भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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शाकवर्गः ८३९ यह सभी प्रान्तों में होती है। इसकी लता-आरोही, बहुवर्षायु, निःशाख तन्तुओं से युक्त एवं मूल लम्बे कन्दवत् होते हैं। काण्ड-पाँच कोण युक्त होता है। पत्ते-प्रायः १ १/२-३ १/२ इञ्च बड़े, लट्वाकार या वृत्ताकार, ३ से ५ खण्ड या कोणयुक्त, चिकने एवं दूर-दूर पर किञ्चित् दन्तुर होते हैं। पुष्प-श्वेत होते हैं। फल-मांसल, दीर्घवृत्ताभ या बेलनाकार, १-२ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च व्यास के, कच्ची अवस्था में १० श्वेत धारियों से युक्त, चिकने, चमकीले हरे तथा पकने पर गहरे लाल रंग के रहते हैं। इसके कई प्रकार होते हैं जिनमें जंगली कड़वी होती है। चिकित्सा में पंचांग का एवं शाकार्थ फल का उपयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसके कोमल फलों में आर्द्रता ९३.१, प्रोटीन १.२, स्नेह ०.१, रेशा १.६, कार्बोहाइड्रेट ३.५, खनिज ०.५, खटिक .०४, फास्फोरस् ०.०३%, लोह १.४ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्राम, विटामिन 'ए' २६० अ० एकक प्र० १०० ग्रा० एवं विटामिन 'सी' २८ मि० ग्रा० प्र० १०० ग्रा० रहता है। इसके रस में अमाइलेस् पाया जाता है। इनके अतिरिक्त एक किण्व, हारमोन एवं क्षाराभ भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह स्नेहन, मूत्रसंग्रहणीय, कफनाशक एवं व्रणरोपक है। इसका उपयोग मधुमेह, सोजाक, प्रदर, कास तथा व्रण में किया जाता है। (१) मधुमेह में लता का स्वरस वसंत कुसुमाकर आदि रस योगों के अनुपान के लिये देते हैं। इसमें मूल का स्वरस १ तो० या चूर्ण १/४-१/२ तोला, वंगेश्वर या सोमनाथ रस के साथ दिया जाता है। साथ में शाकार्य फल भी देते हैं। कर्नल चोपरा के प्रयोगों में इसे मधुमेह के लिये निरुपयोगी बतलाया गया है। (२) व्रण एवं त्वचा के रोगों में पत्तों का स्वरस लगाते हैं। जीभ में छाले होने पर फल को चबाते हैं। अथ शिम्बीः-पुस्तशिम्बी च (सेम-सेमभेद) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह शिम्बिः शिम्बी पुस्तशिम्बी तथा पुस्तकशिम्बिका। शिम्बीद्वयं च मधुरं रसे पाके हिमं गुरु ।। बल्यं दाहकरं प्रोक्तं श्लेष्मलं वातपित्तजित् ।।७५।। सेम का संस्कृत नाम-शिम्बी तथा शिम्बी है। सेम भेद का संस्कृत नाम-पुस्तशिम्बि तथा पुस्तकशिम्बिका है। उक्त दोनों प्रकार की सेम-रस तथा विपाक में मधुर (मीठी), शीतल, गुरु, बलकारक तथा दाह और कफ को उत्पन्न करने वाली एवम् वात और पित्त को दूर करने वाली होती है। [७५] ४९. सेम सेम के अनेक प्रकार होते हैं। धान्यवर्ग में निष्पाव के अन्तर्गत एक सेम का उल्लेख किया गया है जिसके अनेक प्रकार पाये जाते हैं। उन्हीं भेदोपभेदों में से उपर्युक्त शिम्बी के भेद हो सकते हैं। अथ कोलशिम्बिः तस्या नामानि गुणाँश्चाह कोलशिम्बिः कृष्णफला तथा पर्यङ्कपट्टिका ।।७६।। कोलशिम्बिः समीरघ्नी गुर्व्युष्णाकफपित्तकृत्। शुक्राग्निसद्कृत् वृष्या रुचिकृद् बद्धविङ् गुरुः ।।७७।। कोलशिम्बि के संस्कृत नाम-कोलशिम्बि, कृष्णफला तथा पर्यङ्कपट्टिका ये सब हैं। कोलशिम्बि-वातनाशक, अधिक उष्ण, कफ तथा पित्त कारक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक, मल को बाँधने वाली, गुरु एवम् शुक्र जठराग्नि को क्षीण करने वाली होती है। [७६-७७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA