भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
७९० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ दग्धमृज्जातशालिगुणानाह शालयो दग्धमृज्जाताः कषाया लघुपाकिनः । सृष्टमूत्रपुरीषाश्च रूक्षाः श्लेष्मापकर्षणाः ॥८॥ जली हुई मिट्टी में उत्पन्न होने वाले शालि के गुण—जो शालि (अगहनी चावल)—जली हुई मिट्टी में उत्पन्न हुये हैं वे कषाय रसयुक्त, लघुपाकी (शीघ्र पचनेवाले), मूत्र तथा मल को निकालने वाले, रूक्ष तथा कफ का अपकर्षण करने वाले अर्थात् बढ़े हुये कफ को कम करने वाले होते हैं। [८] अथ कैदारशालिगुणानाह कैदारा वातपित्तघ्ना गुरवः कफशुक्रलाः । कषायाश्चाल्पवर्चस्का मेध्याश्चैव बलावहाः ॥९॥ केदार (जुते हुये खेत) में बोने से उत्पन्न हुए जो चावल होते हैं वे–कषाय रसयुक्त, वात-पित्त नाशक, गुरु, कफ तथा शुक्र की वृद्धि करने वाले, थोड़ी मात्रा में मल को निकालने वाले, मेधाशक्ति के लिये हितकर तथा बलकारक होते हैं। [९] ❖ कैदाराः = कृष्टक्षेत्रजा उप्ताः ॥९॥ यहाँ पर मूल में 'कैदार' पद से 'जुते हुए खेत में बोने से उत्पन्न हुये चावल' यह अर्थ समझना चाहिये। [९] अथ स्थलजशालिगुणानाह स्थलजाः स्वादवः पित्तकफघ्ना वातवह्निदाः । किञ्चित्तिक्ताः कषायाश्च विपाके कटुका अपि ॥१०॥ स्थलज शालि के गुण—स्थलज (बिना जुती हुई भूमि में उत्पन्न हुये अर्थात् बिना जोते बोये स्वयम् उत्पन्न हुये) जो शालि होते हैं वे—स्वादिष्ट, पित्त तथा कफ नाशक, वात तथा जठराग्निवर्धक, किंचित् तिक्त रसयुक्त, कसैले तथा विपाक में कटु रसयुक्त होते हैं। [१०] ❖ स्थलजाः = अकृष्टभूमिजाताः स्वयं जाताः ॥१०॥ यहाँ पर मूल में 'स्थलज' पद से 'बिना जुती हुई भूमि में उत्पन्न हुये अर्थात् बिना जोते बोये स्वयम् उत्पन्न हुये' यह अर्थ समझना चाहिये। [१०] अथ वापितशालिगुणानाह वापिता मधुरा वृष्या बल्याः पित्तप्रणाशनाः । श्लेष्मलाश्चाल्पवर्चस्काः कषाया गुरवो हिमाः ॥११॥ ❖ वापिताः = कृष्टक्षेत्रेऽकृष्टक्षेत्रे च ॥११॥ बोये हुये शालि के गुण—वापित (जुते हुये या बिना जुते हुये खेत में बोने से उत्पन्न हुये) जो शालि (अगहनी चावल) हैं वे–मधुर तथा कषाय रसयुक्त, वीर्यवर्द्धक, बलकारक, पित्तनाशक, कफ जनक, थोड़ी मात्रा में मल को निकालने वाले, गुरु तथा शीतल होते हैं। [११] अथावापितशालिगुणानाह वापितेभ्यो गुणैः किञ्चिद्धीनाः प्रोक्ता अवापिताः ॥१२॥ अवापित शालि के गुण—वापित की अपेक्षा अवापित शालि गुणों में कुछ न्यून होते हैं। [१२] ❖ कृष्टक्षेत्रेऽकृष्टक्षेत्रे वा ॥१२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ७९१ यहाँ पर भी मूल में ‘अवापित’ पद का वापित की भाँति ही जुते तथा बिना जुते खेत में बिना बोने से उत्पन्न हुये (अगहनी चावल) यह अर्थ समझना चाहिये। [१२] अथ नव-पुराण-रोपित-शालिगुणानाह रोपितास्तु नवा वृष्याः पुराणा लघवः स्मृताः। तेभ्यस्तुरोपिता भूयः शीघ्रपाका गुणाधिकाः ।।१३।। रोपण किये शालि (चावल) यदि नये हों तो-वीर्यवर्धक और यदि पुराने हों तो लघु होते हैं और उन्हीं से पुनः रोपण किये हुये शालि (चावल)-शीघ्र पचनेवाले तथा अधिक गुणकारी होते हैं। [१३] अथ छिन्नरूढशालिगुणानाह छिन्नरूढा हिमा रूक्षा बल्याः पित्तकफापहाः। बद्धविट्काः कषायाश्च लघवश्चाल्पतिक्तकाः ।।१४।। जो काटने के पश्चात् पुनः उगे हुये शालि (चावल) होते हैं वे-शीतल, रूक्ष, बलकारक, पित्त तथा कफ नाशक, मल को बाँधने वाले, कसैले, लघु तथा किञ्चित् तिक्त रसयुक्त होते हैं। [१४] अथ रक्तशालिः। तस्य गुणानाह रक्तशालिर्वरस्तेषु बल्यो वर्ण्यस्त्रिदोषजित्। चक्षुष्यो मूत्रलः स्वर्यः शुक्रलस्तृड्ज्वरापहः ।।१५।। विषव्रणश्वासकासदाहनुद् वह्निपुष्टिदः। तस्मादल्पान्तरगुणाः शालयो महदादयः ।।१६।। रक्तशालि-यह सभी शालिधान्यों में श्रेष्ठ होता है तथा बलकारक, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला, त्रिदोषनाशक, नेत्रों के लिये हितकर, मूत्रजनक, कण्ठ स्वर को उत्तम करने वाला, शुक्रजनक, जठराग्नि को पुष्ट करने वाला एवम् तृषा, ज्वर, विष, व्रण, श्वास, कास तथा दाह को दूर करने वाला होता है और इसकी अपेक्षा महाशालि आदि जो दूसरे शालि (चावल) हैं वे स्वल्प गुण वाले होते हैं। [१५-१६] ❖ रक्तशालिः ‘दाऊदखानी’ इति लोके मगधदेशे प्रसिद्धः ।।१५-१६।। यहाँ पर मूल में “रक्तशालि” से मगध देश में “दाऊदखानी” नाम से प्रसिद्ध चावल समझना चाहिये। [१५-१६] अथ व्रीहिधान्यम् तस्य लक्षणसहितान् भेदान् गुणाँश्चाह वार्षिकाः कण्डिताः शुक्ला व्रीहयश्चिरपाकिनः। कृष्णव्रीहिः पाटलश्च कुक्कुटाण्डक इत्यपि ।।१७।। शालामुखो जतुमुख इत्याद्या व्रीहयः स्मृताः। कृष्णव्रीहिःस विज्ञेयो यत्कृष्णतुषतण्डुल ।।१८।। पाटलः पाटलापुष्पवर्णको व्रीहिरुच्यते। कुक्कुटाण्डाकृतिर्व्रीहिः कुक्कुटाण्डक उच्यते ।।१९।। शालामुखः कृष्णशूकः कृष्णतण्डुल उच्यते। लाक्षावर्णं मुखं यस्य ज्ञेयो जतुमुखस्तु सः ।।२०।। व्रीहयः कथिताः पाके मधुरा वीर्यतो हिमाः। अल्पाभिष्यन्दिनो बद्धवर्चस्का षष्टिकैः समाः ।। कृष्णव्रीहिर्वरस्तेषां तस्मादल्पगुणाः परे ।।२१।। व्रीहिधान्य के लक्षण-जो चावल वर्षा ऋतु में पैदा होते हैं अर्थात् पक कर तैयार होते हैं एवम् ओखली में छाँटने से जो सफेद होते हैं तथा देर में पकते हैं वे व्रीहिधान्य कहलाते हैं। व्रीहिधान्य के भेद-कृष्णव्रीहि, पाटल, कुक्कुटाण्डक, शालामुख और जतुमुख ये सब व्रीहि धान्य के भेद हैं। कृष्णव्रीहि के लक्षण-जिसकी भूसी तथा चावल दोनों काले हों वे “कृष्णव्रीहि” कहलाते हैं। पाटल (व्रीहि) के लक्षण-जिसका रंग पाटला (पाढल) के पुष्प के सदृश हो वह पाटल (व्रीहि) कहलाता है। कुक्कुटाण्डक (व्रीहि) के लक्षण-आकार में जो मुर्गे के अण्डे के समान होता है उसे कुक्कुटाण्डक (व्रीहि) कहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
७९२ भावप्रकाशनिघण्टुः शालामुख (व्रीहि) के लक्षण-जिसके शूक (धान्य के मुख पर रहने वाला सूक्ष्म, लम्बा काँटा) तथा चावल दोनों कृष्णवर्ण के हों उसे शालामुख (व्रीहि) समझना चाहिये। जतुमुख (व्रीहि) के लक्षण-जिसका मुख लाख के सदृश लाल रंग का हो उसे जतुमुख (व्रीहि) समझना चाहिये। व्रीहिधान्य-पाक में मधुर, शीतवीर्य, किञ्चित् अभिष्यन्दी, मल को बाँधने वाले, गुण में षष्टिक (साठी चावल) के समान होते हैं। इन व्रीहियों में कृष्णव्रीहि सर्वोत्तम होता है और इसकी अपेक्षा अन्य व्रीहिधान्य न्यून गुणवाले होते हैं। [१७-२१] अथ षष्टिकाः (साठीचावल)। तेषां लक्षणमाह गर्भस्या एव ये पाकं यान्ति ते षष्टिका मताः ॥२२॥ षष्टिक (साठी चावल) के लक्षण-जो धान्य-गर्भ में ही अर्थात् बिना फूटे ही पक जाते हैं, वे-षष्टिक धान्य कहलाते हैं (और ६० दिन में पक कर तैयार होने वाले धान को भी षष्टिक कहते हैं)। [२२] अथ तेषां नामान्याह षष्टिकः शतपुष्पश्च प्रमोदकमुकुन्दकौ। महाषष्टिक इत्याद्याः षष्टिकाः समुदाहृताः। एतेऽपि व्रीहयः प्रोक्ता व्रीहिलक्षणदर्शनात् ॥२३॥ षष्टिक (साठी धान्य) के भेद-षष्टिक, शतपुष्प, प्रमोदक, मुकुन्दक और महाषष्टिक ये सब षष्टिक के भेद हैं। और ये भी व्रीहि कहलाते हैं क्योंकि इनमें व्रीहि के लक्षण-वर्षा ऋतु में पक कर तैयार होना आदि देखे जाते हैं। [२३] अथ तेषां गुणानाह षष्टिका मधुरा शीता लघवो बद्धवर्चसः। वातपित्तप्रशमनाः शालिभिः सदृशा गुणैः ॥२४॥ षष्टिकधान्य मात्र-मधुर, शीतल, लघु, मल को बाँधने वाले, वात तथा पित्त को शमन करने वाले और गुणों में शालिधान्य के सदृश होते हैं। [२४] तत्र षष्टिकाया गुणानाह षष्टिका प्रवरा तेषां लघ्वी स्निग्धा त्रिदोषजित् ॥२५॥ स्वाद्वी मृद्वी ग्राहिणी च बलदा ज्वरहारिणी। रक्तशालिगुणैस्तुल्या ततः स्वल्पगुणाः परे ॥२६॥ षष्टिक नामक षष्टिक धान्य के गुण-षष्टिक-सम्पूर्ण षष्टिक धान्यों में उत्तम होता है और लघु, स्निग्ध, त्रिदोषनाशक, स्वादिष्ट, मृदु, ग्राही, बलदायक तथा ज्वर को दूर करने वाला और गुणों में रक्तशालि के समान होता है। शेष षष्टिकधान्य इसकी अपेक्षा स्वल्प गुणवाले होते हैं। [२५-२६] १. चावल (धान) हिं०-चावल, धान। म०-तांदूल, भात। गु०-भात, चोरवा। बं०-धान, चावल। ता०-अरशी, नेल्लु। ते०-धान्यमु, ओदलु। क०-भट्टा। अं०-Rice (राइस), Paddy (पॅड्डी-धान)। ले०-Oryza sativa Linn. (ओरिझा सटाइवा)। Fam. Gramineae. (ग्रेमिनी)। यह सभी स्थानों पर कृषित होता है। इसका क्षुप-छोटा, जलीय, वर्षायु होता है। काण्ड गोल एवं पोला होता है। पत्ते-बहुत, खुरदरे, पतले तथा भालाकार होते हैं। पुष्प-गुच्छ के रूप में, अनेक शाखायुक्त तथा झुके हुए रहते
धान्यवर्गः ७९३ हैं जिनमें पुंकेशर ६ तथा स्त्रीकेशर की कुक्षि पंखसदृश एवं संख्या में २ होती हैं। लाल चावल में स्त्रीकेशर लाल रहते हैं। यद्यपि चावल की एक ही जाति (Species) है तथापि इसके सैकड़ों प्रकार पाये जाते हैं। भावप्रकाशकार भी इससे सहमत होते हुए इसके मुख्य ४ भेद, (१) शालि, (२) रक्तशालि, (३) व्रीहि एवं (४) षष्टिक करते हैं। इनमें से प्रथम हेमन्त ऋतु में पककर तैयार होता है। दूसरा लाल रंग का होता है। तीसरा वर्षाकाल में पककर तैयार होता है। चौथा ६० दिन में या जल्दी तैयार होता है। अधिकतर प्रथम ही होता है। स्थानभेद, पकने के ऋतु के भेद, पकने के काल (अवधि) भेद, चावल के अन्दर रहने वाले पिष्टमय पदार्थ, चावल या धान के रंग, आकार, नाप, शूक रहित या शूक युक्त भेद से इसके अनेक प्रकार मिलते हैं। घटिया किस्म में अधिकतर लाल चावल के प्रकार पाये जाते हैं। यह लाली बहुत अन्दर तक नहीं रहती। किसी- किसी अच्छे प्रकार में भी लाल चावल होते हैं तथा उनका स्वाद भी अच्छा होता है। इसीलिए कहीं-कहीं चावल को रंग देते हैं किन्तु यह रंग जल से धोने पर निकल जाता है। नये चावल की अपेक्षा पुराना चावल सुपाच्य होता है। परीक्षणों से देखा गया है कि नये चावल की पचन क्षमता पुराने की अपेक्षा आधी से कम होती है। रखने से इसमें से स्टार्च में परिवर्तन होने से यह प्रभाव देखा जाता है। पकाने में भी नये का भात चिपचिपा तथा गोला सा हो जाता है किन्तु पुराने का बहुत अच्छा बनता है। चावल साफ करने की विधि के अनुसार भी चावल के पोषक तत्त्वों में परिवर्तन हो जाता है। कुछ उबाल कर फिर धान छुड़ाये हुए भुजिया चावल (Paraboiled-पैराबॉइल्ड) में तथा हाथ कुटे चावल में, मिल से साफ किये हुये की अपेक्षा नाइट्रोजन द्रव्य अधिक रहते हैं। निम्नलिखित तालिका से इसका अन्तर साफ मालूम होता है। रासायनिक संगठन-
| - - - | जल | अलब्यूनिनाम द्रव्य | स्नेह | कार्बोहाइड्रेट | रेशा | राख |
|---|---|---|---|---|---|---|
| हाथ कुटा चावल | १२.२ | ८.५ | ०.६ | ७८.० | ०.६ | ०.७ |
| मिल का साफ किया हुआ चावल | १३.० | ६.९ | ०.४ | ७९.२ | ० | ०.५ |
| भुजिया, हाथकुटा चावल | १२.६ | ८.५ | ०.६ | ७७.४ | ० | ०.९ |
| भुजिया, मिल का साफ किया हुआ चावल | १३.३ | ६.४ | ०.४ | ७९.१ | ० | ०.८ |
| लावा | १४.७ | ७.५ | ०.१ | ७४.३ | ० | ३.४ |
| चिउड़ा | १२.२ | ६.६ | १.२ | ७८.२ | ० | १.८ |
गुण और प्रयोग-प्रधान भोजन के रूप में अनेक प्रान्तों में इसका उपयोग किया जाता है। इसको अधिक जल में पतला पकाकर अतिसार, संग्रहणी तथा अन्य पाचन के विकारों में देते हैं। चावल की धोवन दाहशामक तथा स्नेहन होने से ज्वर, दाह एवं आंत्रिकप्रदाह आदि में दी जाती है।
७१४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ शूकधान्यानि। तत्र यवभेदानाह यवस्तु सितशूकः स्यान्निः शूकोऽतियवः स्मृतः। तोक्यस्तद्वत्स हरितस्ततः स्वल्पश्च कीर्त्तितः ।। २७।। शूक धान्यों में जौ के लक्षण सहित भेद-जौ-यह सफेद शूक (सूई या टूँड) से युक्त होता है। अतियव- इसमें शूक नहीं होता है। तोक्य-यह शूक से रहित, हरे रंग का तथा छोटा होता है। [२७] ❖ शूकधान्यानि तेषु यवः प्रसिद्धः । अतियवो निःशूकः कृष्णारुणवर्णो यवः । तोक्यो हरितो निःशूकः स्वल्पो यवः "जई" इति प्रसिद्धः ।।२७।। यहाँ पर "शूकधान्यों" में "जव" प्रसिद्ध है। अतियव-यह शूक रहित काले तथा अरुण (लाल) रंग का होता है। तोक्य-यह हरे रंग का शूक रहित छोटा जब होता है और "जई" इस नाम से लोक में प्रसिद्ध है।" अथ तेषां गुणानाह यवः कषायो मधुरः शीतलो लेखनो मृदुः । व्रणेषु तिलवत्पथ्यो रूक्षो मेधाऽग्निवर्धकः ।।२८।। कटुपाकोऽनभिष्यन्दी स्वर्यो बलकरो गुरुः । बहुवातमलो वर्णस्थैर्यकारी च पिच्छिलः ।।२९।। कण्ठत्वगामयश्लेष्मपित्तमेदःप्रणाशनः । पीनसश्वासकासोरुस्तम्भलोहिततृट्प्रणुत् ।। अस्मादतियवो न्यूनस्तोक्यो न्यूनतरस्ततः ।।३०।। जौ-कषाय तथा मधुर रस युक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, शीतल, लेखन, कोमल, व्रणों में तिल के समान पथ्य, रूक्ष, मेधा तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाला, किंचित् अभिष्यन्दी, कण्ठ स्वर को उत्तम करने वाला, बलकारक, गुरु, अधिक रूप से वात तथा मल को करने वाला, शरीर के वर्ण को स्थिर रखने वाला, पिच्छिल एवम्-कण्ठ तथा चर्म सम्बन्धी रोग, कफ, पित्त, भेद, पीनस, श्वास, कास, उरुस्तम्भ, रक्तविकार तथा तृषा को दूर करने वाला है। अतियव-यह जौ की अपेक्षा न्यून गुणवाला होता है। जई-यह अतियव से भी न्यून गुण वाला होता है। [२८-२९] २. जव हिं०-जव, जो, जौ। म०-जव। क०-जवेगोधी। ता०-बार्लि अरिसि। ते०-यव धान्य। फा०-जव, जओ। अ०-शईर, श्यईर। बं०-जव। अं०-Barley (बारली। ले०-Hordeum vulgare Linn. (हॉरडीयम् वलगेयर)। Fam. Graminea (ग्रेमिनी)। इसकी खेती उत्तर भारत में विशेष होती है। उपज का ८.०% भाग उत्तर प्रदेश, बिहार तथा उड़ीसा में होता है। पंजाब में १३% एवं अन्य प्रान्तों में मिलाकर ७% उपज होती है। दक्षिण में बहुत ही नाममात्र खेती की जाती है। इसका क्षुप-वर्षायु तथा २-३ फीट ऊँचा होता है। मूल-बहुत तथा रेशेदार होते हैं। पत्ते-रेखाकार भालाकार, ९-१२ इञ्च लम्बे तथा १/२-५/८ इञ्च चौड़े एवं मध्यपर्णुक श्वेत रहती है। बाली शूकयुक्त होती है। सपुष्पशाल्क (Lemma-लेम्मा) पर शूक रहता है। यह शल्क एवं शल्की वृत्तपत्रक (Palea) दाने से लगा रहता है। इसके कई प्रकार पाये जाते हैं। जई (तोक्य) यह यव का भेद या भारतीय ओट (Indian oat) जिसका लेटिन नाम एह्नेना बाइझेंटिना (Avena byzantina C. Koch) है, हो सकता है। गेहूँ के आटे में मिलाकर इसकी रोटी बनाई जाती है। इससे माल्ट तथा मद्य बनाये जाते हैं। जिसमें स्टार्च अधिक रहता है उसको माल्ट बनाने के काम में लाते हैं जिसमें प्रोटीन अधिक रहता है उसको खाने के काम में लिया जाता
धान्यवर्गः ७९५ है। विशेष पद्धति से ऊपर का छिलका साफ करके पर्ल बार्ली (Pearl Barley) बनाते हैं। जब का सत्तू बनाकर खाया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें कार्बोहाइड्रेट ६९.३ भाग, प्रोटीन ११.५, खनिज १.५ जिनमें खटिक, लोह एवं विटामिन 'सी' को छोड़कर अन्य थोड़ी मात्रा में होते हैं। इसके प्रोटीन का 'जैव मूल्य' ६४ है जबकि गेहूँ का ६७ रहता है। गुण और प्रयोग-यह सुपाच्य होता है तथा भूनकर पीसकर इसकी मण्ड, पेया इत्यादि बनाकर रोगी को पथ्य के रूप में देते हैं। कुपचन, ज्वर, अतिसार, मूत्रकृच्छ्र तथा प्रदाह युक्त विकारों में यवमण्ड का उपयोग किया जाता है। इसके क्षार का वर्णन पहले हरीतक्यादिवर्ग (पृष्ठ १६३) में किया जा चुका है। अथ गोधूमः (गेहूँ) । तस्य नामानि सलक्षणभेदानाह गोधूमः सुमनोऽपि स्यात्त्रिविधः स च कीर्त्तितः । महागोधूम इत्याख्यः पश्चाद्देशात्समागतः ।। ३१ ।। गेहूँ के संस्कृत नाम-गोधूम तथा सुमन हैं। भेद-(१) महागोधूम, (२) मधूली, (३) दीर्घगोधूम इन भेदों से यह तीन प्रकार का होता है। महागोधूम-यह पश्चिम के देशों (पंजाब आदि) से आता है। [३१] मधूली तु ततः किञ्चिदल्पा सा मध्यदेशजा । निःशूको दीर्घगोधूमः क्वचिन्नन्दीमुखाभिधः ।। ३२ ।। मधूली-यह "बड़ा गेहूँ" की अपेक्षा कुछ छोटा होता है और मध्यदेश (आगरा-मथुरा आदि) में उत्पन्न होता है। दीर्घगोधूम-यह शूक (टूँड) रहित होता है तथा इसे कहीं-कहीं नन्दीमुख भी कहते हैं। [३२] अथ गोधूमगुणानाह गोधूम मधुरः शीतो वातपित्तहरो गुरुः । कफशुक्रप्रदो बल्यः स्निग्धः सन्धानकृत्सरः ।। ३३ ।। जीवनो बृंहणो वर्ण्यो व्रण्यो रुच्यः स्थिरत्वकृत् ।। ३४ ।। गेहूँ-यह मधुर, शीतल, गुरु, कफप्रद (कफ को पैदा करने वाला), वीर्यजनक, बल-कारक, स्निग्ध, सन्धानकारक (टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला), सारक, जीवनी शक्ति को बढ़ाने वाला, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), वर्ण को उत्तम करने वाला, व्रण के लिये हितकर, रुचिकारक, स्थिरता को करने वाला एवम् वात तथा पित्त नाशक होता है। [३३-३४] ❖ कफप्रदो नवीनो न तु पुराणः । "पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूलभुग्" । इति वाग्भटेन वसन्ते गृहीतत्वात् ।। ३३-३४ ।। यहाँ पर- "कफप्रद" पद होने से "नवीन गेहूँ कफ को बढ़ाने वाला होता है न कि पुराना" यह समझना चाहिये। क्योंकि-यदि पुराना गेहूँ भी कफप्रद होता तो वाग्भट वसन्तऋतु के पथ्य में-पुराना जौ तथा गेहूँ, मधु, जङ्गली जीवों के मांस का कबाब इत्यादि के मध्य में गेहूँ का नाम न लेते। [३३-३४] अथ मधूलीनन्दीमुखयोर्गुणानाह मधूली शीतला स्निग्धा पित्तघ्नी मधुरा लघुः । शुक्रला बृंहणी पथ्या तद्वन्नन्दीमुखः स्मृतः ।। ३५ ।। मधूली (गेहूँ)-मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध, लघु, शुक्रजनक, बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), पथ्य और पित्तनाशक होता है। नन्दीमुख (गेहूँ)-यह भी पूर्वोक्त मधूली के समान गुणों में होता है। [३५]
७९६ भावप्रकाशनिघण्टुः ३. गेहूँ हिं०-गेहूँ। बं०-गम। म०-गेहूँ गु०-धउ, घेऊँ। क०-गोधी। ते०-गोदुमेलु। फा०-गंदुम। ता०- गोदूमै। अ०-हिन्ता। अं०-Wheat (हीट)। ले०-Triticum, sativum Lam. (ट्राइटिकम् सटाइवम्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। अनेक प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। संसार भर में अन्न के लिये इसकी उपज की जाती है। यह मैसूर, मद्रास में कम होता है। उत्तर भारत में यह अधिक होता है। इसके पौधे जव के समान होते हैं। यद्यपि इसकी ३-४ जातियाँ होती हैं तथापि उपर्युक्त जाति ही अधिक बोई जाती है। इसके अनेक प्रकार होते हैं। इनमें भी शूक युक्त या विहीन भेद पाये जाते हैं। कड़ा, मुलायम तथा लाल एवं श्वेत आदि दाने के भेद होते हैं। खाने के लिये कड़े दाने वाला तथा स्टार्च के लिये मुलायम गेहूँ काम में लाया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन द्रव्य ८ से २४ भाग, कार्बोहाइड्रेट ६८-७०, स्नेह १-२ तथा राख १.५- २ भाग रहती है। मुलायम गेहूँ में प्रोटीन कम रहता है। इसमें लोह, ताम्र, यशद, मैगनीज एवं मैगनेशियम् खनिज होते हैं। गुण और प्रयोग-इसको अन्न के रूप में उपयोग में लाया जाता है। चोकरयुक्त आटे की रोटी विबंध में लाभदायक रहती है। अथ शिम्बीधान्यम्। तत्रादौ तस्य नामान्याह शमीजाः शिम्बिजाः शिम्बीभवाः सूप्याश्च वैदलाः ।।३६।। शिम्बीधान्य के संस्कृत नाम-यमीज, शिम्बिज, शिम्बीभव, सूप्य और वैदल ये सब हैं। [३६] अथ शिम्बीधान्यस्य गुणानाह वैदला मधुरा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः । वातलाः कफपित्तघ्ना बद्धमूत्रमला हिमाः ।। ऋते मुद्गमसूराभ्यामन्ये त्वाध्मानकारिणः ।।३७।। शिम्बीधान्य-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, विपाक में कटुरसयुक्त, वातजनक, कफ तथा पित्त-नाशक, मूत्र तथा मल को बाँधने वाले ओर शीतल होते हैं। और शिम्बीधान्यों में मूँग तथा मसूर को छोड़कर शेष सभी आध्मान (अफरा) करने वाले होते हैं ।३७।। मुद्गमसूरयोराध्मानकारित्वमन्यवैदलापेक्षया, न तु सर्वथा, एतयोरपि किञ्चिदाध्मान-कारित्वदर्शनात् ।।३७।। “अन्य शिम्बी धान्यों की अपेक्षा मूँग और मसूर आध्मान करने वाले नहीं होते न कि सर्वथा आध्मान करने वाले नहीं होते, क्योंकि ये दोनों भी किंचित् मात्र आध्मान करनेवाले होते हैं, ऐसा देखा गया है"। [३७] अथ मुद्गः (मूँग) सभेदस्य तस्य गुणानाह मुद्गो रूक्षो लघुर्गाही कफपित्तहरो हिमः । स्वादुरल्पानिलो नेत्र्यो ज्वरघ्नो वनजस्तथा ।।३८।। मुद्गो बहुविधः श्यामो हरितः पीतकस्तथा । श्वेतो रक्तश्च तेषान्तु पूर्वः पूर्वो लघुः स्मृतः ।।३९।। सुश्रुतेन पुनः प्रोक्तो हरितः प्रवरो गुणैः । चरकादिभिरप्युक्त एष एव गुणाधिकः ।।४०।। मूँग-स्वादिष्ट, रूक्ष, लघु, ग्राही, कफ तथा पित्तनाशक, शीतल, किंचित् वायुकारक, नेत्र के लिये हितकर तथा ज्वरनाशक है और जंगल में उत्पन्न होने वाली मूँग गुणों में मूँग के समान ही है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ७९७ मूँग के भेद और उनके गुण—श्याम, हरी, पीली, सफेद तथा लाल इन भेदों से मूंग कई प्रकार की होती है। और इनमें एक दूसरी की अपेक्षा पूर्व-पूर्व लघु होती है। (अर्थात्—लाल की अपेक्षा सफेद, सफेद से पीली, पीली से हरी, हरी से श्याम, लघु होती है।) किन्तु सुश्रुत ने तो विशेषतः और मूँगों की अपेक्षा हरीमूँग को गुणों में श्रेष्ठ बतलाया है। और चरकादि महर्षियों ने भी इसी को (हरी मूँग को) अधिक गुणकारी बतलाया है। [३८-४०] ४. मूँग हिं०—मूँग, मूंग। बं०—मुग। म०—मूँग, हिरवे मूग। गु०—मग, कच्छी। ता०—पच्चैयमेरू। क०—हेसरु। ते०—पच्चापेसलु। फा०—वुनुमाष, बनोमाश, माष। अ०—मजमाश, माष मज। अं०—Green Gram (ग्रीन् ग्राम)। ले०—Phaseolus aureus Roxb. (फेसीओलस् ऑरियस्)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह इस देश के खेतों में बोई जाती है और पश्चिमोत्तर हिमालय के ६ हजार फीट ऊँची भूमि में भी जङ्गली उत्पन्न होती है। इसका क्षुप—१-२ फुट ऊँचा होता है। इसके पत्ते—उड़द के समान होते हैं। समस्त क्षुप पर रेशमवत् बारीक रोवें होते हैं। फूल—पीले आते हैं। फलियाँ—१॥-२ इञ्च लम्बी और कुछ टेढ़ी होती हैं। बीज—हरे रंग के होते हैं। अन्दर की दाल पीले रंग की होती है। रासायनिक संगठन—इसमें प्रोटीन २२ भाग, कार्बोहाइड्रेट ५४-५६, स्नेह १.३-२.७, रेशा ४.१-५ एवं राख ३.६-४.४ भाग रहती है। गुण और प्रयोग—यह अन्य दालों की अपेक्षा हल्की एवं सुपाच्य होती है। मुद्ग यूष का उपयोग पथ्य के रूप में करते हैं। अथ माषः (उरद) तस्य गुणानाह माषो गुरुः स्वादुपाकः स्निग्धो रुच्योऽनिलापहः। स्रंसनस्तर्पणो बल्यः शुक्लो बृंहण परः ।।४१।। भिन्नमूत्रमलः स्तन्यो मेदःपित्तकफप्रदः। गुदकीलादितश्वासपक्तिशूलानि नाशयेत् ।।४२।। कफपित्तकरा माषाः कफपित्तकरं दधि। कफपित्तकरा मत्स्या वृन्ताकं कफपित्तकृत् ।।४३।। उरद—गुरु, विपाक में मधुररसयुक्त, स्निग्ध, रुचिकारक, वातनाशक, स्रंसन, सन्तर्पण करने वाला, बलकारक, शुक्र-जनक, अत्यन्त बृंहण, (रस-रक्तादि वर्धक), मूत्र तथा मल का भेदन करने वाला, दुग्धवर्धक, मेद-पित्त-कफ को बढ़ाने वाला एवम्-गुदकील-अर्दितवात (मुँह का लकवा)-श्वास-पंक्तिशूल (अन्न के पचने पर शूल होना) इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है। कफ तथा पित्त कारक द्रव्य चतुष्टय-उरद, दही, मछली और बैंगन ये चारों द्रव्य कफ तथा पित्त को बढ़ाने वाले होते हैं। [४१-४३] ५. उड़द हिं०—उड़द, उड़िद, उरिद, उर्दी। बं०—माष कलाय। म०—उड़ीद। ता०—उलुंदु। गु०—अडद। क०—उड्डु। ते०—उद्दुल। फा०—माष। अ०—माषा। अं०—Black Gram (ब्लॅक् ग्राम्)। ले०—Phaseolus mungo Linn. (फेसीओलस् मुंगो)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। उड़द इस देश में बहुत प्रसिद्ध है। इसकी उपज हर प्रान्त में होती है। इससे दाल, बड़े इत्यादि बनते हैं। इसका क्षुप—झाड़ीदार फैला हुआ, एक फीट ऊँचा, अनेक शाखायुक्त एवं रोमावृत होता है। पुष्प—पीले होते हैं। फली—पतली, गोल, १ १/२-२ १/२ इञ्च लम्बी एवं बीजों के बीच-बीच में भीतर दबी हुई होती है। बीज-८ से
