भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४८ भावप्रकाशनिघण्टुः बड़ी मूली—रूक्ष, उष्ण, गुरु एवं त्रिदोषकारक होती है। वही मूली यदि तेल में भूनी हुई हो तो भी त्रिदोषनाशक होती है। [९९-१०३] ६२. मूली हिं०—मूली, मुरई। बं०—मूला। म०—मुला। गु०—मूला। क०—मुलङ्गी। ता०—मुलंगि। ते०—मुल्लङ्गि। फा०—तुख, तुर्व। अ०—फजल, हुजल। अं०—Radish (रॅडिश्)। ले०—Raphanus sativus Linn. (रॅफेनस् सेटाइवस्)। Fam. Cruciferae (क्रुसीफेरी)। मूली सभी प्रांतों में बोई जाती है। इसका कन्द—गाजर के समान पर सफेद होता है। पत्ते—नवीन सरसों के पत्तों के समान; फूल—सफेद सरसों के फूल के आकार के और फल—भी सरसों ही के समान किन्तु उससे कुछ मोटा और लगभग १-२ इञ्च लम्बा होता है। बीज—सरसों से बड़े होते हैं। भावप्रकाशकार इसके दो भेद छोटी मूली—चाणक्यमूलक तथा बड़ी मूली—नेपालमूलक लिखते हैं। बड़ी मूली नेपाल इत्यादि की तरफ होती है। इसमें गंध कम होती है। छोटी मूली के भी आकार के अनुसार, लम्बी, दीर्घवृत्ताभ एवं शलजमाकार ये ३ भेद होते हैं। इसके पंचांग का शाकार्थ एवं कन्द स्वरस और बीज का चिकित्सार्थ प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में उड़नशील तैल होता है। कन्द में आर्सेनिक .०१ मि० ग्रा० प्र० १०० ग्राम में रहता है। मूल तथा बीज में स्थिर तैल भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग—कच्ची (कोमल) मूली त्रिदोषहर एवं परिपक्व, बिना पकाये खाने से त्रिदोषकारक तथा पकाकर खाने से त्रिदोषहर एवं सूखी त्रिदोषहर है। इसके पत्तों का स्वरस मूत्रल एवं मृदुविरेचक होता है। आनाह, शूल, अर्श एवं अश्मरी में इसको देते हैं। इसके बीज कफनिःसारक, पाचन, वातानुलोमन मूत्रल एवं मृदुविरेचक हैं। अनार्तव में बीज खिलाते हैं। मूली के कन्द का नित्य शाकार्थ प्रयोग करने से पुराना विबंध दूर होता है। अन्य सूखे शाकों की तरह यह विष्टम्भ एवं वातकारक नहीं है (सु० सू० अ० ४६)। यह पाचन एवं वातानुलोमक है। मात्रा—स्वरस २ से ४ तोला; बीज चूर्ण १ से ३ माशा। अथ गृञ्जनम् (गाजर)। तस्य नामगुणानाह गृञ्जनं गाजरं प्रोक्तं तथा नारङ्गवर्णकम्। गाजरं मधुरं तीक्ष्णं तित्तोष्णं दीपनं लघु। संग्राहि रक्तपित्तार्शोग्रहणीकफवातजित् ।। १०४ ।। गाजर के संस्कृत नाम—गृञ्जन, गाजर और नारङ्गवर्णक ये सब हैं। गाजर—मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, अग्निदीपक, लघु, ग्राही एवम्—रक्तपित्त, अर्श, ग्रहणी, कफ वात को दूर करने वाला होता है। [१०४] ६३. गाजर हिं०, म०, बं०, गु०—गाजर। क०—गर्जरि। ते०, ता०—गाजार। फा०—जर्दक। अ०—अजर। अं०— Carrot (कॅरट्)। ले०—Daucus carota var. sativa DC. (डॅकस कॅरोटा प्रकार सटाइवा)। Fam. Umbelliferae (अम्बेलिफेरी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में रोपण किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA