ❖ एतानि शाकनिन्दकानि वचनानि सामान्यानि ।।२-४।। यहाँ पर इतना और समझना चाहिये कि—ये सब शाक की निन्दा करनेवाले पूर्वोक्त वचन सामान्य रूप से हैं। [२-४] अथ शाकेषु विशिष्टानि । तत्र पत्रशाकानि । तत्रापि वास्तूकद्वयम् (दोनों बथुआ) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वास्तूकं वास्तुकं च स्यात्क्षारपत्रं च शाकराट् । तदेव तु बृहत्पत्रं रक्तं स्याद्गौडवास्तुकम् ।।५।। प्रायशो यवमध्ये स्याद्यवशाकमतः स्मृतम् । वास्तूकद्वितयं स्वादु क्षारं पाके कटूदितम् ।।६।। दीपनं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदम् । सरं प्लीहास्त्रपित्तार्शः कृमिदोषत्रयापहम् ।।७।।