भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८१६ भावप्रकाशनिघण्टुः शाक के विषय में विशेष वचन निम्नलिखित हैं—शाकों में प्रथम पत्रशाक का वर्णन करते हैं। उसमें भी प्रथम दोनों प्रकार के बथुआ के विषय में विशेष वचनों का उल्लेख करते हैं। बथुआ के संस्कृत नाम—वास्तूक, वास्तुक, क्षारपत्र और शाकराट् ये सब हैं। बड़ा बथुआ का लक्षण तथा संस्कृत नाम—जो बथुआ बड़े पत्तों वाला एव् रक्तवर्ण का होता है, उसे “गौड़ वास्तुक” कहते हैं। बथुआ अधिकतर जव के खेत में होता है, अतः संस्कृत में इसे “यवशाक” भी कहते हैं। दोनों बथुआ—स्वादिष्ट, क्षारयुक्त, विपाक में कटुरस युक्त, अग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, लघु, शुक्र तथा बल को बढ़ाने वाले, सारक एवम् प्लीहा, रक्तपित्त, बवासीर, कृमि तथा त्रिदोष के नाशक हैं। [५-७] १. बथुआ हिं०—बथुआ, बथवा, चिल्लीशाक। बं०—बेतुया, वेतोशाक। म०—चाकवत, चकवत। गु०—टांको, बथवों, बाथरो, चीलो। ता०—परुपुकिरै। क०—विलिय चिल्लीके। फा०—मुसेलेसा, सरमक, सलमह। अ०—रोक् बतुल बजामेल, कुतुफ, कतफ। अं०—Lambs Quarters (लैम्बस् क्वार्टर्स्)। ले०—Chenopodium album Linn. (चिनोपोडियम् एल्बम्)। Fam. Chenopodiaceae (चिनोपोडिएसी)। भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बहुलता से पाया जाता है विशेष कर यह आप ही आप बिना बोये उत्पन्न होता है। इसका क्षुप—गंधहीन, सीधा या झुका हुआ, १-१ १/२ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—आकार में छोटे-बड़े त्रिकोणाकार, नुकीले एवं कई प्रकार के होते हैं। डण्डियों के अन्त में बारीक पुष्प और बीज कोषों के गुच्छे लगते हैं। इसके श्वेत, हरित एवं कुछ लाली ऐसे तीन प्रकार (Varieties) पाये जाते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें कॅरोटीन (Carotene) तथा विटामिन ‘सी’ होता है। गुण और प्रयोग—यह सारक एवं कृमिघ्न है। जलने पर इसके पत्तों का लेप दाह शान्ति के लिये लगाते हैं। कुपचन में इसका साग देते हैं। २. सुगन्धवास्तुक एक सुगन्धवास्तुक (C. ambrosioides—चि. एम्ब्रोसिओइडिस्) नामक अन्य जाति होती है जो बंगाल, सिलहट, दक्षिण एवं बिहार में पाई जाती है। इसका क्षुप—२ से ४ फीट ऊँचा, सुगन्धित ग्रन्थिरोमश; पत्ते—आयताकार या प्रासवत्, कुण्ठिताग्र तथा नीचे के लहरदार एवं दन्तुर; पुष्प—छोटे, हरित, असंख्य एवं लम्बी मंजरी में गुच्छबद्ध होकर निकले हुये; फल—गोल, कुछ दबे हुये एवं फलभित्ति से आवृत् बीज—छोटे, वृक्काकार, १/३० इञ्च व्यास के, भूरे, चिकने, चमकीले एवं स्वाद में कटुतिक्त रहते हैं। समग्र वनस्पति में तीव्र गंध आती है। रासायनिक संगठन—पुष्प एवं फल आने पर मूल को छोड़कर बाकी भाग से एक उड़नशील तैल (०.१७%) निकाला जाता है जो अमेरिका के इसके एक प्रकार से पाये जाने वाले तेल, चिनोपोडियम ऑईल (Chenopodium oil) का भारतीय प्रतिनिधि है। इस तेल का मुख्य कृमिघ्न तत्त्व एस्कॅरिडॉल् (Ascaridol) भारतीय तेल में ४०- ४५% रहता है जबकि अमेरिकी तेल में यह ६०% तक रहता है। इसलिए इसे अधिक मात्रा (५-२० मिनिमम) में देना पड़ता है। इस पौधे के सभी अंगों में संपोनिन रहता है जो मूल में अधिक रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन ‘सी’ एवं मॅग्नेशियम् फॉस्फेट पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इस तेल का उपयोग बहुत सावधानी के साथ आंत्रस्य कृमियों के लिये स्वतंत्र या अन्य औषध के साथ करते हैं। अंकुश कृमि (Hookworm—हूक्वर्म) के लिये यह बहुत उपयोगी है। विशेष विवरण आदि आधुनिक डाक्टरी ग्रन्थों में देखें। इसके बीज ५ से २० रत्ती की मात्रा में चीनी के साथ कृमि विकार के लिये खिलाते हैं।