भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८४७ ६१. अरुई हिं०-अरुई, अरई, घुइयाँ। बं०-काचू। म०-अलवाचा कान्दा, आलु। गु०-अलवी। क०-केसवे। ता०-शिमलं। ते०-चम्मडुम्पा। अ०-हुयाकलकास, कलकलास। ले०-Colocasia antiquorum Schott. (कोलोकेसिया ऐण्टीकोरम्)। Fam. Araceae (अॅरेसी)। यह नदी, तालाब, दलदल आदि के किनारे तथा जंगलों के छायादार, आर्द्र स्थानों में वन्य अवस्था में होती है। अनेक स्थानों पर इसकी खेती भी की जाती है। इसका क्षुप-बहु वर्षायु होता है। पर्णवृन्त १ १/२ से ७ फीट तक लम्बा होता है। पत्ते-बहुत बड़े एवं हृदयाकार होते हैं। कन्द-विभिन्न नाप एवं आकार के होते हैं। ये १/२ से १ इञ्च व्यास के गोल आकृति से लेकर ६ इञ्च व्यास एवं २४ इञ्च तक लम्बे होते हैं। किसी में एक समान थोड़े कन्द होते हैं तो किसी में विभिन्न नाप के अनेक कन्द होते हैं। इसके अन्दर के रंग के आधार से भी पीले, नारंगी, लाल या बैंगनी प्रकार होते हैं। वैसे तो इसके अनेक प्रकार होते हैं तथापि इसके दो वर्ग दिखलाई देते हैं। एक में पत्ते एवं वृन्त गहरे बैंगनी तथा दूसरे में हरे होते हैं। गहरे बैंगनी का चिकित्सा में उपयोग करते हैं। इसके स्वाद में कुछ चरपराहट रहता है जो प्रकार के अनुसार कम या अधिक होता है। रासायनिक संगठन-इसके कन्द के रस में अमाइलेस (Amylase) रहता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन काफी रहता है तथा यह आलू की अपेक्षा १ १/२ गुना अधिक पोषक है। अन्य स्टार्च युक्त खाद्यद्रव्य की अपेक्षा यह अधिक सुपाच्य है तथा इसमें विटामिन ए, 'बी'१ एवं खटिक तथा फॉस्फोरस भी काफी रहता है। इसके पत्तों में भी विटामिन 'ए' का पूर्व भाग एवं विटामिन 'सी' रहता है। इसमें के कॅल्शियम ऑग्झेलेट के कारण यह गले में लगता है जिसके लिये इसको पकाकर तथा पकते समय थोड़ा 'पकाने का सोडा' डाल कर प्रयोग में लाते हैं। इसके स्टार्च के कण छोटे होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके कन्द तथा कोमल पत्तों का शाकार्थ उपयोग करते हैं। इसके पर्णवृन्त का स्वरस रक्तस्तम्भक होता है। क्षत पर लगाने से रक्तस्राव रुककर जल्दी व्रणपूरण होता है। गाँठ आदि पर पर्णवृन्त को नमक के साथ पीस कर बाँधते हैं। यकृत् वृद्धि एवं अर्श में अरुई के कन्दों का साग खिलाते हैं। अथ मूलकद्वयम् (मूली, बड़ी मूली)। तस्य नामानि भेदान् गुणाँश्चाह मूलकं द्विविधं प्रोक्तं तत्रैकं लघुमूलकम्। शालामर्कटकं विस्रं शालेयं मरुसम्भवम् ।।९९।। चाणक्यमूलकं तीक्ष्णं तथा मूलकपोतिका। नेपाल मूलकं चान्यत्तद्भवेद्गजदन्तवत् ।।१००।। लघुमूलं कटूष्णं स्याद्रुच्यं लघु च पाचनम्। दोषत्रयहरं स्वर्यं ज्वरश्वासविनाशनम् ।।१०१।। नासिकाकण्ठरोगघ्नं नयनामयनाशनम् ।।१०२।। महत्तदेव रूक्षोष्णं गुरु दोषत्रयप्रदम्। स्नेहसिद्धं तदेव स्याद् दोषत्रयविनाशनम् ।।१०३।। मूली के भेद-(१) मूली, (२) बड़ी मूली, इस प्रकार से मूली के दो भेद होते हैं। इनमें जो पहिली मूली अर्थात् छोटी मूली होती है उसके संस्कृत नाम-लघुमूलक, शालामर्कटक, विस्र, शालेय, मरुसंभव, चाणक्यमूलक