भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४६ भावप्रकाशनिघण्टुः ६०. आलुकभेद अं०-Yam (यॅम्)। ले०-Dioscorea sp. (डायोस्कोरिआ जातियाँ)। Fam. Dioscoreaceae (डायोस्कोरिएसी)। इस प्रजाति (Genus) में अनेक जातियाँ होती हैं। भारत में करीब ५० जातियाँ (Species) पाई जाती हैं जिनमें कुछ वन्य एवं कुछ कृषित होती हैं। इनमें दो मुख्य प्रकार की लताएँ होती हैं। एक वामावर्त तथा दूसरी दक्षिणावर्त। ये वर्षायु लताएँ होती हैं जिनमें से कृषित के कन्दों का उपयोग खाने के लिये किया जाता है। भावप्रकाशकार इसके आकार, रंग, स्वाद आदि के आधार पर अनेक भेद लिखते हैं। जितनी जातियाँ भारत में होती हैं उनमें अनेक प्रकार के कन्द पाये भी जाते हैं। इनमें बहुत बड़े, लम्बे गोल, बहुत गहराई में होने वाले, सतह के पास होने वाले, एकाकी, गुच्छों में अनेक, मुलायम, कठोर, रोएँदार, बिना रोएँदार आदि प्रकार पाये जाते हैं। इनमें से कुछ वन्य जातियों को जानवर भी खाते हैं। कुछ कन्दों में क्षाराभ (Dioscorine-डायोस्कोरिन), सॅपोनिन् एवं टैनिन् आदि होने से ये विषैले एवं अस्वादु होते हैं। कुछ लताओं में ऊपर पत्रकोणों में छोटी कन्दवत् रचनाएँ भी पाई जाती हैं। इन्हीं कंदों में से वाराहीकंद है जिसका गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ३८६) में वर्णन किया गया है। रासायनिक संगठन-इनमें स्टार्च, विटामिन् बी एवं कॅल्शियम आग्झेलेट काफी रहता है। प्रोटीन, खटिक एवं लोह कम रहता है। इसकी विभिन्न जातियों में डायेस्कोरिन् (Dioscorine, C₃, H₂, O₂, N) क्षाराभ की मात्रा कम या अधिक रहती है। इससे युक्त कन्दों के अधिक सेवन से श्वसनाघात हो सकता है। सॅपोनिन (Saponin) युक्त कन्दों का उपयोग सिल्क, ऊन आदि धोने के लिये किया जाता है। इनकी कुछ अमेरिकी जातियों से कॉर्टिजोन (Cortisone) जैसे संधिवात में उपयोगी द्रव्य निर्माण के लिये आवश्यक प्रारम्भिक द्रव्य प्राप्त किये गये हैं। मद्यसार बनाने के लिये भी इनका उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इनमें से कुछ कन्दों का आलू की तरह भोज्य द्रव्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। अकाल आदि के समय पहाड़ी लोग इनका उपयोग करते हैं। इनको काफी धोकर, पकाकर या भूनकर प्रयोग करते हैं जिससे विषैलापन निकल जाता है तथा खाने से गले में खुजली आदि नहीं होने पाती। कच्चा खाने से इसमें के कॅल्शियम आग्झेलेट से गले में खराश आदि हो जाती है। नोट-नित्य व्यवहार में लाये जाने वाला आलू इससे भिन्न सोलनम् ट्युबरोजम् (Solanum tuberosum) के कन्द हैं। इसी प्रकार शकरकंद भी इससे भिन्न आइपोमिया बटाटास् (Ipomoea batatas Lam.) के कन्द हैं। अथालुकी रक्ताळुभेदः । तस्या लक्षणं गुणाँश्चाह रक्ताळुभेदो या दीर्घा तन्वी च प्रथिताऽऽलुकी । आलुकी बलकृत्स्निग्धा गुर्वी हृत्कफनाशिनी ।। विष्टम्भकारिणी तैले तलिताऽतिरुचिप्रदा ।।९८।। रक्तालू के भेद का संस्कृत नाम आलुकी है। लक्षण-यह रतालु का भेद है एवं उससे लम्बी तथा पतली होती है। आलुकी-बलकारक, स्निग्ध, गुरु, हृद्रत कफ को दूर करने वाली, एवम् विष्टम्भजनक होती है और तेल में तली हुई अत्यन्त रुचिकारक होती है। [९८] नोट-रक्ताळु भेद लिखने के कारण इसके पूर्वोक्त आलुक भेदों में से किसी लता के कन्द होने की अधिक सम्भावना है। प्रसंगतः अरुई का वर्णन यहाँ दिया जा रहा है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA