भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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शाकवर्गः ८१९ काँटे वाली, बिना काँटे वाली, हरे पत्ते की, लाल पत्ते की और नीलापन युक्त लाल अथवा लालीयुक्त नीले पत्ते की, इस प्रकार चौलाई कई प्रकार की होती है। रासायनिक संगठन-इसमें काफी पोषक तत्त्व रहते हैं। इसमें प्रोटीन ३, स्नेह ०.३, कार्बोहाइड्रेट ८, खनिज ३.६, खटिक ०.८, लोह २३ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम में रहता है। गुण और प्रयोग-यह शीतल, मूत्रजनन, स्नेहन एवं गर्भाशय के लिये वेदनास्थापन तथा शक्तिदायक और स्तन्यजनन है। (१) इसकी जड़ का क्वाथ मुलेठी तथा अपामार्ग के साथ सोजाक में दिया जाता है। (२) रक्तप्रदर के लिये इसका बहुत उपयोग करते हैं। इसमें इसके मूल के साथ आँवला, अशोक की छाल एवं दारुहल्दी का उपयोग किया जाता है। इससे पीड़ा भी कम होती है तथा रक्तस्राव बंद होता है। श्वेतप्रदर में इसके साथ हिराबोल देते हैं। इससे गर्भपात की आदत दूर होती है। मासिक के काल के समय गर्भिणी को इसे ३-४ दिन देते हैं। (३) स्तन्यवृद्धि के लिये इसके पंचांग को अरहर की दाल के साथ पकाकर देते हैं। जानवरों में भी इसका उपयोग करते हैं। (४) गाँठ, फोड़े आदि जल्दी पकाने के लिये मूल का लेप करते हैं। विसर्प तथा अन्य दाहयुक्त चर्मरोग में दाहशांति के लिये इसके पत्तों को पीसकर लेप करते हैं। अथ पानीयतण्डुलीयम् (जलचौलाई) । (चौलाईभेदो जलतण्डुलीयं शास्त्रे कञ्झटमिति प्रसिद्धम्) । तस्य नामगुणानाह पानीयतण्डुलीयं तु कञ्झटं समुदाहृतम्। कञ्झटं तिक्तकं रक्तपित्तानिलहरं लघु ।।१४।। जल चौलाई (यह चौलाई का भेद है और शास्त्र में "कञ्झट" नाम से प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-पानीयतण्डुलीय, जलतण्डुलीय तथा कञ्झट ये सब हैं। जल चौलाई-तिक्त रस युक्त, लघु एवम्-रक्तपित्त तथा वायुदोष को नष्ट करने वाली होती है। [१४] ७. जलचौलाई यह भी अॅमॅरेन्थस् की जल के समीप होने वाली कोई जाति (Species) है। ८. रामदाना रामदाना-इस नाम के बीज इसकी एक जाति अँ. कॉडेटस् (A. caudatus Linn.) से प्राप्त होते हैं जो श्वेत या पीले एवं गोल मोटे किनारेदार होते हैं। इसके क्षुप-ऊँचे; पत्ते-लम्बे वृन्त युक्त, दीर्घवृत्ताभ; पुष्प-चमकीले पीत या गहरे रक्त लटकी हुई मंजरी में आते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में आक्जेलिक ॲसिड रहता है। गुण और प्रयोग-रामदाने में पौष्टिक तत्त्व रहते हैं। इसका पंचांग मूत्रल एवं रक्तशोधक है। इसे अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र में देते हैं। गण्डमाला में भी इसे देते हैं तथा बाहर से लेप करते हैं। अथ पलक्या (पालक) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पलक्या वास्तुकाकारा छुरिका चीरितच्छदा। पलक्या वातला शीता श्लेष्मला भेदिनी गुरुः । विष्टम्भिनी मदश्वासपित्तरक्तकफापहा ।।१५।।