भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 873

८२२ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके पत्तों में पर्याप्त खनिज तथा विटामिन 'ए', 'बी', 'सी' तथा 'ई' पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—इसका स्वरस संखिया तथा अफीम की विषाक्तता में वमन कराने के लिये देते हैं। इसका सुखाया हुआ स्वरस विरेचक होता है। स्त्रियों के शारीरिक एवं तन्त्रिकीय (Nervous) दुस्वास्थ्य में इसका उपयोग किया जाता है। इसको अर्श में भी देते हैं। कलिकाओं को दाद पर लगाते हैं। अथ लोणी बृहल्लोणी च (नोनिया, बड़ा नोनियाकुल्फा)। तयोर्नामगुणानाह लोनालोणी च कथिता बृहल्लोणी तु घोटिका। लोणी रूक्षा स्मृता गुर्वी वातश्लेष्महरी पटुः ।।१९।। अर्शोघ्नी दीपनी चाम्ला मन्दाग्निविषनाशिनी। घोटिकाऽम्ला सराचोष्णा वातकृत्कफपित्तहृत् ।।२०।। वाग्दोषव्रणगुल्मघ्नी श्वासकासप्रमेहनुत्। शोथे लोचनरोगे च हिता तज्ज्ञैरुदाहृता ।।२१।। नोनिया का संस्कृत नाम—लोणा तथा लोणी हैं। बड़ी नोनियाँ का संस्कृत नाम—बृहल्लोणी और घोटिका हैं। नोनिया—लवण तथा अम्लरसयुक्त, रूक्ष, गुरु, अग्निदीपक एवम् वात, कफ, अर्श (बवासीर) अग्नि की मन्दता तथा विष का नाश करने वाली है। बड़ी नोनिया—इसके गुण के जानने वालों द्वारा इसे अम्लरसयुक्त, सारक, उष्ण, वातकारक एवम्-कफ, पित्त, वाणी दोष (बोलने में हकलाना आदि दोष) व्रण, श्वास, खाँसी और प्रमेह को दूर करने वाली तथा शोथ और नेत्ररोग में हितकर बतलायी गयी है। [१९-२१] १३. छोटी लोणा हिं०-छोटीलोणा, नोनीसाग, छोटी नोनिया, जंगलीलोनिया। बं०-क्षुद्रे णुनी, वनणुनी। म०-भुई घोल, लहान घोल। गु०-लुणी। क०-गोलि। ते०-पइल कुर। ता०-कोरिल कीरई। अ०-बुल्क तुलहमका। ले०- Portulaca quadrifida Linn. (पोर्तुलेका क्वाड्रिफीडा)। Fam. Portulacaceae (पोर्तुलेकेसी)। छोटी लोणा एक प्रसिद्ध शाक है जो सब जगह होता है। यह जमीन पर फैला हुआ होता है। शाखा-सूत जैसी पतली तथा सन्धि से मूल निकले हुए रहते हैं। पत्ते-१/५-१/३ इञ्च, विपरीत, अंडाकार या अंडाकार-भालाकार एवं अल्पवृन्त युक्त होते हैं। पुष्प—पीले होते हैं। यह ललाई लिये हरे रंग की एवं स्वाद में खारी और खट्टी होती है। गुण और प्रयोग—इसके ताजे पत्तों का लेप विसर्प में लगाया जाता है। इसका फांट मूत्रकृच्छ्र में एवं बीज कृमिघ्न रूप में प्रयोग में लाये जाते हैं। १४. बड़ी लोणा हिं०-बड़ी लोणा, लोणाशाक, कुल्फा। बं०-बड़णुनी। म०-घोल। गु०-लुणी, म्होटी। फा०-खुल्फा, खुर्फा। अ०-बकुतुल हुनका। अं०-Garden purslane (गार्डन पर्सलेन)। ले०-Portulaca oleracea Linn. (पोर्तुलेका ओलेरेसीया)। Fam. Portulacaceae (पोर्तुलेकेसी)। कुल्फा—यह प्रसिद्ध साग सीधा या जमीन पर फैला हुआ सभी स्थानों पर होता है। पत्ते—स्फानवत्-आयताकार, गोलखण्डिताग्र एवं १/४-१ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प—पीले होते। बीज—दानेदार होते हैं। इसका साग बनाते हैं। इसमें कुछ अम्लता रहती है। रासायनिक संगठन—इसमें पिच्छिल पदार्थ एवं पोटैशियम ऑक्जेलेट पाया जाता है।