भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३८ भावप्रकाशनिघण्टुः ४७. परवल हिं०-परवर, परवल, परोर, परोरा । बं०-पटोल, पलता । म०-परवल । क०-पडवल । ता०-पुड़लै । ते०-पोटल, आडर । गु०-पटोल । ले०-Trichosanthes dioica Roxb. (ट्राइकोसेनथिस डायोइका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । यह उत्तर भारत के मैदानी प्रदेश में तथा आसाम एवं पूर्वबंगाल तक होता है । इसकी खेती भी की जाती है । इसकी लता होती है । काण्ड रोमश होते हैं । पत्ते-२ × ३ इञ्च बड़े, अंडाकार, आयताकार, हृदयाकार, तीक्ष्णाग्र, लहरदार दन्तुर एवं रूखे होते हैं । फूल-सफेद रंग के आते हैं । फल-२-३ इञ्च लम्बे, आयताकार या गोलाभ और पकने पर नारंग रक्त हो जाते हैं । इसका एक वन्य प्रकार होता है वह कड़वा होता है । कृषित के फल साग के लिये काम में लाये जाते हैं । चिकित्सा में वन्य के पंचांग का उपयोग करते हैं । उपर्युक्त वन्य प्रकार के अतिरिक्त एक जाति ट्रा. कुकुमेरिना (T. cucumerina) के फल भी कड़वे होते हैं । यह १ से ३ इञ्च लम्बे, दीर्घवृत्ताभ-तर्क्वाकार एवं दोनों तरफ चोंच की तरह नोकदार होते हैं । यह कच्ची अवस्था में हरे, सफेद धारियों से युक्त एवं पकने पर गहरे लाल हो जाते हैं । इनका भी तिक्त पटोल के स्थान पर उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन-मूल में सॅपोनिन्, इन्द्रायण की तरह कड़वा पदार्थ, कुछ उड़नशील तेल तथा स्थिर तेल पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-कड़वा परवर उष्ण, पित्त को न बढ़ाने वाला, वृष्य, कफघ्न, ज्वरनाशक एवं रेचन है । यह कामला, उदर, रक्तविकार, कण्डू, कुष्ठ, जीर्णज्वर एवं दाह में लीभादायक है । पित्तप्रधान रोग में रेचन के लिये पटोल का उपयोग करते हैं । इसकी जड़ तीव्र रेचक होती है । हरे फल की गूदी भी रेचक होती है । पत्ते दीपन, पाचन, बल्य, तिक्त पौष्टिक एवं अधिक मात्रा में वामक एवं रेचक है । इसके पत्ते तथा धनियाँ का क्वाथ पित्तज्वर में देते हैं । त्वचा के रोगों में इसे गुडूची के साथ देते हैं तथा पत्तों का रस लगाते हैं । मात्रा-गूद्दी १ से २ रत्ती । अथ बिम्बी (कुन्दुरी, कन्दूरी) । तस्य नामानि तत्फलगुणांश्चाह बिम्बी रक्तफला तुण्डीतुण्डीकेरी च बिम्बिका । ओष्ठोपमफला प्रोक्ता पीलुपर्णी च कथ्यते ॥७३॥ बिम्बीफलं स्वादु शीतं गुरु पित्तास्रवातजित् । स्तंभनं लेखनं रुच्यं विबन्धाध्मानकारकम् ॥७४॥ कन्दूरी के संस्कृत नाम-बिम्बी, रक्तफला, तुण्डी, तुण्डीकेरी, बिम्बिका, ओष्ठोपमफला और पीलुपर्णी ये सब हैं । कन्दूरी का फल-स्वादिष्ट, शीतल, गुरु, स्तम्भन, लेखन, रुचिकारक तथा विबन्ध और आध्मान (अफरा) को करनेवाला एवम्-पित्त, रक्तविकार तथा वात को दूर करने वाला होता है । [७३-७४] ४८. कन्दूरी (कुन्दरू) हिं०-कन्दूरी, कुनली, कुनरी, कुन्दरी, कुन्दुरू । बं०-तेला कुचा । म०-तोंडली । गु०-घोलां, घोली, टिंडोराँ । क०-तोंडे । ता०-को वै । ते०-दोंडा तिगे । अं०-Ivy-gourd (आइवी-गोर्ड) । ले०-Coccinia indica W. & A. (कोक्सीनिया इण्डिका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) ।