भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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इसका क्षुप-वर्षायु या द्विवर्षायु, सीधा अनेक शाखा युक्त एवं १ से ४ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-पक्षवत् अनेक भागों में विभक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत या पीताभ होते हैं जो गोलाभ छात्राकार गुच्छ में आते हैं। फल-१/८ इञ्च लम्बे, आयताकार एवं रोमश होते हैं। मूल-२ से १२ इञ्च लम्बा एवं मांसल होता है। इसके अनेक प्रकार रंग एवं आकार के अनुसार होते हैं। चिकना, कोमल, चमकीला लाल या नारंगी रंग का गाजर अच्छा माना जाता है। उपर्युक्त प्रकार यह कृषित प्रकार है। वन्य भेद में कन्द पतले, लम्बे, काष्ठीय, क्रमशः नोकीले, तीव्र गन्ध वाले एवं अस्वादु, चरपरे तथा कुछ कड़वे होते हैं। अधिकतर बोने के लिये इसके बीज यूरोप तथा अमेरिका से आते हैं यद्यपि अपने यहाँ बीजों की प्राप्ति का प्रयत्न कश्मीर, कुलू आदि में किया जा रहा है। गाजर का उपयोग शाक, सलाद, अचार, हलुवा, मुरब्बा आदि के रूप में किया जाता है। मक्खन आदि रँगने के लिये इसका रस काम में लाते हैं। रासायनिक संगठन-गाजर में आर्द्रता ८६, प्रोटीन ०.९, स्नेह ०.१, कार्बोहाइड्रेट १०.७ रेशा १.२, खनिज १.१, खटिक ०.०८, फास्फोरस् ०.०३%, लोह १.५ मि० ग्रा० प्र० १०० ग्राम, कॅरोटीन (विटामिन 'ए' का पूर्वरूप) २००० से ४३०० ए० प्र० १०० ग्रा० एवं विटामिन 'बी', 'डी' तथा 'सी' रहते हैं। वृद्धि के साथ इसके प्रोटीन की मात्रा कम होती है तथा शर्करा की मात्रा बढ़ती है। कॅरोटीन की मात्रा भी वृद्धि के साथ बढ़ती है। यह श्वेत गाजर में नहीं रहता। पेट्रोल तथा ईथर के द्वारा प्राप्त इसके पीतसत्व के सूचिकाभरण से रक्तगत शर्करा की मात्रा कम होती है। इसको पकाने से इसके पौष्टिक तत्त्व बहुत कम हो जाते हैं। वाष्प द्वारा पकाने से इतना ह्रास नहीं होता। कॅरोटीन का शोषण गाजर को महीन पीसकर या कसकर खाने से होता है। इसके बीजों में सुगन्धि तैल तथा स्थिर तैल होता है। पत्तों में भी उड़नशील तैल होता है। गुण और प्रयोग-यह मूत्रजनन, बल्य एवं पोषक है। इसमें के कॅरोटीन के कारण जो विटामिन 'ए' का पूर्वरूप (Precursor) है, इसका अधिक उपयोग किया जाता है। इसके बीज सुगंधित, मूत्रजनन, गर्भाशय उत्तेजक, बल्य एवं वृष्य हैं। गाजर को कसकर सूत्रकृमि में खिलाते हैं। कामला में इसका क्वाथ देते हैं। गाजर को कसकर, गरम कर लेप कराने से शोथ, व्रण, दग्धव्रण आदि में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग सर्वांगशोफ एवं वृक्करोग में करते हैं। गर्भाशय की पीड़ा एवं प्रसव के समय बीजों को देते हैं। इससे गर्भपात की संभावना रहती है।
अथ कदलीकन्दः (केलाकन्द) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह शीतलः कदलीकन्दो बल्यः केश्योऽम्लपित्तजित् । वह्निकृद्दाहहारी च मधुरो रुचिकारकः ॥१०५॥ केले का कन्द-शीतल, बलकारक, वालों के लिये हितकर, जठराग्निवर्धक, मधुर रस युक्त, रुचिकारक एवम् अम्लपित्त तथा दाह को नष्ट करने वाला होता है। [१०५]
६४. कदली कन्द केले का विवरण आम्रादि फल वर्ग (पृष्ठ ६१४) में दिया गया है ॥७०॥
अथ मानकन्दः । तस्य नामगुणानाह मानकः स्यान्महापत्रः कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । मानकः शोथहच्छीतो रक्तपित्तहरो लघुः ॥१०६॥ ५७ भाव.I