भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुण और प्रयोग-यह शीतल, शोथहर एवं रक्तशोधक है। इसके बीज स्नेहन, मूत्रजनन एवं कृमिघ्न हैं। वृक्कशोथ, बस्तिशोथ में इसका साग तथा बीज देते हैं। इसका स्वरस सभी प्रकार के रक्तपित्त में तथा ज्वर में लाभदायक है। अर्श में इसका साग देते हैं। इसको ताजा पीसकर विसर्प, मोच, चोट, सूजन एवं हाथ पैर की जलन आदि में दाह एवं शोथ कम करने के लिये बांधते हैं। अथ चांगेरी (तिनपतिया) । तस्या नामानि गुणांश्चाह चाङ्गेरी चुक्रिका दन्तशठाम्बष्ठाऽम्ललोणिका । अश्मन्तकस्तु शफरी कुशली चाम्लपत्रकः ।।२२।। चाङ्गेरी दीपनी रुच्या रूक्षोष्णा कफवातनुत् । पित्तलाऽम्ला ग्रहण्यर्शः कुष्ठातीसारनाशिनी ।।२३।। तिनपतिया के संस्कृत नाम-चाङ्गेरी, चुक्रिका, दन्तशठा, अम्बष्ठा, अम्ललोणिका, अश्मन्तक, शफरी, कुशली और अम्लपत्रक ये सब हैं। चांगेरी-अम्लरसयुक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, रूक्ष, उष्ण, पित्तजनक एवम्-कफ, वात ग्रहणी, अर्श, कुष्ठ तथा अतीसार को दूर करने वाली है। [२२-२३] १५. चाङ्गेरी हिं०-चांगेरी, तिनपतिया, अंबिलोना। पं०-खटकल, खट्टी बूटी। बं०-अमरूल। म०-आंबटी, अंबुटी, भुईसर्पटी। गु०-आम्बोती। क०-सिंबर्गी। ते०-पुलि चिंत। ता०-पुलियोरे। अं०-Indian Sorrel (इण्डियन सॉरिल)। ले०-Oxalis corni culata Linn. (ऑक्झेलिस् कोर्नी क्युलेटा)। Fam. Oxalidaceae (आग्जेलिडेसी)। यह प्रायः सभी गरम प्रान्तों की ऊसर भूमि, खंडहर तथा घरों के आसपास आप ही आप जंगली उत्पन्न होती है। यह प्रसरी वनस्पति जमीन पर फैली हुई रहती है। ग्रंथियों से आगन्तकमूल निकले रहते हैं। पत्ते-त्रिपत्रक एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पत्रक-अभिहृद्वत् होते हैं। उपपत्र-आयताकार एवं वृन्तलग्न रहते हैं। पुष्प-पीले रंग के पुष्प, पत्तों से छोटे दण्ड पर प्रायः दो-दो आते हैं। फली-मृदु रोमश अनेक बीज युक्त एवं पकने पर अपने आप फूटती हैं। इसका स्वाद खट्टा होता है तथा इसका साग बनाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें ॲसिड पोटॅशियम ऑग्जेलेट पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह अम्ल, रोचक, उष्ण, दीपन, ग्राही, अर्शोघ्न एवं वातकफ नाशक है। इससे छोटी धमनियों का संकोचन होकर रक्तस्राव रुकता है। कुपचन में अन्न में अम्लता लाने के लिये इसका उपयोग करते हैं। खूनी आँव तथा गुदभ्रंश में इसे देते हैं। शोथ पर इसको पीसकर बाँधने से पीड़ा एवं दाह कम होकर सूतन उतरती है। धतूरे के विष के निवारण के लिये इसका रस पिलाते हैं। अथ चुक्रिका (चूक) । तस्या नामगुणानाह चुक्रिका स्यात्तु पत्राम्ला रोचनी शतवेधिनी ।।२४।। चुक्रा त्वम्लतरा स्वाद्धी वातघ्नी कफपित्तकृत् । रुच्या लघुतरा पाके वृन्ताकेनातिरोचनी ।।२५।। चूक के संस्कृत नाम-चुक्रिका, 'पत्राम्ला, रोचनी तथा शतवेधिनी ये सब हैं। चूक-अत्यन्त अम्ल रसयुक्त (अत्यन्त खट्टा), स्वादिष्ठ, वातनाशक, कफ तथा पित्त को उत्पन्न करनेवाला, रुचिकारी, विपाक में अत्यन्त लघु तथा बैंगन के साथ खाने में अत्यन्त रुचिकारक है। [२४-२५]