भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४० भावप्रकाशनिघण्टुः ५०. कोलशिम्बि यह भी प्रथमोक्त सेम के भेदों में से हो सकती है या अन्य लता हिं०-बड़ासेम । बं०-माखन सेम; ले०- कॅनॅवेलिया ग्लेडिएटा (Canavalia gladiata (Jacq.) DC.) हो सकती है। इसके भी कई प्रकार सेम की लम्बाई तथा बीजों की संख्या के अनुसार होते हैं। इसकी लता-बड़ी होती है। फूल-श्वेत तथा गुलाबी होते हैं। फली- ८-१२ इञ्च लम्बी, १-१ १/२ इञ्च चौड़ी, तलवार के आकार की होती है। बीज-गुलाबी, धूसर या श्वेत होते हैं। इसकी कोमल फलियों का शाकार्थ उपयोग किया जाता है। केंवाच की एक अन्य जाति होती है जिसकी फली का भी सेम के नाम से व्यवहार किया जाता है। अथ शोभाञ्जनफलम् (सहेजन की फली) । तस्य गुणानाह शोभाञ्जनफलं स्वादु कषायं कफपित्तनुत् । शूलकुष्ठक्षयश्वासगुल्महृद् दीपनं परम् ।।७८।। सहेजन की फली-स्वादिष्ट, कषाय रस युक्त, अत्यन्त अग्निदीपक, एवम्-कफ, पित्त, शूल, कुष्ठ, क्षय, श्वास तथा गुल्म को दूर करने वाली होती है । [७८] ५१. सहेजन की फली सहिजन का परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ३४०) में दिया गया है ॥५१॥ अथ वृन्ताकम् (बैंगन, भण्टा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वृन्ताकं स्त्री तु वार्त्ताकुर्भण्टाकी भाण्टिकाऽपि च । वृन्ताकं स्वादु तीक्ष्णोष्णं कटुपाकमपित्तलम् ।। ज्वरवातबलासघ्नं दीपनं शुक्रलं लघु ।।७५।। बैंगन के संस्कृत नाम-वृन्ताक, वार्त्ताकु (स्त्रीलिङ्गी), भण्टाकी तथा भाण्टिका ये सब हैं। बैंगन-स्वादिष्ट, विपाक में कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्ण तथा किञ्चित् पित्तजनक, ज्वर, वायु तथा कफ को नष्ट करने वाला, अग्निदीपक, शुक्रजनक और लघु होता है । [७९] अथ तद्बालवृद्धफलयोर्गुणानाह तद्बालं कफपित्तघ्नं वृद्धं पित्तकरं गुरु ।।८०।। बैंगन का छोटा फल-कफ तथा पित्तनाशक होता है। बड़ा फल-गुरु तथा पित्तकारक होता है । [८०] अथाङ्गारपरिपाचितवृन्ताकफलगुणानाह वृन्ताकं पित्तलं किञ्चिदङ्गारपरिपाचितम् । कफमेदोऽनिलामघ्नमत्यर्थं लघु दीपनम् ।।८१।। अङ्गारे पर भुना हुआ बैंगन-किञ्चित् पित्तजनक, अत्यन्त लघु, अग्निदीपक एवम्-कफ-मेद-वायु तथा आम को दूर करने वाला होता है । [८१] अथ तैललवणान्वितवृन्ताकफलस्य श्वेतवृन्ताकस्य च गुणानाह तदेव हि गुरु स्निग्धं सतैलं लवणान्वितम् । अपरं श्वेतवृन्ताकं कुक्कुटाण्डसमं भवेत् । तदर्शःसु विशेषेण हितं हीनं च पूर्वतः ।।८२।। अङ्गारे पर भुने हुए उसी बैंगन में यदि तेल तथा नमक डाल दिया जाय तो वह-गुरु तथा स्निग्ध होता है। भेद- एक दूसरे प्रकार का और बैंगन होता है जिसे संस्कृत में "श्वेतवृन्ताक" तथा हिन्दी में "सफेद बैंगन" कहते हैं। वह CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA