भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८१७ अथ पोतकी (पोई)। तस्या नामगुणानाह पोतक्युपोदिका सा तु मालवाऽमृतवल्लरी। पोतकी शीतला स्निग्धा श्लेष्मला वातपित्तनुत् ।।८।। अकण्ठ्या पिच्छिला निद्राशुक्रदा रक्तपित्तजित्। बलदा रुचिकृत्पथ्या बृंहणी तृप्तिकारिणी ।।९।। पोई के संस्कृत नाम—पोतकी, उपोदिका, मालवा तथा अमृतवल्लरी ये सब हैं। पोई—शीतल, स्निग्ध, कफजनक, वात तथा पित्तनाशक, किञ्चित् कण्ठ के लिये हितकर, पिच्छिल, निद्रा तथा शुक्र को देनेवाली, रक्तपित्त को दूर करनेवाली, बलदायक, रुचिकारक, पथ्य, बृंहण (रस—रक्तादिवर्धक) एवम् तृप्तिकारक होती है। [८-९] ३. पोय हिं०—पोय (शाक), पोय का साग, पोई का साग। बं०—पूंई, पुईशाक। म०—मायाल। गु०—पोथी। क०— वसले। ते०—बच्चलि। ता०—वसलक्किरै। अं०—Indian Spinach (इण्डियन् स्पाइनॅक) ले०—Basella rubra Linn. (बेसिला रुब्रा)। Fam. Basellaceae (बेसेलेसी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में बोई जाती है तथा वन्य भी पाई जाती है। इसका क्षुप—बहुवर्षायु, फैलनेवाला लतासदृश होता है। पत्ते—शीशम के पत्ते के समान गोलाकार परन्तु उनसे मोटे, ५ × ३ इञ्च बड़े और गूदेदार होते हैं। पत्रदण्ड से कोमल सींक निकल कर उस पर क्रमशः लाल मिश्रित सफेद रंग के फूल आते हैं। फल—छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् नोकीले एवं पकने पर कालापन युक्त बैंगनी रंग के हो जाते हैं। सफेद और लाल कांड के भेद से यह दो प्रकार की होती है। रासायनिक संगठन—इसमें खटिक, लोह तथा विटामिन 'ए', 'बी₁', 'बी₂' एवं प्रोटीन रहता है। गुण और प्रयोग—यह शीतल तथा स्नेहन है। इसका स्वरस, उदर्द एवं गर्भिणी तथा बालकों के विबंध में देते हैं। सोजाक में भी इसे दिया जाता हैं। उदर्द में इसको शरीर पर मलते भी हैं। अथ श्वेतरक्तमारिषौ (सफेद व लाल मरसा)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह मारिषो बाष्पको मार्ष श्वेतो रक्तश्च संस्मृतः। मारिषो मधुरः शीतो विष्टम्भी पित्तनुद् गुरुः ।।१०।। वातश्लेष्मकरो रक्तपित्तनुद् विषमाग्निजित्। रक्तमार्षो गुरुर्नाति सक्षारो मधुरः सरः। श्लेष्मलः कटुकः पाके स्वल्पदोष उदीरितः ।।११।। मरसा के संस्कृत नाम—मारिष, बाष्पक और मार्ष ये सब हैं। भेद—सफेद तथा रक्तवर्ण के भेद से मरसा दो प्रकार का होता है। मरसा (सफेद)—मधुर रसयुक्त, शीतल, विष्टम्भजनक, पित्तनाशक, गुरु, वात तथा कफकारक एवम्-रक्तपित्त तथा विषमाग्नि को शमन करने वाला होता है। लाल मरसा—किंचित् गुरु, क्षारयुक्त मधुर रस वाला, सारक, कफजनक, पाक में कटुरसयुक्त तथा स्वल्प दोषवाला कहा हुआ है। [१०-११] ४. सफेद मरसा हिं०—मरसा। बं०—सादानटे। गु०—डांभो। ता०—तण्डुकिरई। ते०—टोटाकुड़ा। म०—भाजी, माठाची भाजी। ले०—Amaranthus blitum var. oleraceae Duthie (अॅमॅरेन्थस् ब्लाइटम वेर ओलेरेसिआ)। Fam. Amaranthaceae (अॅमॅरेन्थेसी)। ५५ भाव. I