भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
८४० भावप्रकाशनिघण्टुः ५०. कोलशिम्बि यह भी प्रथमोक्त सेम के भेदों में से हो सकती है या अन्य लता हिं०-बड़ासेम । बं०-माखन सेम; ले०- कॅनॅवेलिया ग्लेडिएटा (Canavalia gladiata (Jacq.) DC.) हो सकती है। इसके भी कई प्रकार सेम की लम्बाई तथा बीजों की संख्या के अनुसार होते हैं। इसकी लता-बड़ी होती है। फूल-श्वेत तथा गुलाबी होते हैं। फली- ८-१२ इञ्च लम्बी, १-१ १/२ इञ्च चौड़ी, तलवार के आकार की होती है। बीज-गुलाबी, धूसर या श्वेत होते हैं। इसकी कोमल फलियों का शाकार्थ उपयोग किया जाता है। केंवाच की एक अन्य जाति होती है जिसकी फली का भी सेम के नाम से व्यवहार किया जाता है। अथ शोभाञ्जनफलम् (सहेजन की फली) । तस्य गुणानाह शोभाञ्जनफलं स्वादु कषायं कफपित्तनुत् । शूलकुष्ठक्षयश्वासगुल्महृद् दीपनं परम् ।।७८।। सहेजन की फली-स्वादिष्ट, कषाय रस युक्त, अत्यन्त अग्निदीपक, एवम्-कफ, पित्त, शूल, कुष्ठ, क्षय, श्वास तथा गुल्म को दूर करने वाली होती है । [७८] ५१. सहेजन की फली सहिजन का परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ३४०) में दिया गया है ॥५१॥ अथ वृन्ताकम् (बैंगन, भण्टा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वृन्ताकं स्त्री तु वार्त्ताकुर्भण्टाकी भाण्टिकाऽपि च । वृन्ताकं स्वादु तीक्ष्णोष्णं कटुपाकमपित्तलम् ।। ज्वरवातबलासघ्नं दीपनं शुक्रलं लघु ।।७५।। बैंगन के संस्कृत नाम-वृन्ताक, वार्त्ताकु (स्त्रीलिङ्गी), भण्टाकी तथा भाण्टिका ये सब हैं। बैंगन-स्वादिष्ट, विपाक में कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्ण तथा किञ्चित् पित्तजनक, ज्वर, वायु तथा कफ को नष्ट करने वाला, अग्निदीपक, शुक्रजनक और लघु होता है । [७९] अथ तद्बालवृद्धफलयोर्गुणानाह तद्बालं कफपित्तघ्नं वृद्धं पित्तकरं गुरु ।।८०।। बैंगन का छोटा फल-कफ तथा पित्तनाशक होता है। बड़ा फल-गुरु तथा पित्तकारक होता है । [८०] अथाङ्गारपरिपाचितवृन्ताकफलगुणानाह वृन्ताकं पित्तलं किञ्चिदङ्गारपरिपाचितम् । कफमेदोऽनिलामघ्नमत्यर्थं लघु दीपनम् ।।८१।। अङ्गारे पर भुना हुआ बैंगन-किञ्चित् पित्तजनक, अत्यन्त लघु, अग्निदीपक एवम्-कफ-मेद-वायु तथा आम को दूर करने वाला होता है । [८१] अथ तैललवणान्वितवृन्ताकफलस्य श्वेतवृन्ताकस्य च गुणानाह तदेव हि गुरु स्निग्धं सतैलं लवणान्वितम् । अपरं श्वेतवृन्ताकं कुक्कुटाण्डसमं भवेत् । तदर्शःसु विशेषेण हितं हीनं च पूर्वतः ।।८२।। अङ्गारे पर भुने हुए उसी बैंगन में यदि तेल तथा नमक डाल दिया जाय तो वह-गुरु तथा स्निग्ध होता है। भेद- एक दूसरे प्रकार का और बैंगन होता है जिसे संस्कृत में "श्वेतवृन्ताक" तथा हिन्दी में "सफेद बैंगन" कहते हैं। वह CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८४१ आकार में मुर्गे के अण्डे के समान होता है। सफेद बैंगन-अर्श में विशेष करके हितकर होता है और पूर्वोक्त बैंगन की अपेक्षा यह हीन गुण वाला होता है। [८२] ५२. भंटा हिं०-भंटा, बैंगन, बैगुन। बं०-बेगुन। म०-वांगे, वांगी। गु०-रिङ्गणा, वेंगण, वंताक। क०-बदने। ते०-वंकाया। ता०-कत्तरिक्काइ। फा०-बांदगान। अ०-वार्द जान, वादंजान, बाजं जान। अं०-Brinjal (ब्रिझल); Egg-Plant (एग प्लॅण्ट)। ले०-Solanum melongena Linn. (सोलेनम् मेलोंगेना)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। यह गुडूच्यादि वर्गोक्त बृहती के अन्तर्गत वर्णित एक जाति का कृषित प्रकार है। यह प्रसिद्ध फल शाक प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-३ फुट तक ऊँचा होता है। पत्ते-वन भाँटे के समान परन्तु इनसे लम्बे चौड़े होते हैं। फूल-कंटकारी के समान बैंगनी रंग के और फल-गोल लम्बे होते हैं। किसी के फल गोल, हरे और बैंगनी रंग के, किसी के गोलाई लिये लम्बे सफेद होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके वन्य प्रकार का बृहती की तरह उपयोग होता है। कृषित का शाकार्थ उपयोग करते हैं। अथ डिण्डिशः (टिंडा) तस्य नामगुणानाह डिण्डिशो रोमशफलो मुनिनिर्मित इत्यपि ।।८३।। डिण्डिशो रुचिकृद्भेदी पित्तश्लेष्मापहः स्मृतः । सुशीतो वातलो रूक्षो मूत्रलश्चाश्मरीहरः ।।८४।। टिंडा के संस्कृत नाम-डिण्डिश, रोमशफल तथा मुनिनिर्मित ये सब हैं। टिंडा-रुचिकारक, मलभेदक, अत्यन्त शीतल, वातजनक, रूक्ष, मूत्र लाने वाला एवम् पित्त, कफ तथा पथरी को दूर करने वाला होता है। [८३-८४] ५३. टिंडा हिं०-ढेंड़स, टिंडा। म०-ढेंडेसे, दिंडशी। ले०-Citrullus vulgaris var. fistulosus (सिट्रुलस् वल्गेरिस् प्रकार फिस्चुलोसस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा बम्बई में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप-आरोही या प्रसरणशील होता है तथा काण्ड दृढ़ होता हैं। इसके फल-छोटे, बड़े, २-३ इञ्च व्यास के गोल, हलके या गहरे हरे रंग के होते हैं। बीज-कुछ कृष्णाभ होते हैं। इनमें से हलके रंग के फल अधिक अच्छे होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें आर्द्रता ९२.३, प्रोटीन १.७, स्नेह ०.१, खनिज ०.६, कार्बोहाइड्रेट ५.३, खटिक ०.०२, फास्फोरस ०.०३%, लोह ०.९ मि० ग्राम प्र० १०० ग्रा०, विटामिन 'ए' २८ अ० एकक् प्रति १०० ग्रा० आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-इसका फल शाकार्थ व्यवहार में लाते हैं। बीजों को सुखाकर भूनकर उपयोग में लाते हैं। अथ पिण्डारम् (पिण्डार)। तस्य गुणानाह पिण्डारं शीतलं बल्यं पित्तघ्नं रुचिकारकम् । पाके लघु विशेषेण विषशान्तिकरं स्मृतम् ।।८५।। पिण्डालू-शीतल, बलकारक, पित्तनाशक, रुचिकारक, विपाक में लघु होता है। एवम्-यह विशेष करके विष का शमन करने वाला होता है। [८५]
८४२ भावप्रकाशनिघण्टुः ५४. पिंडार हिं०-पिंडार, पिंडारी, पिंडारू, पिंडालु। बं०-पिरालो। गु०-गंगेडा। म०-पेंढर, पेंढारी, पेंढ्र, पेंदूर। क०- पेरालु। ते०, ता०-नलैक। ले०-Randia uliginosa DC. (रॅण्डिया युलिजिनोसा)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। यह पूर्व, मध्य, पश्चिम तथा दक्षिण भारत में होता है। उत्तर में कम होता है। इसके वृक्ष-छोटे; टहनियाँ मोटी और कृष्णाभ; काँटे कम; पत्ते-अंडाकार, आयताकार या कभी-कभी अभिलट्वाकार, २-८ x १-४ इञ्च बड़े, टहनियों पर गुच्छाकार क्रम में निकले हुये; पुष्प-१-२ इञ्च व्यास के बड़े, श्वेत, सुगंधित फल-मांसल, दीर्घवृत्ताभ, २-२.५ इञ्च व्यास के, पकने पर पीले, चिकने तथा अमरूद की तरह दिखलाई देते हैं। कच्चे फल का शाकार्थ उपयोग करते हैं। नोट-पिंडार नाम एक अन्य वृक्ष ट्रेविआ न्यूडिफ्लोरा (Trewia nudiflora Linn.) को भी लिखा मिलता है जिसका गंभारी के स्थान पर कहीं-कहीं प्रयोग किया जाता है। उसका वर्णन पृष्ठ २७८ पर किया जा चुका है। यहाँ शाकवर्ग में जिसका वर्णन आया है वह उपर्युक्त रँ. युलिजिनोसा है। इसके गुणों में विषघ्न गुण भी लिखा हुआ है। इस वृक्ष का स्थानिक नाम 'गद पिडार' भी मिलता है जो इसके अगद के रूप में व्यवहार का द्योतक है। शाकार्थ इसके फल का उपयोग भी करते हैं। डॉ. देसाई ने इसे 'गांगेरुक' लिखा है। गुण और प्रयोग-इसका पका फल मधुर, शीतल एवं मूत्रजनन है। कच्चा फल स्तंभन है। कच्चे फल को आग में भूनकर ऊपर का भाग अतिसार एवं आँव में देते हैं। अन्दर का बीज का भाग नहीं देते। अथ कर्कोटी (ककोडा, खेखसा) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह कर्कोटकी पीतपुष्पा महाजालीति चोच्यते। कर्कोटी मलहत्कुष्ठहृल्लासारुचिनाशिनी। श्वासकासज्वरान्हन्ति कटुपाका च दीपनी ॥८६॥ ककोड़ा के संस्कृत नाम-कर्कोटकी, पीतपुष्पा और महाजाली ये सब हैं। ककोडा-विपाक में कटुरस युक्त, अग्निदीपक, मलनाशक एवम्-कुष्ठ, हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, श्वास, खाँसी तथा ज्वर का नाशक है। [८६] ५५. ककोड़ा (खेखसा) हिं०-खेखसा, खेखसा, ककोड़ा, ककोरा। बं०-वनकरेला। म०-कटोली, कांटोलें। गु०-कंटोला, कोडा। ते०-आगाकर। क०-माडहा। ता०-एगारवल्लि। ले०-Momor-dica dioica, Roxb. (मोमोर्डिका डायोइका)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। सभी प्रान्तों में यह होता है। इसकी लता-आरोहणशील, चिकनी एवं प्रायः दुर्गन्धयुक्त होती है। काण्ड-कोनदार होते हैं। तन्तु बिना शाखा के होते हैं। पत्ते-हृदयाकार, लट्वाकार, अखण्ड या ३ खण्ड वाले, प्रायः लहरदार दन्तुर किनारेवाले एवं २-४१/२ इञ्च व्यास के होते हैं। पुष्प-पीले होते हैं। इसमें नर एवं नारी पुष्पों की लताएँ अलग-अलग होती हैं। नर पुष्प की लता में फल न लगने के कारण उसे बाँझ खेखसा या वन्ध्याकर्कोटकी कहा जाता है। फल देने वाली, नारीपुष्प की लता होती है जिसे कर्कोटकी कहते हैं। नरपुष्प पतले एवं २ से ६ इञ्च लम्बे दण्ड से युक्त तथा नारीपुष्प के दण्ड छोटे या उतने ही बड़े होते हैं। फल-१ से ३ इञ्च लम्बा, दीर्घ वृत्ताभ एवं तीक्ष्णाग्र या अंडाकार होता है तथा इस पर मुलायम काँटे सदृश उभार होते हैं। इसमें नीचे कन्दवत् बहुवर्षायु मूल होता है जो शलगम की तरह किन्तु लम्बा, पीताभ श्वेत, गोल कंकणाकृति चिह्नों से युक्त एवं स्वाद में कसैला होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८४३ इसकी स्त्री जाति की लता के कंद का उपयोग चिकित्सा में करते हैं। गुण और प्रयोग—इसका कंद कुछ रक्तसंग्राहक होता है। इसे रक्तार्श में देते हैं। मधुमेह में कंदचूर्ण वंगभस्म के साथ देते हैं। इसकी अधिक मात्रा से वमन होता है। इसको पीसकर इसका लेप ज्वर एवं प्रलाप में शरीर पर किया जाता है। इसके फल का चूर्ण या फांट का नस्य के लिये उपयोग करते हैं। मात्रा—१ से ५ ड्राम शर्करा के साथ। अथ डोडिका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह डोडिका विषमुष्टिश्च डोडित्यपि सुमुष्टिका ॥८७॥ डोडिका पुष्टिदा वृष्या रुच्या वह्निप्रदा लघुः। हन्ति पित्तकफार्शांसि कृमिगुल्मविषामयान् ॥८८॥ डोडिका के संस्कृत नाम—डोडिका, विषमुष्टि, डोडी और सुमुष्टिका ये सब हैं। डोडिका—पुष्टिदायक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक, जठराग्नि को दीप्त करने वाला, लघु एवम्—पित्त, कफ, अर्श, कृमि, गुल्म तथा विषरोग को दूर करने वाला है। [८७-८८] ५६. डोडिका नोट—इसके सम्बन्ध में मतभेद है। कोई इसे करेरुआ मानते हैं। कोई जीवन्ती शाक मानते हैं। अधिक संभावना जीवन्ती शाक की है जिसका वर्णन पहले गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४७२) में किया जा चुका है। अथ कण्टकारीफलं (कटेरी का फल)। तस्य गुणानाह कण्टकारीफलं तिक्तं कटुकं दीपनं लघु। रूक्षोष्णं श्वासकासघ्नं ज्वरानिलकफापहम् ॥८९॥ कटेरी का फल—तिक्त तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, लघु, रूक्ष, उष्ण एवम्—श्वास, खाँसी, ज्वर, वायु तथा कफ को दूर करने वाला होता है। [८९] ५७. कंटकारी फल कंटकारी का पूर्ण परिचय गुडूच्यादि वर्ग (पृष्ठ ४६६) में दिया गया है। इति फलशाकानि। अथ नालशाकानि। तत्र सार्षपनालगुणानाह तीक्ष्णोष्णं सार्षपं नालं वातश्लेष्मव्रणापहम्। कण्डूकृमिहरं दद्रुकुष्ठघ्नं रुचिकारकम् ॥९०॥ सरसों का नाल—तीक्ष्ण, उष्ण, रुचिकारक एवम्—वात, कफ, व्रण, खुजली, कृमि, दाद तथा कुष्ठ को दूर करने वाला होता है। ५८. सरसों का नाल सरसों का विवरण शिम्बीधान्य वर्ग (पृष्ठ ८०७) में किया गया है।
८४४ भावप्रकाशनिघण्टुः इति नालशाकानि अथ कन्दशाकानि । तत्र सूरणम् (जमीकन्द) । तस्य नामानि गुणांश्चाह सूरणः कन्द ओलश्च कन्दलोऽर्शोघ्न इत्यपि । सूरणो दीपनो रूक्षः कषायः कण्डुकृत् कटुः ॥९१॥ विष्टम्भी विशदो रुच्यः कफार्शः कृन्तनो लघुः । विशेषादर्शसे पथ्यः प्लीहगुल्मविनाशनः ॥९२॥ सर्वेषां कन्दशाकानां सूरणः श्रेष्ठ उच्यते । दद्रूणां कुष्ठिनां रक्तपित्तिनां न हितो हि सः । सन्धानयोगं सम्प्राप्तः सूरणो गुणवत्तरः ॥९३॥ कन्द शाकों में सूरन (जिमीकन्द) के संस्कृत नाम-सूरन, कन्द, ओल, कन्दल तथा अर्शोघ्न ये सब हैं। सूरन-कषाय तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, रूक्ष, खुजली पैदा करने वाला, विष्टम्भक, विशद गुण युक्त, रुचिकारक, लघु एवम्-कफ तथा अर्श को नष्ट करने वाला होता है। और यह विशेष रूप से अर्श के रोगियों के लिये पथ्य है तथा प्लीहा और गुल्म का नाशक है। सम्पूर्ण कन्दशाकों में सूरन श्रेष्ठ समझा जाता है किन्तु यह दाद, कुष्ठ तथा रक्तपित्त के रोगियों के लिये हितकर नहीं होता है। और यदि सूरन का सन्धान के साथ योग ही अर्थात् इसका अचार आदि बनाया जाय तो विशेष गुणकारी हो जाता है। [९१-९३] ५९. सूरन कन्द हिं०-सूरन कन्द, जमी कन्द, जिमिकन्द, जिमीकन्द, ओल। बं०-ओल। म०-सुरण। गु०-सूरण। क०- सूरण, सूर्णगड्ड। ते०-कन्द। ता०-कर्णैकिलंगु। फा०-ओला। ले०-Amorphophallus campanulatus Blume. (एमोर्फोफेलस् कम्पैनुलेटस्)। Fam. Araceae (अॅरेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। कहीं इसको रोपण करते हैं, कहीं आप ही आप उगता है। इसका क्षुप- दृढ़ होता है। इसके नीचे बड़े-बड़े कन्द होते हैं। पत्र-पुष्पित होने के बहुत बाद आता है। पत्रफलक १ से ३ फीट चौड़ा, अनेक भागों में विभक्त, हरे रंग का एवं छत्र की तरह फैला हुआ रहता है। पत्रवृन्त २ से ३ फीट लम्बा, दृढ़, कुछ काँटों जैसे उभारों से खुरदरा, हरे रंग का तथा हलके रंग के धब्बों से युक्त होता है। यह ऊपर ३ भागों में विभक्त हो जाता है जिसमें कटे हुए पत्रक लगे होते हैं। पुष्पव्यूह-पत्रावृत अवृन्त काण्डज (Spadix) स्वरूप का तथा हरिताभ बैंगनी रंग का होता है। पुं एवं स्त्री पुष्पव्यूह अलग-अलग होते हैं। फल-लाल तथा २ से ३ बीजों से युक्त होता है। कन्द (Corm)-शीर्ष पर धँसा हुआ, गोलार्ध के सदृश, ८ से १० इञ्च व्यास का तथा हलके भूरे रंग का होता है। इसके अनेक प्रकार वन्य एवं कृषित होते हैं। वन्य के कन्द बहुत प्रक्षोभक तथा रक्ताभ श्वेत होते हैं क्योंकि उसमें कॅल्शियम आक्झेलेट (Calcium oxalate) के रवे होते हैं। कृषित (प्रायः श्वेत) में खुजली कम होती है। चिकित्सा में प्रायः वन्य कन्द का एवं शाकार्थ कृषित का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें आर्द्रता ७८.७, प्रोटीन १.२, स्नेह ८०.१, कार्बोहाइड्रेट १८.४, खनिज ०.८, खटिक ०.०५, फॉस्फोरस् ०.०२%, लोह ०.४ मि० ग्रा०, विटामिन 'ए' ४३४ अ० एकक एवं विटामिन 'बी₁', २० अ० ए० प्रति १०० ग्राम रहता है ! गुण और प्रयोग-यह कटु, वातहर, दीपन, पाचन एवं रुचिकर है। इसका उपयोग अर्श, कास, श्वास, प्लीहावृद्धि, गुल्म, आमवात एवं आन्त्र के रोगों में किया जाता है। कन्दशाक में इसे श्रेष्ठ मानते हैं।
