भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ महाकोशातकी (नेनुआ) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह महाकोशातकी प्रोक्ता हस्तिघोषा महाफला ।। ६५ ।। धामार्गवो घोषकश्च हस्तिपर्णश्च स स्मृतः । महाकोशातकी स्निग्धा रक्तपित्तानिलापहा ।। ६६ ।। नेनुआ के संस्कृत नाम-महाकोशातकी, हस्तिघोषा, महाफला, धामार्गव, घोषक तथा हस्तिपर्ण ये सब हैं। नेनुआ-स्निग्ध एवम् रक्तपित्त तथा वायु को नष्ट करनेवाली होती है। [६४-६५] ४४. नेनुआ हिं०-नेनुआ, बड़ी तोरई, घिया तोरई । बं०-धुंधुल, धुन्दुल । म०-घोसाले गु०-गुलका । क०-अरहिरे तुप्पिरी । ता०-पिचुक्कु । ते०-नेति बीर, वीर काया । फा०-खियार । अं०-Sponge Gourd (स्पंज गोर्ड) । ले०-Luffa aegyptiaca Mill ex Hook f. (लूफा एजिप्टिएका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) । नेनुआ-एक बहुत प्रसिद्ध तरकारी प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होती है। इसकी लता विस्तार में फैलने वाली होती है। पत्ते-४-६ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, ५ या क्वचित् ७ भाग वाले होते हैं। फूल-पीले रंग के एवं हरी शिराओं से युक्त होते हैं। फल-५ से १२ इञ्च लम्बे एवं लम्बाई में धारीदार होते हैं। बीज-धूसर या काले, ३/८-१/४ इञ्च, चिपटे एवं अल्प पंखयुक्त होते हैं। इसके कृषित एवं वन्य भेद होते हैं। कृषित की सब्जी बनाई जाती है। इसके पके फल का जाला स्पंज की तरह काम में आता है। रासायनिक संगठन-इसके वन्य भेद में एक रक्तसंस्रावी सॅपोनिन तथा कड़वा विषैला पदार्थ रहता है। गुण और प्रयोग-वन्य भेद के पत्तों का रस तथा बीज विरेचक एवं वामक होते हैं। सभी प्रकार के व्रण पर इसके पत्र स्वरस से बनाया मलहम लाभदायक होता है। गाँठ आदि पर पत्तों के रस में गुड़, चूना या सिंदूर मिलाकर लेप करते हैं। अथ राजकोशातकी (तोरई) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह धामार्गवः पीतपुष्पो जालिनी कृतवेधना । राजकोशातकी चेति तथोक्ता राजिमत्फला ।। ६६ ।। राजकोशातकी शीता मधुरा कफवातकृत् । पित्तघ्नी दीपनी श्वासज्वरकासकृमिप्रणुत् ।। ६७ ।। तोरई के संस्कृत नाम-धामार्गव, पीतपुष्प, जालिनी, कृतवेधा, राजकोशातकी तथा राजिमत्फला ये सब हैं। तोरई-मधुर रसयुक्त, शीतल, अग्निदीपक, कफ तथा वातकारक एवम्-पित्त, श्वास, ज्वर, खांसी तथा कृमि को दूर करने वाली होती है । [६७-६८] ४५. तोरई हिं०-तोरई, तरोई, तुरई । बं०-घोषा लता, झिंगा । म०-डोडका, शिराले । गु०-तुरिया, घिसोडां, तुरया । क०-हीरे । ते०-बीर । ता०-मीर्कु । ले०-Luffa acutangula Roxb. (लूफा एक्यूटँग्युला) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) । तोरई-सभी प्रान्तों में रोपण की जाती है तथा वन्य भी पाई जाती है। इसकी लता और पत्ते नेनुआ के समान होते हैं। फूल-पीले किन्तु पुंकेशर ३ रहते हैं जबकि नेनुआ में ५ रहते हैं। फल-६ से १२ इञ्च लम्बे, आधार की तरफ संकुचित एवं १० धारीदार होते हैं। इसमें कभी-कभी कड़वे फल होते हैं। वह वास्तव में जंगली प्रकार नहीं है। जंगली प्रकार का स्वतंत्र आगे वर्णन किया गया है।