भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 871, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 871

८२० भावप्रकाशनिघण्टुः पालक के संस्कृत नाम-पलक्या, वास्तुकाकारा, छुरिका तथा चीरितच्छदा ये सब हैं। पालक-वातजनक, शीतल, कफकारक, मलभेदक, गुरु, विष्टम्भ उत्पन्न करने वाला-एवम् मद (नशा), श्वास, पित्त, रक्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। ९. पालक हिं०-पालक शाक, पला। बं०-पालंग शाक। म०-पालख, पालक। गु०-पालखनी भाजी। क०- पालक्य। ता०-वसैलिक्किर्रै। ते०-मट्टरवच्चलि। अं०-Spsinach (स्पाइर्नक्)। ले०-Spinacia oleracea Linn. (स्पाइनेसिया ओलेरेसिया)। Fam. Chenopodiaceae (चिनोपोडिएसी)। सभी प्रान्तों में इसको लगाया जाता है। इसका क्षुप-करीब १ फूट ऊँचा रहता है। काण्ड-पोला तथा कोणयुक्त रहता है। पत्ते-मोटे, मांसल, हरे, कुछ त्रिकोणाकार एवं लम्बेकृत से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे गुच्छों में आते हैं। पुंजाति के क्षुप में पुष्प काण्ड के अंत में एवं स्त्रीजाति के पुष्प पत्र कोण में आते हैं। इसमें एक प्रकार गोल पत्तों एवं चिकने बीजों वाला होता है। प्रथम में बीज काँटेदार होते हैं। इसके बीज एवं पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें आयोडीन (Iodine), लेसिथिन् (Lecithin), कॅरोटिन् (Carotin), आक्जेलिक ॲसिड (Oxalic acid) एवं आर्सेनिकू (Arsenic) होता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, मूत्रजनन, रोचन, शोथघ्न एवं दाहशामक है। (१) पंचांग का क्वाथ शोथयुक्त ज्वरों में देते हैं। (२) आंत्रविकारों में इसका साग उपयोगी है। (३) अश्मरी में पत्तों का रस का क्वाथ पिलाते हैं। (४) इसके बीज सारक एवं शीतल हैं तथा यकृतशोथ, कामला एवं श्वासकृच्छ्र में दिये जाते हैं। अथ कालशाकम् (नाडीका शाक) । तस्या नामगुणानाह नाडिकं कालशाकं च श्राद्धशाकं च कालकम्। कालशाकं सरं रुच्यं वातकृत्कफशोथहृत्। बल्यं रुचिकरं मेध्यं रक्तपित्तहरं हिमम् ।।१६।। नाडीका शाक के संस्कृत नाम-नाडिक, कालशाक, श्राद्धशाक और कालक ये सब हैं। नाडीका शाक-सारक, रोचक, वातकारक, कफ तथा शोथ नाशक, बलदायक, रुचि को उत्पन्न करने वाला, मेधा के लिये हितकर अथवा पवित्र, शीतल एवम्-रक्तपित्तनाशक है। [१७] १०. कालशाक (नाड़ी का शाक) हिं०-नरिचा, नाड़ी का शाक, तीता पाट। बं०-नालिता शाक, तितपाट, चिनल्तेपात, नची। म०-चोंचे, सण। गु०-छूँछ। ले०-Corchorus capsularis Linn. (कोकोरस कॅपसुलेरिस्)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। यह गरम प्रदेशों में अधिक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-३-४ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, आध से पौन इञ्च चौड़े; प्रासवत् अथवा आयताकार, लम्बाग्र एवं आरावत् दन्तुर होते हैं। फूल-पीले रंग के आते हैं। फल-गोलाकार पाँच भाग वाले तथा पृष्ठ पर दानेदार होते हैं। बीज-ताम्ररंग के होते हैं। इसके कृषित भेद में यह १०।१२ फीट तक ऊँचा होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA

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