७९८ भावप्रकाशनिघण्टुः १५, काले या गहरे भूरे या कभी-कभी हरे होते हैं। ये हरे होते हुये भी मूँग की तरह अन्दर से पीले न होकर सफेद होते हैं। 'भावप्रकार इसके दो भेद माष एवं महामाष या राजमाष (श्वेत, रक्त, कृष्ण) लिखते हैं। उपर्युक्त उड़द के छोटे तथा बड़े भी भेद जाते हैं जिनमें बड़े में दाने कुछ काले तथा अच्छे होते हैं। ये दोनों भिन्न-भिन्न काल में बोये जाते हैं। संभव है भावप्रकाशोक्त महामाष बड़े काले रंग की उड़द का प्रकार हो या जिसका आगे लोबिया के नाम से वर्णन किया गया है वह हो। रासायनिक संगठन-इसमें फॉस्फोरिक अॅसिड की मात्रा अन्य दालों की अपेक्षा ५ से १० गुना अधिक रहती है। इसमें प्रोटीन २२, कार्बोहाइड्रेट ५५, तेल १ एवं राख ४ भाग रहती है। इसके प्रोटीन भी अन्य दालों की तरह न होकर कुछ मांस के समान होते हैं। गुण और प्रयोग-यह मधुर, बल्य, वृष्य, बृंहण, उष्ण, वातनाशक, कफपित्त वर्धक एवं स्तन्यजनन है। वातविकार एवं संधिरोग में इसका क्वाथ देते हैं। हड्डियों में पीड़ा होने से यदि निद्रानाश हो तो इसकी जड़ देते हैं। यह मादक होती है। वातविकारों में बाह्याभ्यन्तर उड़द का उपयोग किया जाता है। उड़द के लड्डू नाड़ी संस्थान के लिये बल्य हैं। अथ राजमाषः (बोड़ा) । यस्य च “वेरातरा-लोबिया” इत्यादयो भेदाः । तस्य नामानि तद्भेदगुणाँश्चाह राजमाषो महामाषश्चपलश्च बलः स्मृतः । राजमाषो गुरुः स्वादुस्तुवरस्तर्पणः सरः ।।४४।। रूक्षो वातकरो रुच्यः स्तन्यो भूरिबलप्रदः । श्वेतो रक्तस्तथा कृष्णस्त्रिविधः स प्रकीर्त्तितः ।। यो महांस्तेषु भवति स एवोक्तो गुणाधिकः ।।४५।। राजमाष के संस्कृत नाम-राजमाष, महामाष, चपल तथा बल ये सब हैं। इसी के “बेरातरा”, “लोबिया” इत्यादि लोक में भेद होते हैं। राजमाष-गुरु, स्वादिष्ट तथा कषाय रस युक्त, सन्तर्पण करने वाला, सारक, रूक्ष, वातकारक, रुचिकारक, दुग्धवर्धक तथा अत्यन्त बलकारक होता है। भेद-सफेद, लाल तथा काला इन भेदों से यह तीन प्रकार का होता है। गुण-इनमें जो बड़ा होता है वही सबसे अधिक गुणशाली समझा जाता है। [४४-४५] नोट-राजमाष से कुछ लोग लोबिया का ग्रहण करते हैं तथा कुछ पूर्वोक्त उड़द का काले रंग का बड़ा भेद लेते हैं। यहाँ लोबिया का वर्णन किया जा रहा है। ६. राजमाष (लोबिया) हिं०-राजमाष, बोड़ा, चौरा, लोबिया । बं०-बरबटी कलाय, बर्बटी। म०-ववलया, अलंसंदे । गु०-चोला । क०-अलसंदे । ते०-अलसन्दुलु । ता०-करामणि । फा०-लोवह, लोविया । अ०-फरिका, फ़िरीका । अं०- Chinese Beans (चाइनीज बीन); Cowpeas (काउपौज)। ले०-Vigna catiang Walp. (विग्ना कँटियङ्ग) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । इसकी अनेक स्थानों पर खेती की जाती है। यह वर्षायु, अनेक मांसल पतले काण्ड के द्वारा जमीन पर फैलने वाला क्षुप है। पत्ते-त्रिपत्रक एवं लंबेवृन्तवाले; पत्रक, बड़े, गहरे हरे एवं अंडाकार होते हैं। पुष्प-पर्व से ३-६ एक साथ, एक इञ्च व्यास के, श्वेत, हलके गुलाबी, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ७९९ हलके नीले रंगों के भेद से २, ३ प्रकार के होते हैं जो मुरझाने के समय भीतर से पीले हो जाते हैं। फली-पतली, गोल एवं विभिन्न प्रकार के अनुसार भिन्न-भिन्न लम्बाई की होती है। लम्बी १८ इञ्च से २ फीट तक एवं छोटी ४ से ५ इञ्च तक हुआ करती है। बीज-फली के अनुसार छोटे तथा बड़े एवं रंग में प्रकार के अनुसार क्रीम जैसे, भूरे, फीके लाल, हलके बैंगनी या काले हुआ करते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में प्रोटीन २४.६, कार्बोहाइड्रेट ५५.७, स्नेह ०.७, रेशा ३.८, राख ३.२ एवं आर्द्रता १८ भाग रहती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज मूत्रल तथा आमाशय बलप्रद एवं कृमिनाशक हैं। यह अच्छा पोषक द्रव्य है। अथ निष्पावः । स तु राजशिम्बीबीजम् (भटवाँसु) इति लोके । तस्यनामानि गुणाँश्चाह निष्पावो राजशिम्बिः स्याद्वल्लकः श्वेतशिम्बिकः। निष्पावो मधुरो रूक्षो विपाकेऽम्लो गुरुः सरः ।।४६।। कषायः स्तन्यपित्तास्रमूत्रवातविबन्धकृत् । विदाह्युष्णो विषश्लेष्मशोथहृच्छुक्रनाशनः ।।४७।। निष्पाव यह लोक में राजशिम्बी का बीज अथवा भटवांसु इस नाम से प्रसिद्ध है। इसके संस्कृत नाम-निष्पाव, राजशिम्बि, वल्लक तथा श्वेतशिम्बिक ये सब हैं। निष्पाव-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में अम्लरसयुक्त, रूक्ष, गुरु, सारक, विदाही, उष्ण और दुग्ध-पित्त तथा रक्त को बढ़ाने वाला, मूत्र तथा वात का विबन्ध करने वाला एवम्- विष-कफ-शोथ तथा शुक्र का नाशक होता है। [४६-४७] ७. निष्पाव हिं०-निष्पाव, भटवासु, बल्लार, सेम । बं०-मखानसिम । म०-पावटे, वाल । गु०-ओलीया, ओलियवाल । क०-अवरे । ते०-अनुमुल । ता०-मोचै । अं०-Flat Bean (फ्लैट बीन) । ले०-Dolichos lablab Linn. (डीलिकोस् लबलब्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह जंगली तथा कृषित दोनों प्रकार का सभी स्थानों पर होता है। दक्षिण में विशेष रूप से मैसूर में यह अधिक होता है। इसकी लता होती है। पत्ते-त्रिपत्रक होते हैं। पुष्प-सीधे दण्ड पर विभिन्न रंगों के किन्तु विशेष रूप से गुलाबी और श्वेत रहते हैं। फली-आयताकार, ३ इञ्च लम्बी तथा ४ से ६ बीज युक्त होती है। हरी फलियों के ऊपर की तैल ग्रन्थियों से दुर्गन्धयुक्त तैल निकलता है। इसके अनेक प्रकार, बीजों के रंग, आकार आदि के अनुसार होते हैं। रासायनिक संगठन-अखंड बीज में जल १४.६, प्रोटीन १७.१, स्नेह २.२, कार्बोहाइड्रेट ५७.४, रेशा ५.० एवं राख ३.६ भाग रहती है। दाल में जल १२.१, प्रोटीन २४.४, स्नेह १.५, कार्बोहाइड्रेट ५७.८, रेशा १.२ एवं राख ३ भाग रहती है। गुण और प्रयोग-इसकी हरी फलियों का साग खाया जाता है। कफज विकारों में इसे देते हैं। मूल विषैले माने जाते हैं। अथ वनमुद्गः (मोठ) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह मकुष्ठो वनमुद्गः स्यान्मकुष्ठकमुकुष्ठकौ ।।४८।। मकुष्ठो वातलो ग्राही कफपित्तहरो लघुः । वह्निजिन्मधुरः पाके कृमिकृज्ज्वरनाशनः ।।४९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८०० भावप्रकाशनिघण्टुः मोठ के संस्कृत नाम—मकुष्ठ, वनमुद्ग, मकुष्ठक और मुकुष्ठक ये सब हैं। मोठ—वातकारक, ग्राही, कफ तथा पित्त की नाशक, लघु, अग्नि को जीतने वाली, पाक में मधुर रसयुक्त, कृमिकारक तथा ज्वरनाशक होती है। [४८-४९] ८. मोठ हिं०—मोठ, मोट। बं०—वनमूग। म०—मटक्या, मठ। गु०—मठ। क०—मडकी। ते०—वनमुद्ग चेट्टु। ता०—तुलक्कप्यारै। फा०—माषहिन्दी, माशाहिन्दी। अं०—Aconite Leaved Kidney Bean (एकोनाईट लीव्ड कीडनी बीन्)। ले०—Phaseolus aconitefolius Jacq. (फेसीओलस एकोनाइटीफोलीयस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह भी अनेक प्रान्तों में होती है। इसका क्षुप—मुद्गपर्णी की तरह फैला हुआ तथा अल्प रोमश होता है। पत्ते— त्रिपत्रक होते हैं। पुष्प—छोटे होते हैं। फली—दृढ़ तथा बीज बड़े होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें प्रोटीन २३, कार्बोहाइड्रेट ५६, अत्यल्प तेल, रेशा ४ तथा राख ३ १/२ भाग रहती है। गुण और प्रयोग—आहार के रूप में दाल का उपयोग किया जाता है। इसको ज्वर में देते हैं। मूल मादक होता है। अथ मसूरः (मसूरी)। तस्य नामानि गुणांश्चाह मङ्गल्यको मसूरः स्यान्मङ्गल्या च मसूरिका। मसूरो मधुरः पाके संग्राही शीतलो लघुः ।। कफपित्तास्रजिद्रूक्षो वातलो ज्वरनाशनः ।।५०।। मसूरी के संस्कृत नाम—मङ्गल्यक, मसूर, मङ्गल्या तथा मसूरिका ये सब हैं। मसूरी—विपाक में मधुर रसयुक्त, ग्राही, शीतल, लघु, वातकारक, रूक्ष एवम्—कफ-पित्त-रक्तविकार तथा ज्वर को दूर करने वाली होती है। [५०] ९. मसूर हिं०—मसूर, मसूरक, मसूरी। बं०—मसुरी। म०—मसुर। गु०—मसूर। क०—चणगि। ता०—मिसुर। ते०— मसूर पप्पु। फा०—बुनो सुर्ख, नेव सुर्ख, विसुक, मरजूनक। अ०—अदस्। अं०—Lentil (लॅटिल)। ले०— Ervum lens Linn. (एवम् लेन्स); Lens culinaris Medic (लेन्स कलिनेरिस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह समस्त भारत में शीतऋतु में बोया जाता है। इसका क्षुप—१ से २ फीट ऊँचा, सीधा, झाड़ी दार एवं चने की तरह होता है पत्ते—संयुक्त, पक्षवत् एवं अग्र सूत्रसम होता है। पत्रक—४ से ६ जोड़े, अवृन्त, भालाकार एवं छोटे होते हैं। पुष्प—सफेद, बैंगनी या गुलाबी, विभिन्न प्रकार के भेदानुसार होते हैं। फली—छोटी, १/२ इञ्च लम्बी एवं दो बीज युक्त होती है। बीज—गोल, किंचित् चिपटे तथा भूरे रंग के होते हैं। दाल—लाल रंग की होती है। रासायनिक संगठन—दाल में प्रोटीन २५, कार्बोहाइड्रेट ६०, स्नेह १ तथा राख २ भाग रहती है। गुण और प्रयोग—दाल की तरह इसे खाते हैं। यह पौष्टिक किन्तु उष्ण मानी जाती है। विगंध में इसको देते हैं। पुराने व्रण में इसको पीसकर लगाते हैं।
धान्यवर्गः ८०१ अथाढकी (अरहर) । तस्य नामगुणानाह आढकी तुवरी चापि सा प्रोक्ता शणपुष्पिका ।। ५१ ।। आढकी तुवरा रूक्षा मधुरा शीतला लघुः । ग्राहिणी वातजननी वर्ण्या पित्तकफास्रजित् ।। ५२ ।। अरहर के संस्कृत नाम-आढकी, तुवरी और शणपुष्पिका ये सब हैं। अरहर-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, ग्राही, वातजनक, शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाली एवम्-पित्त-कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली है। [५१-५२] १०. अरहर हिं०-अरहड़, अड़हर, रहर, रहरी, रहड़, तूर। बं०-आहरी, अडर। म०-तुरी, तूर। गु०-तुरदाल्य, तुवर। क०-तोगरि। ते०-कंदुलु। ता०-तोवरै। फा०-शाखल। अ०-शाखुल, शांज। अं०-Pigeon Pea (पीजन् पी); Red Gram (रेड ग्राम)। ले०-Cajanus indicus Spreng. (केजेनस् इण्डीकस्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष-४-१० फी ऊँचा एवं झाड़दार होता है। पत्ते-त्रिपत्रक रहते हैं। पत्रक-१।।-२ इञ्च लम्बे एवं आयताकार भालाकार होते हैं। इनके अधःपृष्ठ पर सूक्ष्म ग्रन्थियाँ होती हैं। पुष्प-पीले एवं बैंगनी धारीयुक्त होते हैं। फलियाँ-२-४ इञ्च लम्बी होती हैं। प्रत्येक फली में ३ से ५ तक बीज रहते हैं। बीज को ही अरहर कहते हैं। यद्यपि इसके अनेकों भेदोपभेद होते हैं तथापि इनके दो प्रकार (Variety), अरहर एवं तूर (Var. bicolor; var. flavas) होते हैं। प्रथम का वर्णन ऊपर दिया हुआ है। द्वितीय में क्षुप छोटा, पुष्प पीत, फली छोटी एवं २ से ३ बीजयुक्त हुआ करती है। यह जल्दी परिपक्व होती है। बीजों से दाल बनाने की दो विधियां प्रचलित हैं। एक में आर्द्र करके बनाते हैं तथा दूसरे में वैसे ही दल कर बनाते हैं। दल कर बनाने में दाल अच्छी होती है तथा जल्दी पकती है किन्तु दलने में टूटने से महँगी पड़ती है। भिंगो कर बनाने में अधिक दाल निकलती है किन्तु यह देर में पकती है। अच्छी दाल मोटी, छोटी तथा गोल होती है तथा दूसरी चिपटी, बीच में छोटे गर्तदार, पतली तथा बड़ी होती है जो जल्दी नहीं पकती। रासायनिक संगठन-दाल में प्रोटीन २२.३, स्नेह १.७, खनिज ३.६, कार्बोहाइड्रेट ५७.२ भाग एवं खटिक, फास्फोटस, विटामिन 'ए' तथा 'बी' १ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसका भोजन में बहुत उपयोग किया जाता है। इसके पत्ते तथा दाल को पीसकर, गरम करके स्तन पर दूध बंद करने के लिये बाँधते हैं। दाल के लेप से शोथ कम होता है। कामला में पत्तों का रस जरासा सेंधव मिलाकर पिलाते हैं। अथ चणकः (चना) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह चणको हरिमन्थः स्यात्सकलप्रिय इत्यपि। चणकः शीतलो रूक्षः पित्तरक्तकफापहः । लघुः कषायो विष्टम्भी वातलो ज्वरनाशनः ।। ५३ ।। चना के संस्कृत नाम-चणक, हरिमन्थ और सकलप्रिय ये सब हैं। चना-कषायरसयुक्त, शीतल, रूक्ष, लघु, विष्टम्भक, वातकारक एवम्-पित्त-रक्तविकार-कफ तथा ज्वर का नाशक है। [५३] ५४ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
८०२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ भर्जनादिभेदेन तस्य गुणभेदानाह स चाङ्गारेण सम्भृष्टस्तैलभृष्टश्च तद्गुणः । आर्द्रभृष्टो बलकरो रोचनश्च प्रकीर्तितः ॥५४॥ शुष्कभृष्टोऽतिरूक्षश्च वातकुष्ठप्रकोपणः । स्विन्नः पित्तकफं हन्यात् सूपः क्षोभकरो मतः ॥५५॥ आर्द्रोऽतिकोमलो रुच्यः पित्तशुक्रहरो हिमः । कषायो वातलो ग्राही कफपित्तहरो लघुः ॥५६॥ भुने हुए आदि भेदों से चने के गुणों के भेद—अङ्गारे (केवल अग्नि) से भुने हुये चने के गुण—यदि चना केवल अग्नि से भुना हुआ हो तो पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है। तेल में भुना हुआ चना भी पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है। गीला भुना हुआ चना—बलदायक तथा रुचिकारक होता है। सुखा भुना हुआ चना—अत्यन्त रूक्ष एवं वात तथा कुष्ठ को कुपित करने वाला होता है। उबाला हुआ चना—पित्त तथा कफ का नाशक होता है। चने की राँधी हुई दाल—क्षोभ उत्पन्न करने वाली होती है। भिगोया हुआ चना—कषाय रसयुक्त, अत्यन्त कोमल, रुचिकारक, शीतल, वातजनक, ग्राही, लघु एवम्—पित्त, शुक्र तथा कफ-पित्त को नष्ट करने वाला होता है। इसके पत्तों के गुण आगे शाक वर्ग में दिये हुवे हैं। [५४-५६] ११. चना हिं०—चने, छोला, रहिला, बूँट। म०—हरबरा, चणें। बं०—छोला। गु०—चण्या, चणा। क०—कडले। ता०—कडलै। ते०—सनगलु। फा०—नखूद। अ०—इमस। पं०—छोले। अं०—Gram (ग्राम); Bengal Gram (बंगाल ग्राम); Chick Pea (चिक् पी)। ले०—Cicer arietinum Linn. (सीसर् एरीएटीनम्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में प्रतिवर्ष इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप—सीधा या फैला हुआ, अनेक शाखायुक्त, १ से १ १/२ फीट ऊँचा एवं रोमश होता है। पत्ते—पक्षवत् होते हैं जिनके पत्रक दीर्घवृत्ताभ, ६ मि० मी० चौड़े, दन्तुर एवं ग्रन्थियुक्त रोमों से आवृत रहते हैं। पुष्प—छोटे, एकाकी तथा पत्रकोण में आते हैं जो विभिन्न प्रकारों में भिन्न-भिन्न रंग एवं नाप के होते हैं। फली—आयताकार, ३/४-१ इञ्च लम्बी तथा प्रायः दो बीजों से युक्त होती है। बीज—गोल, नोकदार, ०.२-०.४ इञ्च व्यास के, चिकने या सिकुड़नदार, भूरे, पीले या श्वेत रंग के होते हैं। पत्तों पर रहने वाले रोम ग्रन्थियों से एक प्रकार का अम्ल स्राव होता है जिसका पहले हरीतक्यादि वर्ग (पृ० १६२) में 'चणकाम्ल' के नाम से वर्णन किया जा चुका है। चने के रंग तथा नाप के अनुसार कई भेद किये गए हैं जिनमें मुख्य दो वर्ग हैं। प्रथम में सभी रंगों के चने आते हैं। दूसरे में काबुली आते हैं जो सफेद एवं बहुत बड़े होते हैं। कुछ विद्वानों ने काबुली के क्षुप को भिन्न जाति (Species) का माना है। रासायनिक संगठन—चने में प्रोटीन १७.१, स्नेह ५.३, खनिज २.७, रेशा ३.९, कार्बोहाइड्रेट ६१.२, खटिक, फास्फोरस, विटामिन 'ए' तथा बी १ एवं आर्द्रता ९.८ रहती है। छिलके निकाले भुने हुये चने में प्रोटीन २२.५, स्नेह ५.२, खनिज २.२, रेशा, कार्बोहाइड्रेट ५८.९, खटिक, फास्फोरस एवं आर्द्रता ११.२ रहती है। गुण और प्रयोग—चने का विभिन्न रूपों आहार द्रव्य के रूप में उपयोग किया जाता है। अथ कलायः (मटर) । तस्य नामगुणानाह कलायो वर्तुलः प्रोक्तः सतीनश्च हरेणुकः । कलायो मधुरः स्वादुः पाके रूक्षश्च शीतलः ।।५७।। मटर के संस्कृत नाम—कलाय, वर्तुल, सतीन तथा हरेणुक ये सब हैं। मटर—मधुर रसयुक्त, विपाक में भी मधुर, रूक्ष तथा शीतल होता है। इसके साग का वर्णन आगे शाकवर्ग में दिया हुआ है। [५७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ८०३ १२. मटर हिं०-मटर, मट्टर । बं०-मटर । म०-वाटाणे । गु०-मटाणा, वटाणा । क०-वटाणि । ते०-गुंडुसानगलु । ता०-पटाणी । फा०-जलबान, कसंग । अ०-खलज, हुब्बुल बकर । अं०-Field Pea (फील्ड पी); Garden Pea (गार्डन् पी) । ले०-Pisum sativum Linn. (पाइसम् सॅटिवम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । मटर-एक प्रसिद्ध खाद्य अन्न प्रायः सब प्रान्तों में प्रतिवर्ष बोया जाता है । इसका क्षुप-वर्षायु तथा सूत्रों के द्वारा आरोहणशील होता है । पत्ते-पक्षवत्, पत्रक १ से ३ जोड़े, अंतिम सूत्रों में परिवर्तित तथा पत्राधार फूला हुआ होता है । पुष्प-अनियमितकार द्विलिंगी एवं अपने वर्गविशिष्ट स्वरूप का होता है । फली-अनेक बीजों से युक्त, चिपटी, लम्बी तथा अग्र पर कुछ टेढ़ी नोकदार होती है । इसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं । रासायनिक संगठन- इसमें प्रोटीन २३, कार्बोहाइड्रेट ५४, स्नेह १, रेशा ५ एवं राख २ भाग रहती है । इसमें ट्राइगोनेल्लीन (Trigonelline) नामक क्षाराभ पाया जाता है । परिपक्व बीजों के तेल में लैंगिक हारमोन विरोधी गुण रहता है । इससे पौरुष हारमोन निष्क्रिय होकर वन्ध्यत्व प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग-कच्चे मटर से दस्त होते हैं । आहार में इसको अन्न की तरह व्यवहार में लाते हैं । अथ त्रिपुटः (खेसारी) । तस्य नामगुणानाह त्रिपुटः खण्डिकोऽपि स्यात्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । त्रिपुटो मधुरस्तिक्तस्तुवरो रूक्षणो भृशम् ।।५८।। कफपित्तहरो रुच्यो ग्राहकः शीतलस्तथा । किन्तु खञ्जत्वपङ्गुत्वकारी वातातिकोपनः ।।५९।। खेसारी-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, अत्यन्त रूक्ष, रुचिकारक, ग्राही, शीतल एवम् कफ तथा पित्त को नष्ट करनेवाली होती है और सेवन करने से लँगड़ा तथा पंगुला बना देने वाली और वायु को अत्यन्त कुपित करनेवाली होती है । [५८-५९] १३. खेसारी हिं०-खेसारी, खिसारी, कसूर, मटरभेद । बं०-खेसारी । म०-लाग । गु०-लांग । फा०-मासंग । अ०- इवुल बकर, खलज । अं०-Chickling Vetch (चिलिंग वेच) । ले०-Lathyrus sativus Linn. (लेथीरस् सेटीवस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है और उत्तर भारत में अधिक उत्पन्न होती है । इसकी शाखायें पंखदार होती हैं । पत्ते-पक्षवत् तथा अग्र २ या ३ सूत्रों में विभाजित रहते हैं । पत्रक पतले, १-२ १/२ इञ्च लम्बे, रेखाकार- भालाकार, लम्बाग्र एवं संख्या में २-४ रहते हैं । फूल-नीलापन युक्त लाल या श्वेत होते हैं । फलियाँ-१-१॥ इञ्च लम्बी, एक किनारे पर पंखदार तथा ४ से ५ बीजों से युक्त होती हैं । अकाल के समय गरीब इसकी दाल खाते हैं । इसका चारे के रूप में उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन-बीजों में एक विषैला पदार्थ होता है । गुण और प्रयोग-बीजों का तेल तीव्र तथा हानिकारक विरेचक होता है । इसकी दाल खाने से लकवा जैसा लॉथिरिज्म (Lathyrism) नामक रोग होता है । यह रोग जानवरों को भी होता है । कुछ विद्वानों के मत से इसके साथ मिले अन्य द्रव्यों के कारण यह रोग होता है ।
८०४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कुलत्थः (कुलथी) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुलत्थिका कुलत्थश्च कत्थन्ते तद्गुणा अथ ।।६०।। कुलत्थः कटुकः पाके कषायः पित्तरक्तकृत् । लघुर्विदाही वीर्योष्णः श्वासकासकफानिलान् ।।६१।। हन्ति हिक्काऽश्मरीशुक्रदाहानाहान् सपीनसान् । स्वेदसंग्राहको मेदोज्वरकृमिहरः सरः ।।६२।। कुलथी के संस्कृत नाम—कुलत्थिका तथा कुलत्थ ये दो हैं । कुलथी—कषायरसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, पित्त तथा रुधिर विकार को करने वाली, लघु, विदाही, उष्णवीर्य, पसीने को रोकने वाली, सारक एवम्—श्वास, कास, कफ, वायु, हिचकी, पथरी, शुक्र, दाह, आनाह (अफरा), पीनस, मेद, ज्वर तथा क्रिमि को दूर करने वाली होती है । [६०-६२] १४. कुलथी हिं०—कुरथी, कुलथी । म०—कुलीथ । क०—हूरूली । ते०—उलवलु । गु०—कुलथी । ता०—कोललु । फा०— किल्लत, माशाहिन्दी, इब्बुलक्कल । अं०—Horse gram (हॉर्स ग्राम) । ले०—Dolichos biflorus Linn. (डोलिकॉस् बाईफ्लोरस्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । कुलथी—इस देश में प्रायः सर्वत्र होती है। दक्षिण में जानवरों को खिलाने के लिये इसकी बहुत खेती की जाती है। इसका क्षुप—झाड़ीदार, आरोहणशील, पतला, धूसर, रोमश, १२ से १८ इञ्च ऊँचा एवं मूल से अनेक पतली शाखाओं से युक्त होता है । पत्ते—त्रिपत्रक एवं २ इञ्च लम्बे वृन्तयुक्त होते हैं । पत्रक—पीताभ हरे, १ ३/८ इञ्च लम्बे, तिर्यक् अंडाकार एवं अग्र तीक्ष्ण और रोमश होता है । पुष्प—छोटे पीताभ श्वेत रंग के आते हैं । फली—चिपटी, १ १/२-२ इञ्च लम्बी, १/४ इञ्च चौड़ी तथा कुछ टेढ़ी होती है । बीज—५-६ हलके लाल, काले चितकबरे, चिपटे, १/८-१/४ इञ्च बड़े एवं चमकीले होते हैं । इसको विशेष रूप से घोड़ों को खिलाते हैं । इसको बिना दाल बनाये ही उपयोग में लाते हैं । गरीब इसको खाते हैं । रासायनिक संगठन—बीजों में प्रोटीन २२, स्नेह, ०.५, खनिज ३.१, रेशा ५.३, कार्बोहाइड्रेट ५७.३, खटिक ०.२८, फास्फोरस ०.३९%, लोह ७.६ मि० ग्रा०, निकोटिनिक् ॲसिड १.५ मि० ग्रा० एवं विटामिन 'ए' ११९ एकक प्रति १०० ग्राम में पाया जाता है । इसमें यूरिएस् (Urease) काफी होता है । गुण और प्रयोग—यह उष्ण, मूत्रल, वात-कफनाशक, मेदहर एवं अश्मरीघ्न है । इसका क्वाथ अश्मरी, श्वास, कास एवं श्वेतप्रदर में दिया जाता है । मात्रा—३ से ६ माशा । अथ तिलः । तस्य तद्भेदानां च गुणानाह तिलः कृष्णः सितो रक्तः सवन्योऽल्पतिलः स्मृतः । तिलो रसे कटुस्तिक्तो मधुरस्तुवरो गुरुः ।।६३।। विपाके कटुकः स्वादुः स्निग्धोष्णः कफपित्तनुत् । बल्यः केश्यो हिमस्पर्शस्त्वच्यः स्तन्यो व्रणे हितः ।।६४।। दन्त्योऽल्पमूत्रकृद् ग्राही वातघ्नोऽग्निमतिप्रदः । कृष्णः श्रेष्ठतमस्तेषु शुक्रलो मध्यमः सितः ।। अन्ये हीनतरः प्रोक्तास्तज्ज्ञै रक्तादयस्तिलाः ।।६५।। तिल का संस्कृत नाम—तिल ही है । भेद—काले, सफेद तथा लाल रङ्गों के भेद से तिल तीन प्रकार के होते हैं । जो तिल जङ्गलों में होता है वह वन्यतिल और अल्पतिल नाम से प्रसिद्ध है ।
धान्यवर्गः ८०५ तिल-कटु, तिक्त, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में कटुरस युक्त, स्वादिष्ट, गुरु, स्निग्ध, उष्ण, कफ तथा पित्तनाशक, बलकारक, केशों के लिये हितकर, स्पर्श में शीतल, त्वचा के लिये हितकर, दुग्धवर्धक, व्रण में लाभ पहुँचाने वाला, दांतों के विकारों को दूर करनेवाला, थोड़ा मूत्रकारक, ग्राही, वातनाशक, जठराग्नि तथा बुद्धि को बढ़ाने वाला होता है । तिलों में काला तिल—वीर्यवर्धक तथा सर्वोत्तम होता है । सफेद तिल—गुणों में मध्यम होता है । इससे अन्य जो लाल वगैरह तिल हैं वे गुणों अत्यन्त हीन हैं ऐसा निघण्टु के विद्वानों का मत है । [६३-६५] १५. तिल हिं०-तिल, तील, तिली । बं.-तिलगाछ । म०-तील । गु०-तल । क०-बुल्लेल्लु । ते०-नुव्वुलु । ता०-एल्लु । फा०-कुंजद । अ०-सिमासिम, बजरुलखस खासुलवरी । अं०-Gingelli (जिंजेल्ली), Sesame (सीसेम) । ले०-Sesamum indicum Linn. (सिमेमम्, इंडिकम्) ; Fam. Pedaliaceae (पेडालिएसी) । इसकी प्रायः सभी प्रान्तों में खेती की जाती है । इसका क्षुप-३१/२-४१/२ फीट ऊँचा, काण्ड चौपहल एवं अनेक शाखायुक्त होता है । पत्ते-नीचे से ऊपर विभिन्न प्रकार के, दन्तुर या अखण्ड होते हैं । पुष्प-विभिन्न रंगों के, श्वेत से लेकर गहरे बैंगनी रंग के एवं नलिकाकार द्वयोष्ठ होते हैं । फली-११/२ से २ इञ्च लम्बी, करीब १/२-१ इञ्च गोलाई में एवं अनेक बीजों से युक्त होती है । बीज-विभिन्न प्रकार के अनुसार श्वेत, मन्दश्वेत, हलके भूरे, गहरे भूरे या काले रंग के हुआ करते हैं । ये चिपटे, अंडाकार तथा एक इञ्च की लम्बाई में ६ से ८ तथा चौड़ाई में १० से १२ आते हैं । विभिन्न ऋतुओं में बोने के अनुसार इनके भेद हुआ करते हैं । रासायनिक संगठन-इनमें प्रकार तथा स्थानभेद से तेल की मात्रा ३७-५७% एवं कार्बोहाइड्रेट १४ से २२% एवं प्रोटीन २१ से २६% पाया जाता है । काले तिल में प्रोटीन अधिक तथा कार्बोहाइड्रेट कम रहता है । भूरे की अपेक्षा श्वेत में प्रोटीन अधिक पाया जाता है । ताजे पत्तों में काफी लुआब रहता है । गुण और प्रयोग-तिल का तथा इसके तेल का उपयोग नित्य के व्यवहार में किया जाता है । यह स्नेहन, आनुलोमिक, मूत्रजनन, बाजीकर, आर्तवजनन, स्तन्यजनन, बल्य, व्रणशोधन रोपण तथा केशवर्धन है । (१) अर्श में इसको मक्खन के साथ खिलाते हैं तथा पीसकर गरमकर इससे सेंकते हैं । (२) मछली खाकर अजीर्ण हो तो इसके पंचांग का क्षार देते हैं । उदर शूल में तिल को सुगंधि पदार्थ के साथ पीसकर गोली बनाकर देते हैं । तिल से दाँत मजबूत रहते हैं । (३) खाँसी में तिल का क्वाथ, चीनी मिलाकर पिलाते हैं । सूखी खाँसी में ताजे पत्तों का हिम थोड़ा-थोड़ा पिलाते हैं । (४) मूत्राश्मरी में तिलक्षार दूध तथा शहद के साथ देते हैं । (५) इसका गर्भाशय पर संकोचक प्रभाव होने से अनार्तव इत्यादि में इसका उपयोग करते हैं । (६) इसका पुल्टिस व्रण पर बाँधते हैं । तेल का भी उपयोग व्रण पर लगाने के लिये करते हैं । मात्रा-बीज १ से २ तोला; पंचांगक्षार ५ से १२ रत्ती । अथातसी (तीसी) । तस्या नामगुणानाह अतसी नीलपुष्पी च पार्वती स्यादुमा क्षुमा ।।६६।। अतसी मधुरा तिक्ता स्निग्धा पाके कटुर्गुरुः । उष्णा दृक्छुकवातघ्नी कफपित्तविनाशिनी ।।६७।। तीसी के संस्कृत नाम-अतसी, नीलपुष्पी, पार्वती, उमा तथा क्षुमा ये सब हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८०६ भावप्रकाशनिघण्टुः तीसी-मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, स्निग्ध, विपाक में कटुरसयुक्त, गुरु, उष्ण एवम् नेत्रों की शक्ति, शुक्र, वात, कफ तथा पित्त को दूर करनेवाली होती है ।।६६-६७।। १६. तीसी हिं०-तीसी, तिसी, अलसी, मसीना । बं०-तिसी, मसीना । म०-जवंस, अठशी । गु०-अलशी । क०- अगसि । ते०-अविसि । ता०-अलिविराई । फा०-तुख्मे कृतान, वजुरग, वजुर्ग । अ०-बजरूल कतान, बजरूल कनान, वजरुलकतां । अं०-Common Flax (कामन फ्लेक्स), Linseed (लिन्सीड) ले०-Linum usitatissimum Linn. (लीनम् यूसिटेटिसिमम्) Fam. Linaceae (लिनेसी) । तीसी-प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में बोई जाती है । इसका पौधा-१।।-२ फीट ऊँचा होता है । पत्ते-छोटे, रेखाकार या भालाकार एवं ३ शिराओं से युक्त होते हैं । फूल-नीले रंग के घंटाकार; फल-गोल घुंडी सा ऊपर को नोकीला एवं ५ कोषयुक्त होता है । बीज-प्रत्येक कोष में १० के करीब, चिपटे, चिकने, गहरे भूरे एवं चमकीले होते हैं । पीले एवं श्वेत रंग के बीजों के भेद मध्यभारत तथा राजपुताना में होते हैं । बड़े में अधिक मात्रा में तथा कुछ हलके रंग का निकलता है । भूरे में भी छोटे-बड़े भेद होते हैं । बड़े में तेल अधिक रहता है । इसके बीज एवं तेल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । तेल का वार्निश, पेण्ट आदि में उपयोग करते हैं । कांड से लिनेन (Linen) तन्तु बनाते हैं जिसके कपड़े बनाये जाते हैं । रासायनिक संगठन-तीसी में तेल ३८ से ४५% रहता है । घानी से निकालने में २५-३०% ही प्राप्त होता है । इसमें प्रोटीन २०-२५%, पिच्छिल द्रव्य ६%, मोम, राल, फास्फोट, शर्करा १८% एवं अल्प ग्लाइकोसाइड, लिनामेरिन (Linamarin) रहता है । इसके पुष्प एवं अपक्व बीजों में हाइड्रोसाइनिक् अम्ल ०.६९% तक एवं क्षाराभ लिपरीन (Liparine) रहता है । गुण और प्रयोग-इसके बीज, स्नेहन, मार्दवकर, बल्य, वेदनास्थापन, मूत्रजनन एवं वातहर हैं । तेल विरेचन एवं व्रणरोपण है । (१) इसके तेल को या बीजों को सौम्यविरेचक रूप में देते हैं । (२) बीजों को कूटकर, पानी मिलाकर, पकाकर, पुल्टिस के रूप में शोथ आदि पर बाँधने से नवीन शोथ दब जाता है या पककर जल्दी फूट जाता है । इसका तेल तथा चूने का पानी मिला जले पर लगाते हैं । (३) इसके बीजों का फाँट खाँसी में देते हैं । मात्रा-तेल २ से ४ ड्राम; बीज १ बड़ा चम्मच । अथ तुवरी ("तोरी, तोडिस" इति लोके) । तस्य गुणानाह तुवरी ग्राहिणी प्रोक्ता लघ्वी कफविषास्रजित् । तीक्ष्णोष्णा वह्निवा कण्डूकुष्ठकोष्ठक्रिमिप्रणुत् ।।६८।। तुवरी (जिसे लोक में तोरी या तोडिस कहते हैं) के गुण—तोरी-ग्राही, लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, जठराग्निवर्धक एवम्-कफ, विष, रक्तविकार, खुजली, कुष्ठ तथा कोष्ठस्थित क्रिमि को दूर करनेवाली होती है । [६८] १७. तोरी हिं०-तोरी, तीरा, लाही, तारा, मिरा, सेओहा, तिहरा । पं०-असू, तारा । बं०-सेतसरिश । अं०-Rocket Salad (राकेट सलाद) । ले०-Eruca sativa Mill. (एरुका सटाइवा) । Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी) ।
धान्यवर्गः ८०७ यह पश्चिम हिमालय में १० हजार फीट की ऊँचाई तक होती है। उत्तरभारत में इसकी खेती की जाती है। पंजाब एवं अल्पमात्रा में उत्तर प्रदेश तथा ग्वालियर में शीतकालीन फसलों के साथ इसको बोते हैं। इसका क्षुप-सरसों के जैसा होता है। यह २ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-३ से ७ इञ्च लम्बे, मांसल, दन्तुर, आधे से अधिक पक्षवत् खण्डित एवं खण्ड प्रायः रेखाकार-आयताकार होते हैं। पुष्प-बड़े, श्वेताभ या पीताभ एवं बैंगनी शिराओं से युक्त होते हैं। फली-एक इञ्च लम्बी, सीधी, ऊपर की ओर उठी हुई एवं काण्ड से लगी हुई होती है। बीज- अनेक, छोटे, हल्के रक्ताभ भूरे, अंडोकार, चिकने एवं प्रत्येक कोष्ठ में दो कतारों में रहते हैं। राई, सरसों में इसकी मिलावट की जाती है। इसके तेल को लोग जलाने, खाने एवं मालिश इत्यादि के काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में २०% हल्के पीले रंग का, कुछ कड़वा एवं तीक्ष्ण गंध का तेल प्राप्त होता है। उत्तर प्रदेश के बीजों का तेल पंजाब की अपेक्षा कम तीक्ष्ण होता है। यह तेल ५, ६ महीने रखने से उसकी तीक्ष्णता कम हो जाती है। इसमें एक तीक्ष्ण गंध का उड़नशील तेल भी होता है जिसे चर्म पर लगाने से दाह होता है। गुण और प्रयोग-इसके नये पत्ते दीपन एवं मूत्रल होते हैं। इसके बीज सरसों की तरह प्रतिक्षोभक होते हैं। चर्मरोगों में तेल का उपयोग किया जाता है। कोमल पौधों का साग बनाते हैं। अथ सर्षपो रक्तः-पीतश्च (लाल सरसों और पीली सरसों)। तयोर्नामगुणानाह सर्षपः कटुकः स्नेहस्तुन्तुभश्च कदम्बकः । गौरस्तु सर्षपः प्राज्ञैः सिद्धार्थ इति कथ्यते ॥६९॥ सर्षपस्तु रसे पाके कटुः स्निग्धः सतिक्तकः । तीक्ष्णोष्णः कफवातघ्नो रक्तपित्ताग्निवर्धनः ॥७०॥ रक्षोहरो जयेत्कण्डूं कुष्ठकोष्ठक्रिमिग्रहान् । यथा रक्तस्तथा गौरः किन्तु गौरो वरो मतः ॥७१॥ सरसों (लाल सरसों) के संस्कृत नाम-सर्षप, कटुक, स्नेह, तुन्तुभ और कदम्बक ये सब हैं। सफेद सरसो (पीली सरसों) का संस्कृत नाम-गौर सर्षप और सिद्धार्थ है। सरसों-विपाक में कटुरस युक्त, स्निग्ध, कटु तथा तिक्त रसयुक्त तीक्ष्ण, उष्ण, कफ और वात का नाशक, रक्तपित्त तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाला, रक्षों की बाधा को दूर करनेवाला एवम् खुजली, कुष्ठ, कोष्ठस्थित क्रिमि तथा ग्रहबाधा को नष्ट करनेवाला होता है। सफेद सरसों, गुणों में यद्यपि लाल सरसों के समान ही है तथापि अपेक्षाकृत सफेद ही उत्तम होता है। सरसों के शाक का वर्णन आगे शाकवर्ग में दिया हुआ है। [६९-७१] १८. सरसों हिं०-सरसों, सरिसों, ससों। बं०-सरीसा। म०-शिरशी। गु०-शरशव, सरशव। क०-सासवे। ते०- आबालु। ता०-कुडुगु। फा०-सर्षक, सरशफ, सिपन्दान। अ०-उर्फे अबीयद, खर्दले अबयज, हुर्फ। अं०- Yellow Sarson (यलो सरसों); Indian Colza (इण्डियन् कोलझा)। ले०-Brassica campestris var. sarson Prain (ब्रासिका केम्पेस्ट्रिस् वेराइटी सरसों)। Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं पंजाब में यह अधिक होती है। इसका क्षुप-३ से ५ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-काण्ड की जड़ से सटे हुए, लम्बे, गहरे कटे किनारे वाले और चिकने होते हैं। फूल-अत्यन्त सुहाबने पीले रंग के आते हैं। फलियाँ-२-३ इञ्च लम्बी और गोल होती हैं। इनमें से जो पीले रंग के बीज निकलते हैं उन्हीं को सरसों कहते हैं। इसके कई प्रकार पाये जाते हैं। रंग भेद से पीला तथा भूरा, फली में के कोष्ठ की संख्यानुसार (२, ३, ४), फली की काण्ड के साथ की स्थिति, लटकी हुई या सीधी खड़ी के अनुसार ये भेद होते हैं। इससे 'सरसों का तेल' निकालते हैं। सरसों के खाने के तेल में इसकी अन्य जातियों के बीजों का तेल भी मिला रहता है।
८०८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन- इसमें ३५ से ४८% स्थिर तैल, ०.२७% उड़नशील तैल एवं प्रोटीन २०% एवं एरुसिक् एसिड (Erucic acid) रहता है। गुण और प्रयोग- इसका तेल खाने एवं मालिश के काम आता है। आमवातादि में कपूर मिलाकर इससे मालिश की जाती है। गरम जल में इसको मिलाकर पुलटिस के रूप में इसका प्रयोग करते हैं। इसमें का उड़नशील तैल प्रतिक्षोभक होता है एवं इसको चर्म पर लगाने से फोड़े आ सकते हैं। अथ राजिका कृष्णराजिका च (राई, कृष्णराई)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह राजीतु राजिका तीक्ष्णगन्धा क्षुज्जनिकाऽऽसुरी। क्षवः क्षुताभिजनकः कृष्णीका कृष्णसर्षपः ।।७२।। राजिका कफपित्तघ्नी तीक्ष्णोष्णा रक्तपित्तकृत्। किञ्चित् रूक्षाऽग्निदा कण्डूकुष्ठकोष्ठक्रिमीन्हरेत् ।। अतितीक्ष्णा विशेषेण तद्वत्कृष्णाऽपि राजिका ।।७३।। राई के संस्कृत नाम- राजी, राजिका, तीक्ष्णगन्धा, क्षुज्जनिका तथा आसुरी ये सब हैं। काली राई के संस्कृत नाम- क्षव, क्षुताभिजनक, कृष्णिका तथा कृष्णसर्षप ये सब हैं। राई- कफ तथा पित्तनाशक, तीक्ष्ण, उष्ण, रक्तपित्तकारक, किञ्चित् रूक्ष, जठराग्निवर्धक एवम् खुजली, कुष्ठ तथा कोष्ठस्थित क्रिमि को दूर करनेवाली होती है। काली राई- यह वैसे तो गुणों में राई ही के समान होती है किन्तु उसकी अपेक्षा विशेषतः अत्यन्त तीक्ष्ण होती है। [७२-७३] १९. राई हिं०- राई, लाल राई, माकड़ा राई। बं०- राइ, सरिषा। म०- राई। गु०- राई। क०- सासि। ते०- आवाल्। ता०- कडुगु। अ०- खरदल, खर्दल। फा०- सर्शप। अं०- Indian Mustard (इंडियन मस्टर्ड)। ले०- Brassica juncea Linn. (ब्रासीका जून्सिआ)। Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। राई- सरसों के समान खेतों में बोई जाती है। क्षुप- सरसों के समान होता है। पत्ते- साधारण, एकान्तर, मूलीय एवं काण्डीय तथा गहरे कटे हुये होते हैं। पुष्प- चमकीले पीले होते हैं। फली- पतली एवं आधार से फट जाती है। बीज- रक्ताभ भूरे, सरसों से छोटे एवं सिकुड़नदार होते हैं। इनसे भी तेल निकाला जाता है। एक बनारसी राई और होती है जिसका ले० नाम Brassica nigra Linn. (ब्रासिका नाइग्रा) है। इसके बीजों पर सूक्ष्म जाली दिखलाई देती है। इनसे तेल नहीं निकालते किन्तु चटनी-अचार इत्यादि में इसे डालते हैं। रासायनिक संगठन- राई में तेल ३५.५, प्रोटीन २४.६, रेशा ८ एवं राख ५.३ भाग रहती है। इसका तेल अधिक स्वच्छ तथा सरसों के जैसी गंध इसमें नहीं होती। गुण और प्रयोग- कम मात्रा में यह दीपन, पाचन, उत्तेजक तथा स्वेदजनन है। अधिक मात्रा अधिक देर रखने से फोड़े भी हो जाते हैं। इसे एक घंटे से अधिक कदापि न रखे। प्रतिश्याय में इसका तेल नाक एवं पावों पर मलते हैं। अथ क्षुद्रधान्यम्। तस्य नामगुणानाह क्षुद्रधान्यं कुधान्यं च तृणधान्यमिति स्मृतम्। क्षुद्रधान्यमनुष्णं स्यात्कषायं लघु लेखनम् ।।७४।। मधुरं कटुकं पाके रूक्षं चक्लेदशोषकम्। वातकृद् बद्धविट्कं च पित्तरक्तकफापहम् ।।७५।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
धान्यवर्गः ८०९ क्षुद्रधान्य के संस्कृत नाम-क्षुद्रधान्य, कुधान्य तथा तृणधान्य ये सब हैं। क्षुद्रधान्य-किञ्चित् उष्ण, कषाय तथा मधुर रस युक्त, लघु, लेखन, विपाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, क्लेद (आर्द्रता) को सुखाने वाला, वातकारक, मल को बाँधने वाला एवम्-पित्त, रक्तविकार तथा कफ का नाशक होता है। [७४-७५] अथ कङ्गुः (कङ्गुनी) तस्य नामभेदगुणानाह स्त्रियां कङ्गुप्रियङ्गू द्वे कृष्णारक्ता सिता तथा। पीता चतुर्विधा कङ्गुस्तासां पीता वरा स्मृता ।।७६।। कङ्गुस्तु भग्नसन्धानवातकृद् बृंहणी गुरुः । रूक्षा श्लेष्महराऽतीव वाजिनां गुणकृद् भृशम् ।।७७।। कङ्गुनी का संस्कृत नाम-कङ्गु तथा प्रियङ्गु (ये दोनों स्त्रीलिङ्गी हैं) हैं। भेद-काली, लाल, सफेद तथा पीली इन भेदों से कङ्गुनी ४ प्रकार की होती है। इनमें से पीली कंगुनी ही सर्वोत्तम होती है। कंगुनी-टूटी हुई अस्थियों को जोड़ने वाली, वातकारक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक), गुरु, रूक्ष, अत्यन्त कफनाशक और घोड़ों के लिये विशेष रूप से गुण करनेवाली होती है। [७६-७७] २०. कंगुनी हिं०-कंगुनी, कगनी, टंगुनी। बं०-कांगुनी। म०-कांग। ता०-तेनई। गु०-कांग। क०-नवणे। ते०- कोरलु। फा०-गल, अर्जुन। अ०-दुखुन। ले०-Setaria italica Beauv. (सेटारिया इटेलिका)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)। कंगुनी की खेती प्रायः सब प्रान्तों में होती है। यह ६ हजार फीट की ऊँचाई तक हो सकने के कारण हिमालय के तराई प्रदेश में भी इसे लोग बोते हैं। इसकी सालभर तक पैदावार की जा सकती है तथा यह १०० दिन में तैयार हो जाती है। अधिकतर वर्षा के प्रारम्भ में इसे बोते हैं। इसका क्षुप-३-३ १/२ फीट ऊँचा, पतला एवं बाल के बोझ से झुका हुआ होता है। पत्ते-१२-१८ इञ्च लम्बे, १/२ इञ्च चौड़े, हल्के हरे एवं रेखाकार भालाकार होते हैं। पुष्पव्यूह-अवृन्त काण्डज (Spike-स्पाइक्), ६-१२ इञ्च लम्बा, ३/४-१ १/२ इञ्च व्यास का तथा शुकयुक्त होता है। बाल-बाजरे के समान किन्तु उससे छोटे प्रायः ६ इञ्च लम्बे एवं १/२-१ १/२ इञ्च व्यास के होते हैं। भेद के अनुसार ये लम्बे भी होते हैं। धान्य विभिन्न रंगों के हुआ करते हैं। ये चिकने चमकीले, पीले, श्वेत, मलाई के रंग के नारंग रक्त, बैंगनी, काले, हरिताभ श्वेत एवं हल्के पीत रंगों के होते हैं। बालों में से जो बारीक दाने निकलते हैं। उन्हीं को कंगुनी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें प्रोटीन ११, स्नेह ४, कार्बोहाइड्रेट ७०, रेशा ५ एवं राख ३ भाग रहती है। इसमें एक विषैला ग्लूकोसाइड तथा तैलीय क्षाराभ पाया गया है। गुण और प्रयोग-चावल की तरह इसे लोग खाते हैं। प्रसवपीड़ा को कम करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। आमवात में इसका लेप किया जाता है। अथ चीनाकः (चीना) तस्य नामगुणानाह चीनाकः काककङ्गुश्च सुश्लक्ष्णः श्लक्ष्णकः स्मृतः । चीनाकः कङ्गुभेदोऽस्ति स ज्ञेयः कङ्गुवद् गुणैः ।।७८।। चीना के संस्कृत नाम-चीनाक, काककंगु, सुश्लक्ष्ण, श्लक्ष्णक तथा कंगुभेद ये सब हैं। चीना-कङ्गुनी का भेद है अतः इसके भी गुण कंगुनी के समान ही समझने चाहिये। [७८]