भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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रासायनिक संगठन-फल में कड़वा द्रव्य एवं बीजों में तैल रहता है। कुत्तों में इस तैल से वमन, विरेचन एवं लालास्राव की वृद्धि होती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज वामक तथा विरेचक हैं। इसका साग बनाते हैं। रोहा में इसके ताजे पत्तों का रस आंख में डालते हैं। पत्तों का लेप प्लीहा वृद्धि, अर्श एवं कुष्ठ में किया जाता है। ४६. जंगली तोरई हिं०-कड़वी तोरोई। ले०-लू. एक्यूटँग्युला प्रकार अमारा (L. acutangula (Linn.) Roxb. var. amara Clarke) । यह पश्चिम की तरफ अधिक होती है। इसके पत्ते तथा पुष्प तोरई के जैसे होते हैं। इसके पत्ते उसकी अपेक्षा छोटे, भूरे रंग के, नये कोमल अवस्था के उनकी तरह मुलायम किन्तु बाद में खुरदरे हो जाते हैं। फल-२ से ४ इञ्च लम्बा, १ से १ १/२ इञ्च मोटा, तोरई जैसा १० धारीदार किन्तु कड़वा होता है। इसके सभी अंग कड़वे होते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में तेल होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, वामक, विरेचक, मूत्रजनन, व्रणशोधन एवं विषघ्न है। अल्पमात्रा में इससे भूख बढ़ती है, शौच साफ होता है तथा उदर के सभी इन्द्रियों का कार्य ठीक होता हैं। अधिक मात्रा से वमन विरेचन होता है। (१) यकृत्, प्लीहा वृद्धि से उत्पन्न जलोदर में इसके पंचांग का टिंचर (१ : २०) लाभदायक है। (२) सड़ने लगे व्रण को धोने के लिये इसका हिम (दो फल + शीतजल १ पाइंट) उपयोग में लाते हैं। मात्रा-टिंचर १० से २० बूँद। अथ पटोलः (परबल) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पटोलः कुलकस्तिक्तः पाण्डुकः कर्कशच्छदः । राजीफलः पाण्डुफलो राजेयश्चामृतफलः ।।६८।। बीजगर्भः प्रतीकश्च कुष्ठहा कासभञ्जनः । पटोलं पाचनं हृद्यं वृष्यं लघ्वग्निदीपनम् ।।६९।। स्निग्धोष्णं हन्ति कासास्रज्वरदोषत्रयक्रिमीन् ।।७०।। परवर के संस्कृत नाम-पटोल, कुलक, तिक्त, पाण्डुक, कर्कशच्छद, राजीफल, पाण्डुफल, राजेय, अमृतफल, बीजगर्भ, प्रतीक, कुष्ठहा तथा कासभञ्जन ये सब हैं। परवर-पाचक, हृदय के लिये हितकर, वीर्यवर्धक, लघु, अग्निदीपक, स्निग्ध, उष्ण एवम्-खाँसी, रक्तविकार, ज्वर, त्रिदोष तथा क्रिमि को नष्ट करने वाला होता है। [६८-७०] अथ पटोलस्य मूल-नाल-पत्र-फलानां गुणानाह पटोलस्य भवेन्मूलं विरेचनकरं सुखात् ।।७१।। नालं श्लेष्महरं पत्रं पित्तहारी फलं पुनः । दोषत्रयहरं प्रोक्तं तद्वत्तिक्ता पटोलिका ।।७२।। परवर की जड़-सुखपूर्वक विरेचन करने वाली होती है। परवर की डंडी (नाल)-कफनाशक है। परवर के पत्ते-पित्तनाशक होते हैं। परवल का फल-त्रिदोषनाशक होता है। कड़वे परवर के भी गुण पूर्वोक्त परवर की भाँति ही होते हैं। संस्कृत में इसे "पटोलिका" कहते हैं। यह तिक्तरसयुक्त होती है। [७१-७२]