(१) अर्श में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इससे यकृत् की क्रिया ठीक होती है, शौच साफ होता है तथा अर्श की रक्तवाहिनियों का संकोचन होता है। इसका पुटपाक करके फिर साग बनाना चाहिये या चूर्ण करके रखना चाहिये। कांजी में संधान करके रखने से यह अधिक गुण वाला होता है। पर्याप्त धोने से तथा अधिक पकाने से भी इसका दोष दूर होता है। कच्चे सूरण के प्रयोग से मुह में खुजली आदि होती है जिसके निवारण के लिए इमली आदि अम्ल पदार्थ का उपयोग करना चाहिये। (२) आंत्र के रोगों में इसका शाक देते हैं। मात्रा-चूर्ण १ से ३ माशा। अथालुकम् (आलुक) । तस्य नामानि भेदांश्चाह आरूकं वीरसेनञ्च वीरं वीरारुकं तथा। आरुकमप्यालुकं तत्कथितं वीरसेनकम् ।। ९४ ।। काष्ठालुकशङ्खालुकहस्त्यालुकानि कथ्यन्ते। पिण्डालुकमध्वालुक १रक्तालुकानि चोक्तानि ।। ९५ ।। आलुक के संस्कृत नाम-आरूक, वीरसेन, वीर, वीरारुक, आरुक, आलुक तथा वीरसेनक ये सब हैं। भेद- (१) काष्ठालुक, (२) शंखालुक, (३) हस्त्यालुक, (४) पिण्डालुक, (५) मध्वालुक, (६) रक्तालुक ये सब आलू के भेद हैं। [९४-९५] ❖ काष्ठालुकं = काठिन्ययुक्तम् (कठालू)। शङ्खालुकं = श्वेततायुक्तम् (शङ्खालू)। हस्त्यालुकं = दीर्घतायुक्तं महाशरीरम्। पिण्डालुकं = वर्तुलम् (सुथनी, पिण्डालू)। मध्वालुकं = मधुरतायुक्तं रोमान्वितम् (दीर्घसुथनी)। रक्तालुकम् = ("रक्तालू, रतालू, रतण्डा" इति च) ।। ९४-९५ ।। यहाँ पर काष्ठालुक आदि का निम्नलिखित अर्थ समझना चाहिये। काष्ठालुक-यह कठिनतायुक्त होता है। इसे हिन्दी में "कठालू" कहते हैं। शंखालुक-यह सफेदी लिये हुये होता है, इसका हिन्दी नाम "शंखालू" है। हस्त्यालुक-यह लम्बाई लिये हुये आकार में अत्यन्त बड़ा होता है। पिण्डालुक-यह गोल होता है, इसे लोक में सुथनी या पिण्डालू कहते हैं। मध्वालुक-यह मीठापन लिये हुये होता है तथा इसके ऊपर लम्बे-लम्बे रोवें होते हैं। हिन्दी में इसे "दीर्घ सुथनी" कहते हैं। रक्तालुक-यह लाल रंग का होता है, इसे लोक में "रक्तालू-रतालू या रतण्डा" कहते हैं। अथालुकमात्रगुणानाह आलुकं शीतलं सर्वं विष्टम्भि मधुरं गुरु ।। ९६ ।। सृष्टमूत्रमलं रूक्षं दुर्जरं रक्तपित्तनुत्। कफानिलकरं बल्यं वृष्यं २स्वल्पाग्निवर्द्धनम् ।। ९७ ।। सभी प्रकार के आलुक-शीतल, विष्टम्भजनक, मधुर रसयुक्त, गुरु, मूत्र तथा मल को निकालने वाले, रूक्ष, देर में हजम होने वाले, कफ तथा वायु को उत्पन्न करने वाले, बलकारक, वीर्यवर्धक, किंचित् जठराग्नि को बढ़ानेवाले एवम् रक्तपित्त को नष्ट करने वाले होते हैं। [९६-९७] १. सप्तालुक इति पाठ०। २. स्तम्भिवर्धनम् इति पाठ०।
८४६ भावप्रकाशनिघण्टुः ६०. आलुकभेद अं०-Yam (यॅम्)। ले०-Dioscorea sp. (डायोस्कोरिआ जातियाँ)। Fam. Dioscoreaceae (डायोस्कोरिएसी)। इस प्रजाति (Genus) में अनेक जातियाँ होती हैं। भारत में करीब ५० जातियाँ (Species) पाई जाती हैं जिनमें कुछ वन्य एवं कुछ कृषित होती हैं। इनमें दो मुख्य प्रकार की लताएँ होती हैं। एक वामावर्त तथा दूसरी दक्षिणावर्त। ये वर्षायु लताएँ होती हैं जिनमें से कृषित के कन्दों का उपयोग खाने के लिये किया जाता है। भावप्रकाशकार इसके आकार, रंग, स्वाद आदि के आधार पर अनेक भेद लिखते हैं। जितनी जातियाँ भारत में होती हैं उनमें अनेक प्रकार के कन्द पाये भी जाते हैं। इनमें बहुत बड़े, लम्बे गोल, बहुत गहराई में होने वाले, सतह के पास होने वाले, एकाकी, गुच्छों में अनेक, मुलायम, कठोर, रोएँदार, बिना रोएँदार आदि प्रकार पाये जाते हैं। इनमें से कुछ वन्य जातियों को जानवर भी खाते हैं। कुछ कन्दों में क्षाराभ (Dioscorine-डायोस्कोरिन), सॅपोनिन् एवं टैनिन् आदि होने से ये विषैले एवं अस्वादु होते हैं। कुछ लताओं में ऊपर पत्रकोणों में छोटी कन्दवत् रचनाएँ भी पाई जाती हैं। इन्हीं कंदों में से वाराहीकंद है जिसका गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ३८६) में वर्णन किया गया है। रासायनिक संगठन-इनमें स्टार्च, विटामिन् बी एवं कॅल्शियम आग्झेलेट काफी रहता है। प्रोटीन, खटिक एवं लोह कम रहता है। इसकी विभिन्न जातियों में डायेस्कोरिन् (Dioscorine, C₃, H₂, O₂, N) क्षाराभ की मात्रा कम या अधिक रहती है। इससे युक्त कन्दों के अधिक सेवन से श्वसनाघात हो सकता है। सॅपोनिन (Saponin) युक्त कन्दों का उपयोग सिल्क, ऊन आदि धोने के लिये किया जाता है। इनकी कुछ अमेरिकी जातियों से कॉर्टिजोन (Cortisone) जैसे संधिवात में उपयोगी द्रव्य निर्माण के लिये आवश्यक प्रारम्भिक द्रव्य प्राप्त किये गये हैं। मद्यसार बनाने के लिये भी इनका उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इनमें से कुछ कन्दों का आलू की तरह भोज्य द्रव्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। अकाल आदि के समय पहाड़ी लोग इनका उपयोग करते हैं। इनको काफी धोकर, पकाकर या भूनकर प्रयोग करते हैं जिससे विषैलापन निकल जाता है तथा खाने से गले में खुजली आदि नहीं होने पाती। कच्चा खाने से इसमें के कॅल्शियम आग्झेलेट से गले में खराश आदि हो जाती है। नोट-नित्य व्यवहार में लाये जाने वाला आलू इससे भिन्न सोलनम् ट्युबरोजम् (Solanum tuberosum) के कन्द हैं। इसी प्रकार शकरकंद भी इससे भिन्न आइपोमिया बटाटास् (Ipomoea batatas Lam.) के कन्द हैं। अथालुकी रक्ताळुभेदः । तस्या लक्षणं गुणाँश्चाह रक्ताळुभेदो या दीर्घा तन्वी च प्रथिताऽऽलुकी । आलुकी बलकृत्स्निग्धा गुर्वी हृत्कफनाशिनी ।। विष्टम्भकारिणी तैले तलिताऽतिरुचिप्रदा ।।९८।। रक्तालू के भेद का संस्कृत नाम आलुकी है। लक्षण-यह रतालु का भेद है एवं उससे लम्बी तथा पतली होती है। आलुकी-बलकारक, स्निग्ध, गुरु, हृद्रत कफ को दूर करने वाली, एवम् विष्टम्भजनक होती है और तेल में तली हुई अत्यन्त रुचिकारक होती है। [९८] नोट-रक्ताळु भेद लिखने के कारण इसके पूर्वोक्त आलुक भेदों में से किसी लता के कन्द होने की अधिक सम्भावना है। प्रसंगतः अरुई का वर्णन यहाँ दिया जा रहा है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८४७ ६१. अरुई हिं०-अरुई, अरई, घुइयाँ। बं०-काचू। म०-अलवाचा कान्दा, आलु। गु०-अलवी। क०-केसवे। ता०-शिमलं। ते०-चम्मडुम्पा। अ०-हुयाकलकास, कलकलास। ले०-Colocasia antiquorum Schott. (कोलोकेसिया ऐण्टीकोरम्)। Fam. Araceae (अॅरेसी)। यह नदी, तालाब, दलदल आदि के किनारे तथा जंगलों के छायादार, आर्द्र स्थानों में वन्य अवस्था में होती है। अनेक स्थानों पर इसकी खेती भी की जाती है। इसका क्षुप-बहु वर्षायु होता है। पर्णवृन्त १ १/२ से ७ फीट तक लम्बा होता है। पत्ते-बहुत बड़े एवं हृदयाकार होते हैं। कन्द-विभिन्न नाप एवं आकार के होते हैं। ये १/२ से १ इञ्च व्यास के गोल आकृति से लेकर ६ इञ्च व्यास एवं २४ इञ्च तक लम्बे होते हैं। किसी में एक समान थोड़े कन्द होते हैं तो किसी में विभिन्न नाप के अनेक कन्द होते हैं। इसके अन्दर के रंग के आधार से भी पीले, नारंगी, लाल या बैंगनी प्रकार होते हैं। वैसे तो इसके अनेक प्रकार होते हैं तथापि इसके दो वर्ग दिखलाई देते हैं। एक में पत्ते एवं वृन्त गहरे बैंगनी तथा दूसरे में हरे होते हैं। गहरे बैंगनी का चिकित्सा में उपयोग करते हैं। इसके स्वाद में कुछ चरपराहट रहता है जो प्रकार के अनुसार कम या अधिक होता है। रासायनिक संगठन-इसके कन्द के रस में अमाइलेस (Amylase) रहता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन काफी रहता है तथा यह आलू की अपेक्षा १ १/२ गुना अधिक पोषक है। अन्य स्टार्च युक्त खाद्यद्रव्य की अपेक्षा यह अधिक सुपाच्य है तथा इसमें विटामिन ए, 'बी'१ एवं खटिक तथा फॉस्फोरस भी काफी रहता है। इसके पत्तों में भी विटामिन 'ए' का पूर्व भाग एवं विटामिन 'सी' रहता है। इसमें के कॅल्शियम ऑग्झेलेट के कारण यह गले में लगता है जिसके लिये इसको पकाकर तथा पकते समय थोड़ा 'पकाने का सोडा' डाल कर प्रयोग में लाते हैं। इसके स्टार्च के कण छोटे होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके कन्द तथा कोमल पत्तों का शाकार्थ उपयोग करते हैं। इसके पर्णवृन्त का स्वरस रक्तस्तम्भक होता है। क्षत पर लगाने से रक्तस्राव रुककर जल्दी व्रणपूरण होता है। गाँठ आदि पर पर्णवृन्त को नमक के साथ पीस कर बाँधते हैं। यकृत् वृद्धि एवं अर्श में अरुई के कन्दों का साग खिलाते हैं। अथ मूलकद्वयम् (मूली, बड़ी मूली)। तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह मूलकं द्विविधं प्रोक्तं तत्रैकं लघुमूलकम्। शालामर्कटकं विस्रं शालेयं मरुसम्भवम् ।।