भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकवर्गः ८५१ हस्तिकर्ण-तिक्तरसयुक्त, उष्ण, विपाक में मधुर रसयुक्त एवम्-वात-कफ तथा शीतज्वर को दूर करने वाला होता है। इसका कन्द-जङ्गली सूरन के कन्द की भाँति, पाण्डु, शोथ, कृमि, प्लीहा, गुल्म, आनाह (अफरा), उदररोग, ग्रहणी तथा अर्श के विकारों को नष्ट करने वाला होता है। [१०८-१०९] नोट-टीकाकारों ने इसे भूपलाश, रक्तएरण्ड तथा कुछ ने मानकन्द का बड़ा भेद लिखा है किन्तु निम्न वर्णित क्षुप हीं हस्तिकर्ण है। ६७. हस्तिकर्ण हिं०-हत्कन, हस्तिकर्ण पलाश, समुद्रक । बं०-ढोलसमुद्र । म०-दिंडा । ले०-Leea macrophylla Horn. (लिआ मॅक्रोफाइला) । Fam. Vitaceae (विटेसी) । भारत के समस्त उष्णप्रदेश एवं आसाम में यह होता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मोटा तथा बहुवर्षायु कन्द से प्रति वर्ष निकलता है। पत्ते-हाथी के कान की तरह बहुत बड़े, १ से २ फीट लम्बे एवं लट्वाकार-हहूत होते हैं। उपपत्र बहुत बड़े होते हैं। पुष्प-श्वेत होते हैं। फल-काले एवं झुमकेदार होते हैं। इसके कन्द का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही, वेदनास्थापक एवं रक्तस्कन्दक है। कन्द को पीसकर व्रण, दाद एवं नारूकृमि पर लगाते हैं। इससे वेदना कम होती है और स्थानिक रक्तस्राव भी रुकता है। कहीं-कहीं क्षय में भी इसका उपयोग किया जाता है। अथ केमुकम् (केमुआँ) । तस्य गुणानाह केमुकं कटुकं पाके तिक्तं ग्राहि हिमं लघु ।।११०।। दीपनं पाचनं हृद्यं कफपित्तज्वरापहम् । कुष्ठकासप्रमेहास्त्रनाशनं वातलं कटु ।।१११।। केमुक-विपाक में कटुरसयुक्त, स्वाद में तिक्त तथा कटुरसयुक्त, ग्राही, शीतल, लघु, अग्निदीपक, पाचक, हृदय के लिये हितकर, वातजनक एवम्-कफ, पित्त, ज्वर, कुष्ठ, कास, प्रमेह तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [११०-१११] ६८. केमुक हिं०-केमुआ, केमुक, केवुक कन्द, केवा। म०-पेवा। ते०, क०-चेंगलकोश्टू । बं०-केऊ । ले०- Costus speciosus (Koen) Sm. (कोस्टस् स्पेसिओसस्) । Fam. Zingiberaceae (जिंजिबरेसी) । यह प्रायः सभी स्थानों पर किन्तु विशेष रूप से बंगाल तथा कोंकण में होता है। इसे शोभा के लिए बागों में भी लगाते हैं। आर्द्र तथा छायादार स्थानों में वर्षा में यह अधिक होता है। इसका क्षुप-२ से ६ फीट ऊँचा होता है मूलस्तम्भ कन्दवत् तथा अदरक के समान होता है। पत्ते-भालाकार, ६ से १२ इञ्च लम्बे एवं अधर तल पर रोमश होते हैं। पुष्प-कांड के अग्र पर, सफेद, ३-४ इञ्च बड़े, निर्गन्ध पुष्प, व्यूह में आते हैं जिनके कोणपुष्पक भड़कीले लाल होते हैं। इसके कन्द को पकाकर खाते हैं। यह निर्गन्ध, कुछ कसैला एवं कुछ लुआबदार होता है।