भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 901, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 901

८५० भावप्रकाशनिघण्टुः मानकन्द का संस्कृत नाम—मानकन्द और महापत्र हैं। मानकन्द—शीतल, लघु एवम्—शोथ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [१०६] ६५. मानकन्द हिं०—मानकन्द। बं०—मानकचू। म०—कांसालू। अं०—Giant taro (जाएण्ट टारो)। ले०—Alocasia indica (Roxb.) Schott. (एलोकेसिया इंडिका)। Fam. Araceae (ऐरॅसी)। प्रायः इसको बागों में लगाते हैं और आसाम तथा बंगाल में इसकी उपज की जाती है। इसका क्षुप—अरुई की तरह किन्तु उससे बड़ा एवं ३ से ६ फीट ऊँचा होता है। स्कंध–मांसल, फूला हुआ, ४ से ८ इञ्च व्यास का होता है। पत्ते–२ से ३ फीट लम्बे, पुंखवत् त्रिभुजाकार होते हैं। इसके अग्र खण्ड त्रिभुजाकार एवं पार्श्व खण्ड लट्वाकार होते हैं। पुष्प–पुं. पुष्प एवं स्त्री पुष्प पत्रावृत व्यूह में पृथक्-पृथक्, ४ से ८ इञ्च लम्बे वृन्त पर आते हैं। फल—बाली के रूप में आते हैं जिसमें दाने (फल) लाल होते हैं। स्कन्ध से मूल निकले रहते हैं एवं मूल स्तम्भ से निकले हुए मूलों के अग्र कन्द सदृश होते हैं। स्कन्ध तथा छोटे कन्द खाये जाते हैं। इसके कई भेदोपभेद पाये जाते हैं जिनमें एक मीठा तथा दूसरा कड़वा होता है। मीठे का उपयोग किया जाता है। इसको प्रयोग के पूर्व उबाल कर धोना पड़ता है। रासायनिक संगठन—इसमें स्टार्च काफी होता है। इसमें कॅल्शियम आग्झेलेट भी होता है। इसका आटा चावल की अपेक्षा अधिक सुपाच्य होता है। गुण और प्रयोग—मानकन्द सुपाच्य, पौष्टिक, मूत्रजनन, अल्प मृदुविरेचन एवं स्कंध स्वरस रक्तसंग्राहक एवं कषाय है। इसके सूखे कंद के चूर्ण को चावल की माँड़ के साथ पकाकर, छानकर देने से शोथ और जलोदर में लाभ होता है। उस समय आहार में और कोई पदार्थ नहीं दिया जाता। कंद का साग पुराने विबंध एवं उससे उत्पन्न अर्श में दिया जाता है। कर्णस्राव में इसके स्कंध को भूनकर निकाला स्वरस डालने से लाभ होता है। मूल को कस कर गरम करके उससे सन्धिशोथ में सेंकते हैं। मात्रा—मूल चूर्ण १ से २ तोला। अथ वाराहीकन्दः (गेंठी)। तस्य गुणानाह वाराही पित्तला बल्या कट्वी तिक्ता रसायनी। आयुःशुक्राग्निकृन्मेहकफकुष्ठानिलापहा ।।१०७।। वाराहीकन्द—कटु तथा तिक्त रस युक्त, पित्तजनक, बलकारक, रसायन तथा आयु, शुक्र और जठराग्नि को बढ़ाने वाला एवम्–प्रमेह, कफ, कुष्ठ और वायु को नष्ट करने वाला होता है। [१०७] ६. वाराही कन्द इसका विवरण गुडूच्यादिवर्ग (पृष्ठ ५५४) में एवं आलुक के वर्णन के साथ इसी वर्ग में (पृष्ठ ८४५) किया जा चुका है। अथ हस्तिकर्णा। तस्यास्तत्कन्दस्य च गुणानाह गजकर्णा तु तिक्तोष्णा तथा वातकफाञ्जयेत्। शीतज्वरहरी स्वादुः पाके तस्यास्तु कन्दकः ।।१०८।। पाण्डुशोथकृमिप्लीहगुल्मानाहोदरापहः । ग्रहण्यार्शोविकारघ्नी वनसूरणकन्दवत् ।।१०९।। हस्तिकर्ण के संस्कृत नाम—गजकर्णा और हस्तिकर्णा इसके संस्कृत नाम हैं।