९९।। चाणक्यमूलकं तीक्ष्णं तथा मूलकपोतिका। नेपाल मूलकं चान्यत्तद्भवेद्गजदन्तवत् ।।१००।। लघुमूलं कटूष्णं स्याद्रुच्यं लघु च पाचनम्। दोषत्रयहरं स्वर्यं ज्वरश्वासविनाशनम् ।।१०१।। नासिकाकण्ठरोगघ्नं नयनामयनाशनम् ।।१०२।। महत्तदेव रूक्षोष्णं गुरु दोषत्रयप्रदम्। स्नेहसिद्धं तदेव स्याद् दोषत्रयविनाशनम् ।।१०३।। मूली के भेद-(१) मूली, (२) बड़ी मूली, इस प्रकार से मूली के दो भेद होते हैं। इनमें जो पहिली मूली अर्थात् छोटी मूली होती है उसके संस्कृत नाम-लघुमूलक, शालामर्कटक, विस्र, शालेय, मरुसंभव, चाणक्यमूलक
८४८ भावप्रकाशनिघण्टुः बड़ी मूली—रूक्ष, उष्ण, गुरु एवं त्रिदोषकारक होती है। वही मूली यदि तेल में भूनी हुई हो तो भी त्रिदोषनाशक होती है। [९९-१०३] ६२. मूली हिं०—मूली, मुरई। बं०—मूला। म०—मुला। गु०—मूला। क०—मुलङ्गी। ता०—मुलंगि। ते०—मुल्लङ्गि। फा०—तुख, तुर्व। अ०—फजल, हुजल। अं०—Radish (रॅडिश्)। ले०—Raphanus sativus Linn. (रॅफेनस् सेटाइवस्)। Fam. Cruciferae (क्रुसीफेरी)। मूली सभी प्रांतों में बोई जाती है। इसका कन्द—गाजर के समान पर सफेद होता है। पत्ते—नवीन सरसों के पत्तों के समान; फूल—सफेद सरसों के फूल के आकार के और फल—भी सरसों ही के समान किन्तु उससे कुछ मोटा और लगभग १-२ इञ्च लम्बा होता है। बीज—सरसों से बड़े होते हैं। भावप्रकाशकार इसके दो भेद छोटी मूली—चाणक्यमूलक तथा बड़ी मूली—नेपालमूलक लिखते हैं। बड़ी मूली नेपाल इत्यादि की तरफ होती है। इसमें गंध कम होती है। छोटी मूली के भी आकार के अनुसार, लम्बी, दीर्घवृत्ताभ एवं शलजमाकार ये ३ भेद होते हैं। इसके पंचांग का शाकार्थ एवं कन्द स्वरस और बीज का चिकित्सार्थ प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में उड़नशील तैल होता है। कन्द में आर्सेनिक .०१ मि० ग्रा० प्र० १०० ग्राम में रहता है। मूल तथा बीज में स्थिर तैल भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग—कच्ची (कोमल) मूली त्रिदोषहर एवं परिपक्व, बिना पकाये खाने से त्रिदोषकारक तथा पकाकर खाने से त्रिदोषहर एवं सूखी त्रिदोषहर है। इसके पत्तों का स्वरस मूत्रल एवं मृदुविरेचक होता है। आनाह, शूल, अर्श एवं अश्मरी में इसको देते हैं। इसके बीज कफनिःसारक, पाचन, वातानुलोमन मूत्रल एवं मृदुविरेचक हैं। अनार्तव में बीज खिलाते हैं। मूली के कन्द का नित्य शाकार्थ प्रयोग करने से पुराना विबंध दूर होता है। अन्य सूखे शाकों की तरह यह विष्टम्भ एवं वातकारक नहीं है (सु० सू० अ० ४६)। यह पाचन एवं वातानुलोमक है। मात्रा—स्वरस २ से ४ तोला; बीज चूर्ण १ से ३ माशा। अथ गृञ्जनम् (गाजर)। तस्य नामगुणानाह गृञ्जनं गाजरं प्रोक्तं तथा नारङ्गवर्णकम्। गाजरं मधुरं तीक्ष्णं तित्तोष्णं दीपनं लघु। संग्राहि रक्तपित्तार्शोग्रहणीकफवातजित् ।। १०४ ।। गाजर के संस्कृत नाम—गृञ्जन, गाजर और नारङ्गवर्णक ये सब हैं। गाजर—मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निदीपक, लघु, ग्राही एवम्—रक्तपित्त, अर्श, ग्रहणी, कफ वात को दूर करने वाला होता है। [१०४] ६३. गाजर हिं०, म०, बं०, गु०—गाजर। क०—गर्जरि। ते०, ता०—गाजार। फा०—जर्दक। अ०—अजर। अं०— Carrot (कॅरट्)। ले०—Daucus carota var. sativa DC. (डॅकस कॅरोटा प्रकार सटाइवा)। Fam. Umbelliferae (अम्बेलिफेरी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में रोपण किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः | ८४९
इसका क्षुप-वर्षायु या द्विवर्षायु, सीधा अनेक शाखा युक्त एवं १ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-पक्षवत् अनेक भागों में विभक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत या पीताभ होते हैं जो गोलाभ छात्राकार गुच्छ में आते हैं। फल-१/८ इञ्च लम्बे, आयताकार एवं रोमश होते हैं। मूल-२ से १२ इञ्च लम्बा एवं मांसल होता है। इसके अनेक प्रकार रंग एवं आकार के अनुसार होते हैं। चिकना, कोमल, चमकीला लाल या नारंगी रंग का गाजर अच्छा माना जाता है। उपर्युक्त प्रकार यह कृषित प्रकार है। वन्य भेद में कन्द पतले, लम्बे, काष्ठीय, क्रमशः नोकीले, तीव्र गन्ध वाले एवं अस्वादु, चरपरे तथा कुछ कड़वे होते हैं। अधिकतर बोने के लिये इसके बीज यूरोप तथा अमेरिका से आते हैं यद्यपि अपने यहाँ बीजों की प्राप्ति का प्रयत्न कश्मीर, कुलू आदि में किया जा रहा है। गाजर का उपयोग शाक, सलाद, अचार, हलुवा, मुरब्बा आदि के रूप में किया जाता है। मक्खन आदि रँगने के लिये इसका रस काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन-गाजर में आर्द्रता ८६, प्रोटीन ०.९, स्नेह ०.१, कार्बोहाइड्रेट १०.७ रेशा १.२, खनिज १.१, खटिक ०.०८, फास्फोरस् ०.०३%, लोह १.५ मि० ग्रा० प्र० १०० ग्राम, कॅरोटीन (विटामिन 'ए' का पूर्वरूप) २००० से ४३०० ए० प्र० १०० ग्रा० एवं विटामिन 'बी', 'डी' तथा 'सी' रहते हैं। वृद्धि के साथ इसके प्रोटीन की मात्रा कम होती है तथा शर्करा की मात्रा बढ़ती है। कॅरोटीन की मात्रा भी वृद्धि के साथ बढ़ती है। यह श्वेत गाजर में नहीं रहता। पेट्रोल तथा ईथर के द्वारा प्राप्त इसके पीतसत्व के सूचिकाभरण से रक्तगत शर्करा की मात्रा कम होती है। इसको पकाने से इसके पौष्टिक तत्त्व बहुत कम हो जाते हैं। वाष्प द्वारा पकाने से इतना ह्रास नहीं होता। कॅरोटीन का शोषण गाजर को महीन पीसकर या कसकर खाने से होता है। इसके बीजों में सुगन्धि तैल तथा स्थिर तैल होता है। पत्तों में भी उड़नशील तैल होता है। गुण और प्रयोग-यह मूत्रजनन, बल्य एवं पोषक है। इसमें के कॅरोटीन के कारण जो विटामिन 'ए' का पूर्वरूप (Precursor) है, इसका अधिक उपयोग किया जाता है। इसके बीज सुगंधित, मूत्रजनन, गर्भाशय उत्तेजक, बल्य एवं वृष्य हैं। गाजर को कसकर सूत्रकृमि में खिलाते हैं। कामला में इसका क्वाथ देते हैं। गाजर को कसकर, गरम कर लेप कराने से शोथ, व्रण, दग्धव्रण आदि में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग सर्वांगशोफ एवं वृक्करोग में करते हैं। गर्भाशय की पीड़ा एवं प्रसव के समय बीजों को देते हैं। इससे गर्भपात की संभावना रहती है।
अथ कदलीकन्दः (केलाकन्द) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह शीतलः कदलीकन्दो बल्यः केश्योऽम्लपित्तजित् । वह्निकृद्दाहहारी च मधुरो रुचिकारकः ॥१०५॥ केले का कन्द-शीतल, बलकारक, वालों के लिये हितकर, जठराग्निवर्धक, मधुर रस युक्त, रुचिकारक एवम् अम्लपित्त तथा दाह को नष्ट करने वाला होता है। [१०५]
६४. कदली कन्द केले का विवरण आम्रादि फल वर्ग (पृष्ठ ६१४) में दिया गया है ॥७०॥
अथ मानकन्दः । तस्य नामगुणानाह मानकः स्यान्महापत्रः कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । मानकः शोथहच्छीतो रक्तपित्तहरो लघुः ॥१०६॥ ५७ भाव.I
४. चतुर्थ खण्ड: कुष्ठ, शीतपित्त, विद्रधि, व्रण, नासा-कर्ण-नेत्र-शिरोरोग, रसायन-वाजीकरण उपसंहार
८५० भावप्रकाशनिघण्टुः मानकन्द का संस्कृत नाम—मानकन्द और महापत्र हैं। मानकन्द—शीतल, लघु एवम्—शोथ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [१०६] ६५. मानकन्द हिं०—मानकन्द। बं०—मानकचू। म०—कांसालू। अं०—Giant taro (जाएण्ट टारो)। ले०—Alocasia indica (Roxb.) Schott. (एलोकेसिया इंडिका)। Fam. Araceae (ऐरॅसी)। प्रायः इसको बागों में लगाते हैं और आसाम तथा बंगाल में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप—अरुई की तरह किन्तु उससे बड़ा एवं ३ से ६ फीट ऊँचा होता है। स्कंध–मांसल, फूला हुआ, ४ से ८ इञ्च व्यास का होता है। पत्ते–२ से ३ फीट लम्बे, पुंखवत् त्रिभुजाकार होते हैं। इसके अग्र खण्ड त्रिभुजाकार एवं पार्श्व खण्ड लट्वाकार होते हैं। पुष्प–पुं. पुष्प एवं स्त्री पुष्प पत्रावृत व्यूह में पृथक्-पृथक्, ४ से ८ इञ्च लम्बे वृन्त पर आते हैं। फल—बाली के रूप में आते हैं जिसमें दाने (फल) लाल होते हैं। स्कन्ध से मूल निकले रहते हैं एवं मूल स्तम्भ से निकले हुए मूलों के अग्र कन्द सदृश होते हैं। स्कन्ध तथा छोटे कन्द खाये जाते हैं। इसके कई भेदोपभेद पाये जाते हैं जिनमें एक मीठा तथा दूसरा कड़वा होता है। मीठे का उपयोग किया जाता है। इसको प्रयोग के पूर्व उबाल कर धोना पड़ता है। रासायनिक संगठन—इसमें स्टार्च काफी होता है। इसमें कॅल्शियम आग्झेलेट भी होता है। इसका आटा चावल की अपेक्षा अधिक सुपाच्य होता है। गुण और प्रयोग—मानकन्द सुपाच्य, पौष्टिक, मूत्रजनन, अल्प मृदुविरेचन एवं स्कंध स्वरस रक्तसंग्राहक एवं कषाय है। इसके सूखे कंद के चूर्ण को चावल की माँड़ के साथ पकाकर, छानकर देने से शोथ और जलोदर में लाभ होता है। उस समय आहार में और कोई पदार्थ नहीं दिया जाता। कंद का साग पुराने विबंध एवं उससे उत्पन्न अर्श में दिया जाता है। कर्णस्राव में इसके स्कंध को भूनकर निकाला स्वरस डालने से लाभ होता है। मूल को कस कर गरम करके उससे सन्धिशोथ में सेंकते हैं। मात्रा—मूल चूर्ण १ से २ तोला। अथ वाराहीकन्दः (गेंठी)। तस्य गुणानाह वाराही पित्तला बल्या कट्वी तिक्ता रसायनी। आयुःशुक्राग्निकृन्मेहकफकुष्ठानिलापहा ।।१०७।। वाराहीकन्द—कटु तथा तिक्त रस युक्त, पित्तजनक, बलकारक, रसायन तथा आयु, शुक्र और जठराग्नि को बढ़ाने वाला एवम्–प्रमेह, कफ, कुष्ठ और वायु को नष्ट करने वाला होता है। [१०७] ६. वाराही कन्द इसका विवरण गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ५५४) में एवं आलुक के वर्णन के साथ इसी वर्ग में (पृष्ठ ८४५) किया जा चुका है। अथ हस्तिकर्णा। तस्यास्तत्कन्दस्य च गुणानाह गजकर्णा तु तिक्तोष्णा तथा वातकफाञ्जयेत्। शीतज्वरहरी स्वादुः पाके तस्यास्तु कन्दकः ।।१०८।। पाण्डुशोथकृमिप्लीहगुल्मानाहोदरापहः । ग्रहण्यार्शोविकारघ्नी वनसूरणकन्दवत् ।।१०९।। हस्तिकर्ण के संस्कृत नाम—गजकर्णा और हस्तिकर्णा इसके संस्कृत नाम हैं।
शाकवर्गः ८५१ हस्तिकर्ण-तिक्तरसयुक्त, उष्ण, विपाक में मधुर रसयुक्त एवम्-वात-कफ तथा शीतज्वर को दूर करने वाला होता है। इसका कन्द-जङ्गली सूरन के कन्द की भाँति, पाण्डु, शोथ, कृमि, प्लीहा, गुल्म, आनाह (अफरा), उदररोग, ग्रहणी तथा अर्श के विकारों को नष्ट करने वाला होता है। [१०८-१०९] नोट-टीकाकारों ने इसे भूपलाश, रक्तएरण्ड तथा कुछ ने मानकन्द का बड़ा भेद लिखा है किन्तु निम्न वर्णित क्षुप हीं हस्तिकर्ण है। ६७. हस्तिकर्ण हिं०-हत्कन, हस्तिकर्ण पलाश, समुद्रक । बं०-ढोलसमुद्र । म०-दिंडा । ले०-Leea macrophylla Horn. (लिआ मॅक्रोफाइला) । Fam. Vitaceae (विटेसी) । भारत के समस्त उष्णप्रदेश एवं आसाम में यह होता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मोटा तथा बहुवर्षायु कन्द से प्रति वर्ष निकलता है। पत्ते-हाथी के कान की तरह बहुत बड़े, १ से २ फीट लम्बे एवं लट्वाकार-हहूत होते हैं। उपपत्र बहुत बड़े होते हैं। पुष्प-श्वेत होते हैं। फल-काले एवं झुमकेदार होते हैं। इसके कन्द का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही, वेदनास्थापक एवं रक्तस्कन्दक है। कन्द को पीसकर व्रण, दाद एवं नारूकृमि पर लगाते हैं। इससे वेदना कम होती है और स्थानिक रक्तस्राव भी रुकता है। कहीं-कहीं क्षय में भी इसका उपयोग किया जाता है। अथ केमुकम् (केमुआँ) । तस्य गुणानाह केमुकं कटुकं पाके तिक्तं ग्राहि हिमं लघु ।।११०।। दीपनं पाचनं हृद्यं कफपित्तज्वरापहम् । कुष्ठकासप्रमेहास्त्रनाशनं वातलं कटु ।।१११।। केमुक-विपाक में कटुरसयुक्त, स्वाद में तिक्त तथा कटुरसयुक्त, ग्राही, शीतल, लघु, अग्निदीपक, पाचक, हृदय के लिये हितकर, वातजनक एवम्-कफ, पित्त, ज्वर, कुष्ठ, कास, प्रमेह तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [११०-१११] ६८. केमुक हिं०-केमुआ, केमुक, केवुक कन्द, केवा। म०-पेवा। ते०, क०-चेंगलकोश्टू । बं०-केऊ । ले०- Costus speciosus (Koen) Sm. (कोस्टस् स्पेसिओसस्) । Fam. Zingiberaceae (जिंजिबरेसी) । यह प्रायः सभी स्थानों पर किन्तु विशेष रूप से बंगाल तथा कोंकण में होता है। इसे शोभा के लिए बागों में भी लगाते हैं। आर्द्र तथा छायादार स्थानों में वर्षा में यह अधिक होता है। इसका क्षुप-२ से ६ फीट ऊँचा होता है मूलस्तम्भ कन्दवत् तथा अदरक के समान होता है। पत्ते-भालाकार, ६ से १२ इञ्च लम्बे एवं अधर तल पर रोमश होते हैं। पुष्प-कांड के अग्र पर, सफेद, ३-४ इञ्च बड़े, निर्गन्ध पुष्प, व्यूह में आते हैं जिनके कोणपुष्पक भड़कीले लाल होते हैं। इसके कन्द को पकाकर खाते हैं। यह निर्गन्ध, कुछ कसैला एवं कुछ लुआबदार होता है।
८५२ भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-गलती से इसे कहीं-कहीं कलिहारी माना जाता है। इसी प्रकार कुष्ठ के नाम से भी इसका गलत उपयोग, विशेष रूप से दक्षिण में होता है। रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च होता है। गुण और प्रयोग-इसे बल्य, कुछ विरेचन, रक्तशोधक एवं कृमिनाशक मानते हैं। इसके ताजे कंदों का मुरब्बा रुचिकारक एवं पौष्टिक मानते हैं। हड्डियों में पीड़ा होने पर इसका उपयोग करते हैं। नवीन प्रयोगों से देखा गया है कि कलिहारी की तुलना में इसमें गर्भाशय संकोचक, गुण अधिक होता है (कु० प्रे० तिवारी तथा अन्य; आ० अनु० पत्रिका, भाग १, अंक २)। अथ कसेरू, चिचोढं च। तयोर्गुणानाह कसेरु द्विविधं तत्तु महद्राजकसेरुकम्। मुस्ताकृति लघु स्याद्यत्तच्चिचोढमिति स्मृतम् ।।११२।। कसेरुकद्वयं शीतं मधुरं तुवरं गुरु। पित्तशोणितदाहघ्नं नयनामयनाशनम्। ग्राहि शुक्रानिलश्लेष्मारुचिस्तन्यकरं स्मृतम् ।।११३।। कसेरू के भेद-(१) बड़ा, (२) छोटा, भेद से कसेरू दो प्रकार का होता। उनके संस्कृत नाम-जो बड़ा कसेरू होता है उसे “राजकसेरुक” कहते हैं और छोटा मोथे के समान आकार वाला होता है उसे “चिचोढ़” कहते हैं। दोनों प्रकार के कसेरू-शीतल, मधुर तथा कषाय रसयुक्त, गुरु, ग्राही एवम्-शुक्र, वायु, कफ, अरुचि तथा दुग्धवर्धक होते हैं और पित्त, रक्तविकार, दाह, नेत्ररोग इन सबका नाश करने वाले होते हैं। [११२-११३] ६९. कसेरू हिं०-कसेरू। बं०-केसूर । म०-कचरा। अं०-Water chestnut (वाटर चेस्टनट)। ले०-Scirpus kysoor Roxb. (स्किर्पस् काय्सूर)। Fam. Cyperaceae (साइपेरेसी)। सभी प्रान्तों में यह होता है। इसके पौधे-तालाबों में प्रायः एक फुट या अधिक गहरे पानी में होते हैं। काण्ड-४ से ६ फीट ऊँचा तथा ३ पहल का होता है। पत्ते-एक इञ्च चौड़े तथा काण्ड के बराबर या कुछ कम लम्बे होते हैं। पुष्प मंजरी-करीब-करीब ३ फीट लम्बी होती है। फल-छोटे, धूसर या कृष्णवर्ण के होते हैं। कन्द-ऊपर से काले रंग के, अंदर से श्वेत, जायफल इतने बड़े एवं कुछ गोलाई लिये हुये होते हैं। इनका स्वाद कुछ मधुर एवं सुगन्धित होता है। स्कि. आर्टिक्युलेटस् (S. articulatus Linn.) तथा साइपेरस् एस्क्यूलेन्टस् (Cyperus esculentus Linn.) के कन्दों को जो कसेरू जैसे ही होते हैं 'चिचोडा' कहा जाता है जो भावप्रकाशोक्त चिचोढ हैं। कसेरू को भून कर, उबाल कर या वैसे ही खाया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें कार्बोहाइड्रेट ६३, प्रोटीन ७, गोंद ७, रेशा ६ एवं राख २.५ भाग होती है। गुण और प्रयोग-यह मधुर, शीत, ग्राही, कफ-वातवर्धक, शुक्रल तथा स्तन्य है। इसका उपयोग तृषा, दाह, अतिसार एवं वमन में किया जाता है। गर्भावस्था में गर्भपात की संभावना होने पर तथा प्रसूता को दुग्धवृद्धि के लिये इसे देते हैं। हैजे में इसे गुलाबजल में पीस कर पिलातें हैं जिससे प्यास कम होती है, दस्त एवं वमन कम होता है तथा हृदय को बल भी मिलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
शाकवर्गः ८५३ अथ शालूकम् भिस्साण्डञ्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह पद्मादिकन्दः शालूकं करहाटश्च कथ्यते ।।११४।। मृणालमूलं भिस्साण्डं १जलालूकञ्च कथ्यते । शालूकं शीतलं वृष्यं पित्तदाहास्त्रनुद् गुरु ।।११५।। दुर्जरं स्वादुपाकश्च स्तन्यानिलकफप्रदम् । संग्राही मधुरं रूक्षं भिस्साण्डमपि तद्गुणम् ।।११४।। कमल आदि के कन्दों के संस्कृत नाम—कमलकन्द, शालूक तथा करहाट ये सब हैं। मृणाल (कमल के नाल) के मूल भाग के संस्कृत नाम—मृणालमूल, भिस्साण्ड और जलालूक ये सब हैं। कमलकन्द—शीतल, वीर्यवर्धक, गुरु, कठिनता से हजम होने वाला, दुग्ध, वायु तथा कफ को करने वाला, ग्राही, रूक्ष, मधुर रसयुक्त, विपाक में भी मधुर एवम्—पित्त, दाह और रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। भसींडा—गुणों में कमल कन्द के ही समान होता है। [११४-११६] ७०. कमलकन्द, भसींडा वास्तव में भसींडा यह कमल के नाल का आधारीय भाग है जो मोटा तथा लम्बा होता है एवं कुमुद में आधारीय भाग कन्दवत् होता है। कमल का पूर्ण परिचय पुष्पादिपर्व (पृष्ठ ६४०) में दिया गया है। अथ निषिद्धशाकान्याह बालं ह्यनार्त्तवं जीर्णं व्याधितं कृमिभक्षितम् । कन्दं विवर्जयेत्सर्वं यद्वाऽग्न्यादिविदूषितम् । अतिजीर्णमकालोत्थं रूक्षसिद्धमदेशजम् ।।११७।। कर्कशं कोमलं चातिशीतव्यालादिदूषितम् । संशुष्कं सकलं शाकं नाश्नीयान्मूलकं विना ।।११८।। निषिद्ध (न खाने योग्य)—जो कन्द-कच्चा, बिना ऋतु के (असमय में) होने वाला, पुराना, रोगयुक्त, कीड़ों से खाया हुआ अर्थात् जिसमें कीड़े आदि पड़े हों या खाये हों अथवा अग्नि आदि से दूषित हो गये हों उन सबों को त्याग देना चाहिये। जो शाक—अत्यन्त पुराना, अकाल में उत्पन्न हुआ, बिना तेल आदि के पकाया हुआ, अशुभ स्थान श्मशान आदि में उत्पन्न हुआ, कठिन, कोमल, अत्यन्त शीत पड़ने तथा सर्पादि से दूषित हुआ हो उसे त्याग देना चाहिये। एवम्—सभी सूखे शाक नहीं खाने चाहिये, किन्तु मूली के लिये यह नियम नहीं है, उसे सूखी भी खा सकते हैं। [११७-११८] रूक्षसिद्धम् = अतैलादिसिद्धम् । अदेशजम् = अशुभस्थानजम् ।।११७-११८।। यहाँ पर मूल में "रूक्षसिद्ध" पद का "बिना तेल आदि के पकाया हुआ" तथा "अदेशज" पद का "अशुभ स्थान श्मशान आदि में उत्पन्न हुआ" अर्थ समझना चाहिये। [११७-११८] ।। इति कन्दशाकानि ।। अथ संस्वेदजशाकानि । तेषां नामानि गुणानाह उक्तं सस्वेदजं शाकं भूमिच्छत्रं शिलीन्ध्रकम् । क्षितिगोमयकाष्ठेषु वृक्षादिषु तदुद्भवेत् ।।११९।। सर्वे संस्वेदजाः शीता दोषालाः पिच्छिलाश्च ते । गुरवश्छर्द्यतीसारज्वरश्लेष्मामयप्रदाः ।।१२०।। श्वेताश्शुचिस्थलीकाष्ठवंशगोमयसम्भवाः । नातिदोषकरास्ते स्युः शेषास्तेभ्यो विगर्हिताः ।।१२१।। संस्वेदज शाक के संस्कृत नाम—संस्वेदज, भूमिच्छत्र और शिलीन्ध्रक ये सब हैं। १. जलालूबं इति पाठ० ।
८५४ भावप्रकाशनिघण्टुः उत्पत्ति स्थान—संस्वेदज शाक—पृथ्वी, गोबर, काष्ठ तथा वृक्षादिकों पर उत्पन्न होता है । संस्वेदज शाक—शीतल, दोषकारक, पिच्छिल, गुरु एवम्—वमन, अतिसार, ज्वर और कफ सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करने वाले होते हैं । किन्तु जो संस्वेदक शाक—श्वेत वर्णवाले, पवित्र स्थान, काष्ठ, बाँस तथा गोबर पर उत्पन्न होने वाले होते हैं, वे अत्यन्त दोषकारक नहीं (साधारण दोषकारक) होते हैं । शेष अर्थात् इनसे अन्य स्थान में उत्पन्न होने वाले संस्वेदज शाक निन्दित (त्याज्य) होते हैं । [११९-१२१] ७१. छत्रक हिं०—भुईं छत्ता, भुई फोड़ छत्ता छतोना, छाता, साँप की छत्री, खुमी, धरतीफूल । बं०—कोड़क छाता, व्यांगेर छाता, छातकुड़, भुई छाति, छात कुण्ड । पं०—ब्लेओफोरे । सि०—खुम्भी । म०—अलम्बे । गु०—बिलाडीनो रोम । अं०—Mush-room (मशरूम) । ले०—Agaricus campe stris Linn. (एगेरिकस् कॅम्पेस्ट्रिस्) । Fam. Agaricaceae (एगेरिकेसी) । यह सभी प्रांतों में होता है किन्तु पंजाब में अधिक होता है । भुईं छात्ता—वर्षाऋतु में आप ही आप जमीन फोड़कर उत्पन्न होता है । यह खाद की ढेरी पर अधिक होता है । इसका क्षुप—६-७ इञ्च ऊँचा होता है और इसमें कोई डाली नहीं होती, केवल एक डण्डी जो जमीन फोड़ कर निकलती है उस पर गोल छत्ते के आकार का एक छत्र होता है । छत्र के नीचे की सतह से पतले परदे लटकते हैं जिन्हें गिल (Gill) कहा जाता है जिसमें अनेक बीजाणु (Spores) रहते हैं । छत्रक के अनेक प्रकार होते हैं जिनमें से कुछ विषैले होते हैं । निम्नलिखित लक्षणों से यद्यपि इसका ज्ञान हो सकता है तथापि अनुभव के आधार पर ही इसका आसानी से ज्ञान होता है । जब तक निश्चित ज्ञान न हो तब तक इनका प्रयोग उचित नहीं है । इनकी उपज भी की जाती है । निर्विष के लक्षण—छोटे, शीर्ष का भाग २ से ४ इञ्च चौड़ा, दुर्गन्धहीन, श्वेत या गुलाबी, गिल गुलाबी, कांड से अलग तथा बीजाणु गहरे बैंगनी, ठोस, घासं या कचरे के ढेर पर होने वाले, छत्र के नीचे कांड पर वलययुक्त प्रायः विषैले नहीं होते । विषैले छत्रक—बहुत भंगुर या कड़े, छत्र चमकीला, पतला, गिल समान लम्बाई के, गढ़े में उत्पन्न, कृमि द्वारा खाये हुए, तोड़ने पर नीले रंग के, दुर्गन्धयुक्त, स्वाद में कड़वे, अम्ल, खराब, डण्ठल के आधार भाग पर कटोरी जैसी रचना युक्त, पकाने पर चमकीले पीले हो जाने वाले, छायादार स्थान में होने वाले एवं दुग्ध जैसे रसयुक्त अखाद्य होते हैं । गुण और प्रयोग—यह पौष्टिक एवं कामवर्धक होते हैं । मांस के समान यह पौष्टिक है । इसका साग आमाशय की दुर्बलता से उत्पन्न दुर्बलता तथा कृशता में दिया जाता है । क्षय में दूध तथा शर्करा के साथ इसे उबालकर देते हैं । मात्रा—५ से १० तोला । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे शाकवर्गः समाप्त ।
अथ मांसवर्गः
अथ मांसम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
मांसं तु पिशितं क्रव्यमामिषं पललं पलम् । मांसं वातहरं सर्वं बृंहणं बलपुष्टिकृत् ।। प्रीणनं गुरु हृद्यञ्च मधुरं रसपाकयोः ।। १ ।। मांसवर्ग में प्रथम मांस के संस्कृत नाम-मांस, पिशित, क्रव्य, आमिष, पलल तथा पल ये हैं । सभी मांस- रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), बल तथा पुष्टि के करने वाले, सन्तर्पण कारक, गुरु, हृदय के लिये हितकर तथा वातनाशक होते हैं । [१]
अथ मांसभेदानाह
मांसवर्गो द्विधा ज्ञेयो जाङ्गलाानूपभेदतः ।। २ ।। मांस के भेद—मांसवर्ग दो भागों में विभक्त है, (१)—जाङ्गल (जङ्गली जीवों के) मांस (२)—आनूप (जल के समीप या जल में रहने वाले जीवों के) मांस । [२]
अथ जाङ्गलमांसस्य भेदान् गुणाँश्चाह
मांसवर्गेऽत्र जङ्घाला विलस्थाश्च गुहाशयाः । तथा पर्णमृगा ज्ञेया विष्किराः प्रतुदस्तथा ।। ३ ।। प्रसहा अथ च ग्राम्या अष्टौ जाङ्गलजातयः । जाङ्गला मधुरा रूक्षास्तुवरा लघवस्तथा ।। ४ ।। बल्यास्ते बृंहणं वृष्या दीपना दोषहारिणः । मूकतां मिन्मिनत्वं च गद्गदत्वार्दिते तथा ।। ५ ।। बाधिर्यमरुचिच्छर्दिप्रमेहमुखजान् गदान् । श्लीपदं गलगण्डञ्च नाशयन्त्यनिलामयान् ।। ६ ।। जाङ्गल मांस के भेद—इस मांसवर्ग में—(१) जङ्घाल (जङ्घा के बल से चलने वाले), (२) बिलस्थ (बिल में रहने वाले), (३) गुहाशय (गुफा में सोने वाले), (४) पर्णमृग (वृक्षों पर चढ़ने वाले), (५) विष्किर (कुरेद २ कर खाने वाले), (६) प्रतुद (चोंच से पदार्थ को निकाल कर खाने वाले) (७) प्रसह (जबरदस्ती से छीन कर खाने वाले), (८) ग्राम्य (ग्राम में रहने वाले) ये ८ जातियाँ “जाङ्गल” होती हैं । इन्हीं का मांस “जाङ्गल” मांस कहलाता है । जाङ्गल मांस—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, लघु, बलकारक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक), वीर्यवर्धक, अग्निदीपक, दोषनाशक एवम्—मूकता (गुँगापन), मिन्मिनापन, तोतलापन, अर्दितवात (मुँह का लकवा), बहिरापन, अरुचि, वमन, प्रमेह, मुख में होने वाले रोग, श्लीपद (फीलपाँव), गलगण्ड औश्च वातसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला होता है । [३-६]
अथानूपमांसस्य भेदान् गुणाँश्चाह
कूलेचराः प्लवाश्चापि कोशस्थाः पादिनस्तथा । मत्स्या एते समाख्याताः पञ्चधाऽऽनूपजातयः ।। ७ ।। अनूपा मधुराः स्निग्धा गुरवो वह्निसादनाः । श्लेष्मलाः पिच्छिलाश्चापि मांसपुष्टिप्रदा भृशम् ।। तथाऽभिष्यन्दिनस्ते हि प्रायः पथ्यतमाः स्मृताः ।। ८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
८५६ भावप्रकाशनिघण्टुः आनूप मांस के भेद— (१) कूलेचर (नदी आदि के किनारे पर चलने वाले), (२) प्लव (जल के ऊपर तैरने वाले पक्षी), (३) कोशस्थ (ढकने के मध्य में रहने वाले), (४) पादो (पाँव वाले जल के जीव), (५) मत्स्य (मछली), ये ५ प्रकार की जातियाँ आनूप कहलाती हैं। आनूपमांस— मधुररसयुक्त, स्निग्ध, गुरु, जठराग्नि को मन्द करने वाला, कफ उत्पन्न करने वाला, पिच्छिल, मांस को अत्यन्त पुष्ट करने वाला, अभिष्यन्दी तथा प्रायः करके अत्यन्त पथ्य होता है। [७-८] अथ जाङ्गलाः । तत्र जङ्घालानां गणनां लक्षणानि विशिष्टगुणाँश्चाह हरिणैणकुरङ्गर्य्यपृषतन्यङ्कुशम्बराः ।।९।। राजीवोऽपि च मुण्डी चेत्याद्या जङ्घालसंज्ञकाः । हरिणस्ताम्रवर्णः स्यादेणः कृष्णः प्रकीर्त्तितः ।।१०।। कुरङ्गईषत्ताम्रः स्यादेणतुल्याकृतिर्महान् । ऋष्यो नीलाङ्गको लोके स रोझ इति कीर्त्तितः ।।११।। पृषतश्चन्द्रबिन्दुः स्याद्धरिणात्किञ्चिदल्पकः । न्यङ्कुर्बहुविषाणोऽथ शम्बरो गवयो महान् ।।१२।। राजीवस्तु मृगो ज्ञेयो राजिभिः परितोवृतः । यो मृगः शृङ्गहीनः स्यात्स मुण्डीति निगद्यते ।।१३।। जङ्घालाः प्रायशः सर्वे पित्तश्लेष्महराः स्मृतः । किञ्चिद्वातकराश्चापि लघवो बलवर्द्धनाः ।।१४।। जाङ्गल जीवों में प्रथम जङ्घाल संज्ञक जीवों की गणना—हरिण, एण, कुरङ्ग, ऋष्य, पृषत, न्यङ्कु, शम्बर, राजीव और मुण्डी इत्यादि जंघालसंज्ञक जीव हैं। लक्षण—हरिण— यह ताँबे के समान वर्णवाला मृग होता है। एण— यह कृष्ण वर्ण का मृग होता है। कुरङ्ग— यह किंचित् ताँबे के समान वर्ण वाला, आकार में एण मृग के समान किन्तु उससे बड़ा होता है। ऋष्य— यह नीले वर्ण का होता है, इसे लोक में "रोझ" कहते हैं। पृषत— इसके ऊपर चन्द्र के समान बिन्दु होते हैं और यह हरिण से कुछ छोटा होता है। न्यङ्कु— इसके बहुत से झाड़दार सींग होते हैं, इसे "बारहसिंगा" कहते हैं। शम्बर— यह गवय (गौ के समान पशुविशेष-नीलगाय) की अपेक्षा बड़ा होता है। राजीव— यह मृग कहलाता है जिसके शरीर पर बहुत सी रेखायें हों। मुण्डी— यह मृग (हरिण) सींग से रहित होता है। जङ्घाल जीवों के मांस— प्रायः करके पित्त तथा कफ नाशक, किंचित् वातकारक, लघु तथा बलवर्धक होते हैं। [९-१४] अथ बिलेशयाः (बिलनिवासी प्राणी) तेषां गणनां गुणाँश्चाह गोधाशशभुजङ्गाखुशल्लक्याद्या बिलेशयाः । बिलेशया वातहरा मधुरा रसपाकयोः ।। बृंहणा बद्धविण्मूत्रा वीर्य्योष्णाश्च प्रकीर्त्तिताः ।।१५।। बिलेशय (बिल में रहने वाले) प्राणियों की गणना— गोह, खरगोश, साँप, मूसा, साही आदि जीव बिलेशय कहलाते हैं। बिलेशय जीवों का मांस— वात नाशक, रस तथा विपाक में मधुर, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), उष्णवीर्य, मल तथा मूत्र का विबन्ध करने वाला होता है। [१५] अथ गुहाशयाः (गुफानिवासी प्राणी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह सिंहव्याघ्रवृका ऋक्षतरक्षुद्वीपिनस्तथा । बभ्रुजम्बुकमार्जार इत्याद्याः स्युर्गुहाशयाः ।।१६।। गुहाशय (गुफा में रहने वाला) जीवों की गणना— सिंह, बाघ, भेड़िया, भालू, तरस (लकड़बग्घा), चित्रव्याघ्र (चीता), बभ्रु (नेवला), गीदड़, बिलार इत्यादि गुहाशय जीव हैं। [१६] ❖ तरक्षुः— "तेंदुआबाघ" इति लोके । द्वीपी = "चित्रव्याघ्र" इति लोके ।
मांसवर्गः ८५७ स्थूलपुच्छो रक्तनेत्रो बभ्रुदेहः स नाकुलः ।।१६।। यहाँ पर मूल में "तरक्षु" से "तेंदुआबाघ" और "द्वीप" से "चित्रव्याघ्र" (चीता) समझना चाहिये और "बभ्रु" से स्थूल पूँछ तथा लाल नेत्रों वाला, पीले रंग का जो जीव (नेवला) होता है उसका ग्रहण करना चाहिये। [१६] गुहाशया वातहरा गुरूष्णा मधुराश्च ते। स्निग्धा बल्या हिता नित्यं नेत्रगुदविकारिणाम् ।।१७।। गुहाशय जीवों का मांस-वातनाशक, गुरु, उष्ण, मधुर, स्निग्ध, बलकारक तथा नेत्र और गुदा रोग (अर्श) वालों के लिये नित्य हितकर होता है। [१७] अथ पर्णमृगाः (वृक्षों पर चढ़ने वाले प्राणी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह ❖ वनौका वृक्षमार्जारो वृक्षमर्कटिकाऽऽदयः। एते पर्णमृगाः प्रोक्ताः सुश्रुताद्यैर्महर्षिभिः ।।१८।। पर्णमृग (वृक्ष पर चढ़ने वाले) जीवों की गणना-वानर, वृक्षविडाल (वन बिलाव), रूपी वानर आदि को सुश्रुतादि महर्षियों ने "पर्णमृग" संज्ञक बतलाया है। [१८] वनौका = वानरः। वृक्षमार्जारो = वृक्षविडालः। वृक्षमर्कटिका = 'रूपी वानर' इति लोके ।।१८।। यहाँ पर मूल में- "वनौका" से "वानर" तथा "वृक्षमार्जार" से वृक्षविडाल अर्थात् पेड़ पर रहने वाले वन विलाव और "वृक्षमर्कटिका" से "रूपी वानर" नाम से लोक में प्रसिद्ध जीव का ग्रहण करना चाहिये। [१८] स्मृताः पर्णमृगा वृष्याश्चक्षुष्या शोषिणे हिताः। श्वासाशः कासशमनाः सृष्टमूत्रपुरीषकाः ।।१९।। पर्णमृग संज्ञक जीवों का मांस-वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, शोष (क्षय) रोगियों के लिये हितकारी, मूत्र तथा मल को निकालने वाला एवम्-श्वास, अर्श (बवासीर) और खाँसी को दूर करने वाला होता है। [१९] अथ विष्किराः (विष्किरपक्षी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह वर्त्तका वाववर्त्तीरकपिञ्जलकत्तित्तिराः। कुलिङ्गकुक्कुटाद्याश्च विष्किरा समुदाहृताः ।।२०।। विकीर्य भक्षयन्त्येते यस्मात्तस्माद्धि विष्किराः। कपिञ्जल इति प्राज्ञै कथितो गौरतित्तिरिः ।।२१।। विष्किरा मधुराः शीताः कषायाः कटुपाकिनः।बल्या वृष्यास्त्रिदोषघ्नाः पथ्यास्ते लघवः स्मृताः ।।२२।। विष्किर (कुरेद-कुरेद कर खाने वाले) पक्षियों की गणना-वर्तका, (बटेर-जङ्गली गौरैया), लाव (लबा), वत्तीर (कपिञ्जल के सदृश पक्षिविशेष), कपिञ्जलक (गौर तीतर), तीतर, कुलिङ्ग (गौरैया) और मुर्गा इत्यादि पक्षी विष्किर कहलाते हैं। विष्किर शब्द की निरुक्ति-जो पक्षी पहले चोंच आदि से बिखेर कर पीछे खाते हैं इसी से वे "विष्किर" कहलाते हैं और कपिञ्जल को विद्वान् लोग "गौरतित्तिरि" कहते हैं। विष्किर पक्षियों का मांस-मधुर, शीतल, कषाय (कसैला), विपाक में कटु रस युक्त, बलकारक, वीर्यवर्धक, त्रिदोषनाशक, पथ्य तथा लघु होता है। [२०-२२] अथ प्रतुदाः (चोंच से खानेवाले पक्षी)। तेषां गणनां गुणांश्चाह कालकण्ठकहारीतकपोतशतपत्रकाः। वारावतः खञ्जरीटः पिकाद्याः प्रतुदाः स्मृताः। प्रतुद्य भक्षयन्त्येते तुण्डेन प्रतुदास्ततः ।।२३।। प्रतुद पक्षियों को गणना-कालकण्ठक (धूंयें के रंग का जलकौवा), हरियल, पडुकी (कपोत भेद), शतपत्रक (कठफोरा), पारावत (कबूतर), खिड़रिच, कोयल आदि पक्षी "प्रतुद" कहलाते हैं। प्रतुद शब्द की निरुक्ति-जो पक्षी चोंच से निखोर कर खाते हैं। इसी से वे "प्रतुद" कहे जाते हैं। [२३]
८५८ भावप्रकाशनिघण्टुः ❖ हारीतः = "हरियल" इति लोके । कपोतो धवलः पाण्डुः । शतपत्रो बृहच्छुकः । "दार्वाघाटः" इत्यमरः । "कठफोरा" इति लोके ।।२३।। यहाँ पर "हारीत" से लोक प्रसिद्ध "हरियल" तथा कपोत पद से उसी का भेद शुक्लपीत वर्ण की पड्डुखी एवम् "शतपत्रक" से अमरकोश के प्रमाण से दार्वाघाट अर्थात् लोकप्रसिद्ध "कठफोरा" का बोध करना चाहिये । [२३] प्रतुदा मधुराः पित्तकफघ्नास्तुवरा हिमाः । लघवो बद्धवर्चस्काः किञ्चिद्वातकराः स्मृताः ।।२४।। प्रतुदा संज्ञक पक्षियों के मांस—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, पित्त तथा कफनाशक, शीतल, लघु, मल को गाढ़ा करने वाले तथा किञ्चित् वातकारक होते हैं । [२४] अथ प्रसहाः (दूसरे से छीनकर खानेवाले पक्षी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह काको गृध्र उलूकश्च चिल्लश्च शशघातकः । चाषो भासश्च कुरर इत्याद्याः प्रसहाः स्मृताः ।।२५।। प्रसह संज्ञक (दूसरे से जबरदस्ती छीन कर खानेवाले) पक्षियों की गणना—कौवा, गीध, उल्लू, चील्ह, बाज, नीलकण्ठ, भास (गीध का भेद) और कुरांकुर या कडांकुल इत्यादि पक्षी प्रसह संज्ञक हैं । [२५] ❖ शशघातकः = "बाज" इति लोके । चाषः = "नीलकण्ठ" इति लोके । भासः = गृध्रविशेषः स्यात् । कुररः = "कुरांकुर" इति लोके ।।२५।। यहाँ पर "शशघातक" काक लोकप्रसिद्ध "बाज" पक्षी, "चाष" का "नीलकण्ठ" इस नाम से लोकप्रसिद्ध पक्षी, "भास" का गीध के भेद का पक्षी, "कुरर" का "कुरांकुर" इस नाम से लोकप्रसिद्ध पक्षी का ग्रहण करना चाहिये ॥२५॥ प्रसहाः कीर्त्तिता एते प्रसह्याच्छिद्य भक्षणात् ।।२६।। "प्रसह" शब्द की उत्पत्ति—जो पक्षी दूसरे से जबरदस्ती छीनकर खाते हैं इससे वे "प्रसह" कहलाते हैं । [२६] प्रसहाः खलु वीर्योष्णास्तन्मांसं भक्षयन्ति ये । तेषोषभस्मकोन्मादशुक्रक्षीणा भवन्ति हि ।।२७।। प्रसह संज्ञक के मांस—ये सब उष्णवीर्य होते हैं, अतः जो उनके मांस को खाते हैं उनको शोष (क्षय), भस्मक रोग, पागलपन तथा शुक्रक्षीणता हो जाती है । [२७] अथ ग्राम्याः (ग्राम्यपशु) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह छागमेषवृषाश्वाद्या ग्राम्याः प्रोक्ता महर्षिभिः । ग्राम्या वातहराः सर्वे दीपनाः कफपित्तलाः । मधुरा रसपाकाभ्यां बृंहणा बलवर्द्धनाः ।।२८।। ग्राम्य (गाँव के अन्दर रहने वाले) पशुओं की गणना—बकरा, भेंडा (मेढ़ा), बैल (गोजाति), घोड़ा आदि पशुओं को महर्षियों ने "ग्राम्य" संज्ञक कहा है । ग्राम्य पशुओं का मांस—वातनाशक, अग्निदीपक, कफ तथा पित्तकारक, रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस-रक्तादि वर्द्धक) एवम् बल को बढ़ाने वाला होता है । [२८] अथानूपाः । तत्र कूलेचराणां गणनां गुणाँश्चाह लुलायगण्डवाराहचमरीवारणादयः । एते कूलेचराः प्रोक्ता यतः कूले चरन्त्यपाम् ।।२९।। आनूप जाति के जीवों में कुलेचर संज्ञक जीवों की गणना—भैंसा, गैंडा, सूअर, चमरी (Yak—याक्) जाति की गाय और हाथी ये "कूलेचर" संज्ञक जीव कहलाते हैं ।
मांसवर्गः ८५९ "कूलेचर" शब्द की निरुक्ति-जो जीव नदी आदि जलाशयों के तट पर चरने वाले होत हैं उन्हें "कूलेचर" कहा जाता है । [२९] लुलायो = महिषः । गण्डः = खड्गः । चमरी = चमरपुच्छी गौः ।।२९।। यहाँ पर मूल में "लुलाय" से भैंसा, "गण्ड" से गैंडा, चमरी से जिस गोजाति के पशु की पूँछ से चमर बनाया जाता है उस चमरी जाति का ग्रहण करना चाहिये । [२९] कूलेचरा मरुत्पित्तहरा वृष्या बलावहाः । मधुराः शीतलाः स्निग्धा मूत्रलाः श्लेष्मवर्धनाः ।।३०।। कूलेचर संज्ञक जीवों का मांस-वात तथा पित्त को दूर करने वाला, वीर्यवर्धक, बलकारक, मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध, मूत्रकारक तथा कफ को बढ़ाने वाला होता है । [३०] अथ प्लवाः (जलपर तैरने वाले पक्षी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह हंससारसकारण्डबकक्रौञ्चशरारिकाः ।।३१।। नन्दीमुखी सकादम्बा बलाकाद्याः प्लवाः स्मृताः । प्लवन्ति सलिले यस्मादेते तस्मात्प्लवा स्मृताः ।।३२।। प्लवसंज्ञक पक्षियों की गणना-हंस, सारस, कारण्ड (करंड), बगला, क्रौञ्च, शरारिका, नन्दीमुखी, कादम्ब, बगुली आदि ये सब "प्लव" संज्ञक हैं । प्लव शब्द की निरुक्ति जो पक्षी जल पर तैरने वाले होते हैं वे "प्लव" कहे जाते हैं । [३१-३२] ❖ कारण्ड = कपर्दिकाक्षो बृहद्धंसभेदः । क्रौञ्चः = शरद्विहङ्गः स्यात्-"टेंक" इति लोके । शरारिका = "सिन्धू" इति लोके ।। स्थूला कठोरा वृत्ता च यस्याश्चञ्चुपरिस्थिता । गुटिका जम्बुसदृशी प्रोक्ता नन्दीमुखीति सा ।। ❖ कादम्बः = "करवा" इति लोके । बलाका = "बगुली" इति लोके ।।३१-३२।। यहाँ पर मूल में-"कारण्ड" पद से "कपर्दिकाक्ष", बड़े हंस का भेद, काले रंग के बड़े-बड़े पैर वाले पक्षी; "क्रौञ्च" से शरद ऋतु का पक्षी, "टेंक" नाम से प्रसिद्ध; "शरारिका" से "सिन्धू" नाम से लोक प्रसिद्ध पक्षी का ग्रहण करना चाहिये । "नन्दीमुखी" से उस पक्षी का ग्रहण करना चाहिये कि जिसके चोंच के ऊपर मोटी, कठोर, गोल, जामुन के फल के समान गुटिका हो और "कादम्ब" से लोक प्रसिद्ध करना अर्थात् बत्तख का तथा "बलाका" से "बगुली" का बोध करना चाहिये । [३१-३२] प्लवा पित्तहराः स्निग्धा मधुरा गुरवो हिमाः । वातश्लेष्मप्रदाश्चापि बलशुक्रकराः सराः ।।३३।। प्लव संज्ञक पक्षियों का मांस-पित्तनाशक, स्निग्ध, मधुररसयुक्त, गुरु, शीतल, वात तथा कफ को उत्पन्न करने वाला, बल तथा शुक्रवर्धक एवम् सारक होता है । [३३] अथ कोशस्थाः (ढकने के मध्य में रहनेवाले प्राणी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह शङ्खः शङ्खनखश्चापि शुक्तिशम्बूककर्कटाः । जीवा एवंविधाश्चान्येकोशस्थाः परिकीर्तिताः ।।३४।। कोशस्थ (ढकने के मध्य में रहने वाले) प्राणियों की गणना-शंख, क्षुद्रशंख (छोटे शंख), सितुही, घोंघा, केकड़ा, (यहाँ पर सु० सू० ४६ अ० में कोशस्थ जीवों में "भल्लुक" का पाठ है अतः "कर्कट" पाठ ठीक नहीं मालूम